photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, May 16, 2010
पॉलीथीन के सहारे जिन्दगी
ग्रीष्म की एक दोपहरी। मजबूरी के मारे हम अपनी स्कूटर पर राजधानी की तरफ चले जा रहे थे। लू के थपेड़े हेलमेट को चीरकर सिर के आरपार निकल जाना चाहते थे। जहां-जहां शरीर कपड़ों से बाहर था, वहां की त्वचा झुलस रही थी। हमारी प्यासी आंखें किसी प्याऊ की तलाश में थी, पर नजर जहां तक जाती थी वहां तक केवल धूल भरे मैदान, सूखी झाड़ियां और उनके आसपास हवा में उड़ते पालीथीन के सिवा कुछ नहीं था। सड़क के किनारे, दुकानों के इर्द गिर्द, खाली प्लाटों में, हर जगह केवल पालीथीन के रंग-बिरंगे टुकड़े उड़ रहे थे। पालीथीन के खिलाफ चलाया गया हमारा अभियान इतना रंग जरूर लाया था कि जिस पानी का नाम लेकर लोगों को डराया जाता था वह पानी भी अब पालीथीन के पाऊच में बिकने लगा था। तभी नजर पालीथीन के कैरीबैग में कुछ शीशियां लेकर सड़क पार करने की कोशिश करती एक अधेड़ महिला पर पड़ी। फोरलेन कैरिज-वे ने यहां के रहवासियों का जीवन दूभर कर दिया था। अशक्त और वृद्धजनों के लिए सड़क पार करना किसी युद्ध से कम नहीं था। वह किसी तरह अपनी तरफ का सड़क पार कर डिवाइडर तक पहुंच चुकी थी। जैसे ही उसने डिवाइडर पर से दूसरी तरफ सड़क पर पैर रखना चाहा तेज हार्न की आवाज ने उसे डरा दिया। एक झटके से उसने अपने पांव वापस खींच लिए। झन्नाटे से एक मिनी बस उसके सामने से गुजर गई। एक पल की भी देर होती तो हादसा हो जाता। बहरहाल महिला तो बच गई किन्तु उसके हाथ का पालीथीन सड़क पर था। झटका लगने के कारण पालीथीन फट गया था और उसमें रखी दवाइयां और सिरप की शीशियां सड़क पर गिर कर फूट चुकी थीं। गोलियां बिखर गई थीं। इसी तरह कुछ दिन पहले पावर हाउस में एक वृद्धा को काली पालीथीन का नीचे से फटा हुआ पैकेट पकड़ कर ठगा सा खड़ा पाया था। पैकेट फाड़कर पके आम सड़क पर बिखर गए थे और उसकी आंखों के सामने मिनीडोर के पहियों ने उन्हें कुचलकर रख दिया था। पुराने पैंटों को सीलकर बनाये गये थैले न जाने कहां चले गये थे। अक्लमंद आदमी ने पालीथीन ईजाद कर ली। अब वह हर चीज इसी में खरीदता है। घर से बाजार के लिए निकलता है पर थैली नहीं रखता। पन्नी में आलू, पन्नी में ही प्याज, पन्नियों में भाजी, धनिया, मिर्च, फल सबकुछ खरीद लेता है। किराने की दुकान पर भी वह थैला लेकर नहीं जाता। दर्जन दो दर्जन पन्नियों के थैले समेट कर गाड़ी में आगे पीछे दाएं-बाएं लटका लेता है। कभी चीनी चींटी को चढ़ जाती है तो कभी गेहूं-चावल सड़क पर बिखर जाता है। जिस रफ्तार से पालीथीन का क्रेज बढ़ रहा है, किसी दिन मैटरनिटी होम से लोग अपने बच्चे भी पालीथीन के कैरीबैग में ही लेकर निकलेंगे।
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आपकी आवाज हम तक पहुंची ....काश सभी तक पहुंचे ...एक अच्छी प्रस्तुति
ReplyDeletehaa ye baat to hai, par ab ise roka nahi jaa sakta. ye hum sab logo ki zindagi me shaamil ho chuka hai. chahe kuch b ho jaye kam se kam hamaare desh k log nahi sudharne wale, aap to jaante hi hai
ReplyDeleteफोरलेन कैरिज-वे ने यहां के रहवासियों का जीवन दूभर कर दिया था। अशक्त और वृद्धजनों के लिए सड़क पार करना किसी युद्ध से कम नहीं था। वह किसी तरह अपनी तरफ का सड़क पार कर डिवाइडर तक पहुंच चुकी थी। जैसे ही उसने डिवाइडर पर से दूसरी तरफ सड़क पर पैर रखना चाहा तेज हार्न की आवाज ने उसे डरा दिया। एक झटके से उसने अपने पांव वापस खींच लिए। झन्नाटे से एक मिनी बस उसके सामने से गुजर गई। एक पल की भी देर होती तो हादसा हो जाता। बहरहाल महिला तो बच गई किन्तु उसके हाथ का पालीथीन सड़क पर था। झटका लगने के कारण पालीथीन फट गया था और उसमें रखी दवाइयां और सिरप की शीशियां सड़क पर गिर कर फूट चुकी थीं। गोलियां बिखर गई थीं। इसी तरह कुछ दिन पहले पावर हाउस में एक वृद्धा को काली पालीथीन का नीचे से फटा हुआ पैकेट पकड़ कर ठगा सा खड़ा पाया था। पैकेट फाड़कर पके आम सड़क पर बिखर गए थे और उसकी आंखों के सामने मिनीडोर के पहियों ने उन्हें कुचलकर रख दिया था। पुराने पैंटों को सीलकर बनाये गये थैले न जाने कहां चले गये थे। अक्लमंद आदमी ने पालीथीन ईजाद कर ली। अब वह हर चीज इसी में खरीदता है। घर से बाजार के लिए निकलता है पर थैली नहीं रखता। पन्नी में आलू, पन्नी में ही प्याज, पन्नियों में भाजी, धनिया, मिर्च, फल सबकुछ खरीद लेता है।
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