Sunday, May 2, 2010

दिग्विजय के सवाल

छत्तीसगढ़ में विपक्ष हनीमून पर है इसलिए हारकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को ही कमान संभालनी पड़ी है। अपने लेख के लिए आलोचना का शिकार हुए दिग्विजय सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खुली बहस की चुनौती स्वीकार करते हुए दस सवाल उछाले हैं। दिग्विजय सिंह का मानना है कि छत्तीसगढ़ की सरकार तथा केन्द्रीय गृहमंत्री नक्सल समस्या को केवल कानून व्यवस्था की समस्या मानकर एक बड़ी गलती कर रहे हैं। ऐसा कर उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को एक युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है जहां स्थानीय निवासी दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। दिग्विजय ने 14 अप्रैल के अपने लेख में चिंता व्यक्त की थी कि इस युद्ध में आदिवासी नेस्तनाबूद हो रहे हैं। उन्होंने केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम को भी आड़े हाथों लिया था। इससे इतना तो स्पष्ट है कि दिग्विजय सिंह का मकसद इस मामले को लेकर केवल राजनीति करना नहीं है। दिग्विजय जिन हालातों की तरफ इशारा करना चाहते थे, उनकी चर्चा पर भी छत्तीसगढ़ में फिलहाल ‘बैन’ लगा हुआ है। वैसे भी स्वार्थी शहरियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जंगलों में आदिवासी रहते हैं या नहीं। उन्हें तो केवल इससे मतलब है कि जब वे केशकाल घाटी, दंतेश्वरी मंदिर, चित्रकोट, तीरथगढ़, कुटुमसर, कैलाश गुफा देखने जाएं तो वहां पर्यटन की सभी सुविधाएं मौजूद हों। राज्य में ज्यादा से ज्यादा उद्योग लगें ताकि उनके बच्चों को नौकरियां मिल सकें। धुर आदिवासी अंचलों में शहरी बसाहटें बढ़ेंगी तो व्यापार की संभावनाओं में भी इजाफा होगा। स्वार्थ के इस चश्मे से जब नक्सल प्रभावित अंचलों का जायजा लिया जाता है तो आदिवासी दिखाई ही नहीं देते। वहां या तो नक्सलियों का विकृत चेहरा नजर आता है या फिर शहीद जवानों के खून में सने चीथड़े। दरअसल उद्योगों के लिए विस्थापन हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। बात जब वनाच्छादित पहाड़ों के नीचे दबी खनिज संपदा की हो तो यह समस्या और विकट हो जाती है। समस्या न केवल आदिवासी गांवों को खाली कराने, उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था कर उन्हें ऐसी जगहों पर लगने वाले कारखानों में रोजगार दिलाने की है बल्कि पर्यावरण का क्लीयरेंस हासिल करना भी एक बड़ी समस्या होती है। इन समस्याओं पर खुले मन से बहस की जरूरत है। लोकतंत्र में राजपाट का मिल जाना कोई स्थायी विरासत नहीं होती जिसमें मनमानी की जाए। यहां विपक्ष की भी भूमिका है। यह भूमिका इसीलिए है कि प्रत्येक मामले पर बहस हो और गुणदोषों की विवेचना के बाद आगे कदम बढ़ाए जाएं। इस लिहाज से देखा जाए तो दिग्विजय के इस साहस की प्रशंसा ही करनी होगी। इसके लिए चाहे अपनी ही पार्टी में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो किन्तु यह पहल किसी को तो करनी थी।

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