photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Tuesday, May 18, 2010
आने को है बूंदों की बारात
दक्षिण-पश्चिम मानसून का चार महीने तक चलने वाला मानसून मेला बस शुरू ही होने वाला है। मौसम विभाग के अनुसार अंडमान के समुद्र में मानसून की मौसम प्रणाली को सक्रिय करने वाली अनुकूल परिस्थितियां बननी शुरू हो गई हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी बीते साल सूखे की मार झेल चुके देश के साढ़े 23 करोड़ किसानों के लिए बड़ी राहत देने वाली है। देश की खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी हुई है और खेती की तमाम गतिविधियों का आधार चार महीने का यह मानसून सत्र होता है। अच्छी मानसूनी बारिश से धान, गन्ना, सोयाबीन और मक्का की बुआई समय पर हो सकेगी और फसल भी अच्छा होने का अनुमान है। सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ छपी यह खबर वैचारिक प्रदूषण की पराकाष्ठा है। क्या बारिश के साथ केवल किसानों की खुशियां जुड़ी हुई हैं। कदापि नहीं। बारिश हर उस प्राणी के लिए राहत और खुशियों की सौगात लेकर आती है जो जीवित है। पेड़ पौधे, जानवर, कीट पतंगे, इंसान सभी के लिए। फिर यह वर्गीकरण क्यों कि मौसम विभाग की घोषणा से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं? तो क्या शहरों में रहने वालों की चेहरे इस खबर से मुरझा गए हैं? लोग पीने के पानी के लिए तड़प रहे हैं। क्या बारिश उनके लिए खुशखबरी नहीं लेकर आ रही? क्या वर्षा का संबंध केवल कृषि से है। दरअसर आंकड़ों की बात करते-करते, संवेदनाशून्य शब्दों से खेलते खेलते हम कब वैचारिक शून्यता के कगार पर पहुंच गए हैं, हमें पता ही नहीं लगा। इसके अलावा इसकी और क्या वजह हो सकती है कि मानसून को केवल किसानों और फसलों से जोड़ कर देखा जाए। अफसोस इस बात का है कि ऐसा हुआ, अकसर होता है और हमें यह अखरता तक नहीं है। वैचारिक प्रदूषण का यह जाल एक दिन में नहीं फैला है। उपभोक्तावादी सोच दिमाग का किस हद तक कचरा कर सकती है, यह इसा जीता जागता उदाहरण है। बहू की बात करते समय हम भूल जाते हैं कि वह बेटी भी है और सास भी होगी। बेटों की बात करते समय भूल जाते हैं कि वह भी कभी दामाद और बाप होगा। उपभोक्तावादी सोच समाज को आयुवर्ग, आय वर्ग, आदि में बांटती है। हर इकाई को अलग-अलग मानकर चलती है। यहां हमें किसानों की याद केवल इसलिए आई कि उनके लिए बारिश का मतलब उनकी कारोबारी सक्रियता से है जिसके साथ एक बड़ा बाजार जुड़ा हुआ है। उनके पीछे मार्केटिंग का क्रिएटिव नेटवर्क जुड़ा हुआ है। वह बारिश को बूंदों की बारात कहने का ‘पंच लाइन’ तो गढ़ सकता है किन्तु बारिश और प्रेम का संबंध नहीं जोड़ पाता। उसे इस बात के पैसे जो नहीं मिले हैं।
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