photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, May 21, 2010
गृहिणी का गैस सिलिण्डर
महिलाओं के सशक्तिकरण की बातें सुन-सुन कर कान पक गए हैं। समझ में नहीं आता कि वे कमजोर कब थीं। अपने फायदे के लिए उन्हें नेता जब चाहे कमजोर बना लेते हैं, जब चाहे अबला घोषित कर देते हैं और जब चाहे रणचण्डी की संज्ञा दे देते हैं। अब जब पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की बारी आई तो इसमें भी गृहिणी की फर्जी चिंता को साथ में जोड़ दिया गया। हमारा मोहल्ला मध्यमवर्गीय परिवारों का है। कुछ उच्च मध्यमवर्ग के हैं तो कुछ निम्न मध्यमवर्ग के परिवार भी यहां रहते हैं। सभी के घर स्कूल कालेज में पढ़ने वाले बच्चे हैं। माहवारी दस से पंद्रह हजार रुपए की आमदनी में गृहिणी को ढेरों काम निपटाने पड़ते हैं। इसमें पति से लेकर बच्चों तक को पेट्रोल के लिए पैसे देना, महीने का राशन लाना, किराया देना, गैस-बिजली का बिल चुकाना, साग-सब्जी खरीदना, कुछ पैसे भविष्य के लिए जोड़ना तथा थोड़ा पैसा आपातकालीन जरूरतों के लिए रखना होता है। दूध तो कब का लिस्ट से बाहर हो गया है। हालात ऐसे हो रहे हैं कि कभी कोई मेहमान आ जाए तो उसका स्वागत करने से पहले ही उसके जाने की तिथि जान लेने की इच्छा होती है। सभी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। अब पेट्रोल के फिर से पांच-छह रुपये तक महंगा होने की बात हो रही है। उसकी सांस अटकने लगी है। उसका आत्महत्या करने को जी चाहता है। बल्कि देश भर में कुछ लोग सामूहिक रूप से आत्महत्या कर चुके हैं। पर सरकार की बेहयाई देखिए। वह कह रही है कि रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे ताकि गृहिणी को राहत मिले। यह कैसी सोच है जिसमें महिला को केवल रसोई गैस के सिलिण्डर से जोड़ कर देखा जाता है? यह तो हुई उन परिवारों की बात जिनकी कमाई पांच अंकों में है। देश की अस्सी फीसदी आबादी के लिए आज भी चार अंकों का वेतन सपना है। क्या उन्हें इंसानों में गिना जा सकता है? सरकार के लिए वे सिर्फ वोटर हैं। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का सच जानना हो तो लोग अपने साधनों से पता लगाएं कि डीजल और पेट्रोल पर सरकार कितना पैसा टैक्स और ड्यूटी वसूलती है। झूठ और सच का पता खुद-ब-खुद लग जाएगा। पढ़े लिखे मूर्खों को अंतरराष्ट्रीय तेल के भाव दिखाने वाली सरकार की पोल पट्टी खुल जाएगी।
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