photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Wednesday, April 28, 2010
शादी और नौकरी
शादी और नौकरी दोनों एक ही गोत्र, एक ही राशि के हैं। दोनों में समानताएं जुड़वा बहनों जैसी हैं। दोनों के ख्याल किशोरावस्था में आने लगते हैं। दोनों की तैयारी करते जवानी आ जाती है। दोनों ही में स्टार्टिंग डिमाण्ड हाई-फाई होती है। दोनों ही में वक्त निकल जाने पर जो हाथ लगा उसे अपनाना होता है। दोनों ही मामलों में जिन्दगी भर पराई थाली में घी ज्यादा नजर आता है। नौकरी अच्छी हो तो खूबसूरत बीवी मिलती है, पत्नी अच्छी हो तो धरती स्वर्ग हो जाती है। जीवन के इन दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से किसी एक की भी उपेक्षा नारकीय कष्ट दे सकती है। भिलाई में हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन में प्रश्न सत्र भी हुए। 98 फीसदी प्रश्न विवाह, नौकरी और कारोबार से जुड़े थे। दो फीसदी लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे। एक प्रकाण्ड ज्ञानी ज्योतिष सबको एक ही जवाब दे रहे थे। आप जब चाहो शादी कर सकते हो किन्तु च्वाइस फैक्टर आड़Þे आ रही है। आप कभी भी 100% श्योर नहीं हो सकते। फिर इतनी नौटंकी क्यों? खूबसूरती का कोई मापदण्ड नहीं होता। जिसे रोज-रोज देखते हो उससे लगाव हो जाता है। अपने माता-पिता, भाई-बहनों को देखो। क्या वे सभी खूबसूरत हैं? फिर भी वे न केवल आपके अपने हैं बल्कि प्यारे भी हैं। नौकरी के संबंध में भी उनकी कुछ ऐसी ही राय थी। वे किस्सा भी सुनाते थे, ‘एक युवक खूबसूरत लड़की से विवाह करना चाहता था। उसके पास शानदार मोटी पगार वाली नौकरी थी। इसलिए खूबसूरत बीवी को वह अपना हक समझता था। किसी की नाक टेढ़ी लगती, किसी की आंख छोटी तो किसी के होंठ पसंद नहीं आ रहे थे। ढूंढते-ढूंढते कब वह 45 का हो गया पता ही नहीं चला। अब वह किसी से भी शादी करने को तैयार है। कहता है विधवा परित्यक्ता भी चलेगी। दूसरा किस्सा एक उच्च शिक्षित युवती का है। उसे घर के पास स्कूल में टीचर की नौकरी मिल रही थी। उसका कहना था कि वह ऐसी टुच्ची नौकरियों के लिए नहीं बनी। उसने पीएचडी भी कर लिया। एक निजी कालेज में नौकरी आफर हुई, उसने इंकार कर दिया। अब वह एक कंपनी में फ्रंट आफिस जाब कर रही है। घर पर ट्यूशन पढ़ा रही है।’ कहना न होगा कि दूसरे दिन उस ज्योतिष महाराज के पास कोई भी नहीं गया। लोगों की भीड़ उस बाजीगर के पास जुट रही थी जो वशीकरण का ताबीज दे रहा था, भाग्योदय के रत्न बेच रहा था, संकटहरण नुस्खे बता रहा था। राहू-केतु का खेल समझा रहा था। नीच और उच्च के शनि-बुध के समीकरण बता रहा था। हाथ की रेखाओं से सुनहरा भविष्य खोजकर निकाल रहा था। वह सपनों का सौदागर था। सपने बेच रहा था। लोग खरीद रहे थे। परेशानहाल को वैसे भी क्या चाहिए, तसल्ली!
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