Saturday, May 8, 2010

एक दिन की माँ

इतिहास में एक दिन का राजा हुआ है। बॉलीवुड एक दिन का मुख्यमंत्री पेश कर चुका है। जमाना एक दिन की माँ तैयार कर रहा है। कभी माँ जीवन-भर या यूँ कहें कि जन्म जन्मांतर का रिश्ता होती थी। अकेली माँ ही क्यों, हर वह औरत माँ होती थी जो लगभग माँ की उम्र की हो। रिश्तेदारियों में भी बड़ी माँ, दादी माँ, नानी माँएं होती थीं। वैसे अधिकांश परिवारों में आज भी यह स्थिति बरकरार है किन्तु जमाना तेजी से बदल रहा है। अब माँ और बाप में कोई फर्क नहीं रह गया है। दोनों ही घर से गायब रहते हैं। बाप जहां मजबूरी में बाल-बच्चों को छोड़कर कमाने जाता था वहीं अब माँ अपने आप को साबित करने के लिए काम पर जाती है। करियर बनाने के लिए वह शादी को टाल देती है। विवाह का आनंद लेने के लिए प्रेग्नेन्सी को टाल देती है। माँ अपने पति की माँ को बर्दाश्त नहीं कर पाती। इसलिए अब हम अकेले रहते हैं। माँ के पास वक्त नहीं होता इसलिए हम धाई माँ के पास रहते हैं। सबके पास अपनी अलग धाई माँ नहीं होती। ऐसे बच्चे क्रेश में कॉमन धाई माँ के पास पलते हैं। माँ नहीं रही तो क्या हुआ, माँ शब्द तो है। इस शब्द की अपनी एक गरिमा है। कभी माँ का नाम लेकर कहा गया एक अपशब्द खून-खराबे का कारण बन जाता था। अब यह आम लोगों का तकियाकलाम हो गया है। पश्चिमी सोच ने हमें उपभोक्तावादी बना दिया है जहां पैसे कभी पूरे नहीं पड़ते। हर पल एक नई चीज लाँच होती है। खरीदने को पैसे चाहिए। इसलिए आदमी जिन्दगी का दामन छोड़ पैसे कमाने की अंधी होड़ में शामिल हो गया है। हर रिश्ता ढीला पड़ गया है। बाप भी अफसर, माँ भी अफसर सो उसने टीवी से नाता जोड़ लिया है। टॉम एण्ड जेरी, शिजूका, नोबिता, कितरेटसू, डोरेमॉन ही उसके रिश्तेदार हैं। ऐसे में वह कहीं माँ को पूरी तरह न भूल जाए इसलिए मदर्स डे मनाया जाता है। साल में एक दिन की माँ के लिए कार्ड खरीदे जाते हैं, गिफ्ट लिये जाते हैं, दूर रहने वाले बच्चे क्रिएटिव एसएमएस भेजते हैं। अनाथ बच्चों के नाम पर कुछ लोग आँसू बहा आते हैं। वे भूल जाते हैं कि बहुत सारे बच्चे माँ-बाप के जीवित रहते भी अनाथों की जिन्दगी जी रहे हैं। ऐसे बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। अकसर ऐसे बच्चों के पिता गाते हैं...


घर से निकलते ही,

कुछ दूर चलते ही,

रस्ते में है माँ का घर,

कल सुबह देखा तो,

पांव दबाती वो,

देहरी पे आई नजर...

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