photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Tuesday, May 18, 2010
रणनीति या बर्बर बलप्रयोग
नक्सलियों ने एक और बड़ा हमला कर दिया। इस बार उन्होंने एक यात्री बस को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उसने एसपीओ और पुलिस वालों को बैठाया था। इससे पहले भी नक्सलियों ने यात्री बसों और टैक्सियों को निशाना बनाया है किन्तु यात्रियों समेत बस को विस्फोट से उड़ाने की यह पहली घटना है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कंवर और केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम कम से कम इस मायने में सच बोल रहे हैं कि नक्सली दबाव में हैं। निश्चित तौर पर वे दबाव में हैं और चूंकि उनपर आम आदमी या खास आदमी किसी की भी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए जब बात मरने-मारने की होगी तो निश्चित तौर पर वे बेहतर स्थिति में होंगे। दरअसल हमने नक्सलियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाने की बजाय उनपर बर्बर बलप्रयोग को तरजीह दी है। आंदोलनरत श्रमिकों, छात्र-छात्राओं या किसानों के खिलाफ बल प्रयोग करना एक बात है और हथियार बंद छिपे हुए दुर्दांत लड़ाकों से निपटना कुछ और। हम बलप्रयोग सिर्फ जंगलों में कर सकते हैं जबकि वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने के लिए स्वतंत्र हैं। अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है तो इसके लिए हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए। साफ है कि हमने कभी भी कथित नक्सलियों/माओवादियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाई ही नहीं। हम नक्सलियों की रणनीति का मुंहतोड़ जवाब देने की कोशिश मात्र कर रहे हैं और हर बार मुंह की खा रहे हैं। हमारी बौखलाहट इससे साफ जाहिर होती है कि 16 मई को जब नक्सलियों ने कुछ ग्रामीणों की हत्या कर दी तो आईजी को यह कहना पड़ा कि मारे गए लोग आम आदमी नहीं, पुराने नक्सली थे। दूसरे ही दिन 17 मई को जब नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर यात्री बस को उड़ा दिया तो तत्काल केन्द्रीय गृह मंत्रालय स्पष्टीकरण देता है कि मारे गए लोगों में सीआरपीएफ के जवान नहीं थे। ये दोनों ही टिप्पणियां गैरजरूरी थीं। पहली टिप्पणी जहां यह संकेत देती है कि नक्सलियों का साथ छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले आदिवासियों की सुरक्षा को लेकर हम कुछ खास चिंतित नहीं हैं वहीं दूसरी टिप्पणी सीआरपीएफ को दिलासा देने के लिए की गई लगती है। न चाहते हुए भी शासन ने साफ कर दिया है कि आदिवासी चाहे नक्सलियों की तरफ से लड़ें, चाहे हमारे लिए मुखबिरी करें या फिर एसपीओ के रूप में हथियार लेकर सुरक्षा बलों की अगुवाई करें, हमें उनकी हिफाजत की परवाह नहीं है। शायद हम आदिवासियों को किसी गिनती में ही नहीं लाते। यही वह रणनीतिक चूक है जो नक्सलियों को मजबूत कर रही है। मानवाधिकारवादियों को चिंतित कर रही है। सेनापतियों की टिप्पणी में हताशा के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। इससे पहले कि बात और बिगड़े, हमें नक्सलियों के खिलाफ रणनीति पर दोबारा विचार करना ही होगा।
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आज जब न्यूज़ पेपर मे वो फोटो देखी तो आखों में आँसू आ गए, सब तरफ लोगों के शरीर के टुकड़े बिखरे पड़े थे। घटना को देखकर 'ए वेडनसडे' का वो डाइलोग याद आया कि "हम तो यूँ ही मारते रहेंगे तुम क्या कर लोगे"। मामला अब बहुत घंभीर हो गया है सरकार को जल्द से जल्द वायुसेना कि मदद लेनी चाहिए। जंगल नक्सलियों का घर है और उन्हे उनके घर मे हराना बहुत मुश्किल है।
ReplyDeleteNaxallite attacks reminds me of Vietnam war which left over 2 mil vietnamis and 50k us soldiers dead, also it reminds me of russian attack on afganistan which left thousands of russians dead. Same situation is posed by naxals-its a war againest our own people, any casuality would be an indian lost. This war can only be won by negotiations and development. Remember the FRENCH revolution in which tyrant king Loiuse 16 was assasinated by poppressed and poor.Naxals need to be brought to table to resolve the issue.
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