Friday, April 30, 2010

कामचोरों की जमात

लालफीताशाही को कर्मचारी संकट का नाम देकर केन्द्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री ए इलावरासन ने भले ही साग से मछली ढंकने की कोशिश की हो किन्तु हकीकत यही है कि केन्द्रीय वेतनमान, महंगाई भत्ता और तमाम तरह की सुविधाएं देने के बाद भी सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते। वे तब तक किसी काम में रुचि नहीं लेते जब तक कि उसमें उनकी कोई व्यक्तिगत दिलचस्पी न पैदा कर दी जाए। पूरी दुनिया विभिन्न जिन्सों का पेटेन्ट करवाने की होड़ में लगी है ताकि कल को जब बौद्धिक संपदा कमाई का सबसे बड़ा साधन बने तो सबके खाते में कुछ न कुछ हो, किन्तु भारत इसका अपवाद है। केन्द्रीय राज्यमंत्री के अनुसार पेटेन्ट के 73 हजार आवेदन लंबित हैं। ये वो आवेदन हैं जो नीचे की बाधाओं को पार कर वहां तक पहुंचे हैं। उन लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो पेटेन्ट कराने की पहली सीढ़ी पर पांव धरने के लिए कतार में हैं। सरकारी कामकाज के कछुआ चाल की वजह से कितने ही लोगों के ख्वाब टूट जाते हैं, कितने ही लोगों की जिन्दगी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है। मुश्किल तो यह है कि सरकार को इसका अहसास तक नहीं है। वैसे जहां पूरा सरकारी ढांचा कमीशनखोरी पर टिका हुआ हो वहां किसी अच्छी पहल की उम्मीद करना भी बेकार है। जब वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री लंबित पेटेंट आवेदनों की चर्चा कर रहे थे, ठीक उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल सदन को बता रहे थे कि सरकार ने 11 राज्यों में 327 माडल स्कूलों को मंजूरी दी थी तथा 252 करोड़ रुपए जारी भी कर दिये थे किन्तु न तो इन रुपयों का आहरण हुआ और न ही स्कूल खुले। इस एक साल में बहुत सारे निजी स्कूल और खड़े हो गए। जमीन से लेकर मान्यता तक में लाखों के वारे न्यारे हो गए। हर साल कमाई का रास्ता और खुल गया। माडल स्कूलों से क्या मिलता भला। कुछ इसी तरह का मामला 21 फर्जी विश्वविद्यालयों का है। ये विश्वविद्यालय पिछले कितने सालों से सक्रिय हैं इसका कोई रिकार्ड हालांकि नहीं दिया गया है किन्तु इतना तो तय है कि इन विश्वविद्यालयों में अब तक हजारों छात्र अपना स्थायी नुकसान करा चुके होंगे। उनकी डिग्रियों की मान्यता शून्य हो गई होगी। उनके जो साल इसमें बर्बाद हो गए उनकी क्षतिपूर्ति कोई नहीं कर सकता। क्या इन्हें कोई हर्जाना देगा?

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