जब सरकार कहती है कि लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठ रहा है, तब भले ही लोग हंसते हों किन्तु यह हकीकत है कि कुछ लोगों का जीवन स्तर वाकई बहुत ऊपर उठ गया है। यह अलग बात है कि आज भी वह सब्जी वाले से पाव के रेट को लेकर बहस करता है किन्तु यह भी सही है कि वह एक पीस प्याज के 12 रुपए भी हंसते हंसते अदा करता है। जी हां! भले ही आज भी देश के 70 फीसदी लोग छोटे-छोटे होटलों में प्याज के टुकड़े मांग कर खाने में यकीन रखते हों किन्तु ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है जो बाहर खाने को ‘ट्रीट’ की श्रेणी में रखते हैं। अब गया जमाना सूखे फूलों को डायरी में दबाए रखने का। अब तो प्यार का मतलब उसका प्रदर्शन करना होता है। रोज-रोज न सही हफ्ते में एक बार महंगी आईसक्रीम, पिज्जा, बर्गर, चाईनीज या बाहर का खाना खिलाना पड़ता है। जाहिर है गर्लफ्रेंड या बीवी को लेकर कोई सड़क छाप भोजनालय में तो जाएगा नहीं जहां दरवाजे पर किचन आपका स्वागत करता है। वह तो पेट भरने वालों की जगह है। वहां प्याज-ककड़ी-नींबू का टुकड़ा मांगने से मिल जाता है। भले ही वहां ताजा खाने की गारंटी हो किन्तु वहां न तो प्राइवेसी होती है और न क्लास। एकांत का साफ सुथरा टेबल, टेबल क्लाथ। टिशू पेपर का ‘गुलदस्ता’। कहीं कहीं कटलरी (छुरी-कांटा) भी। चीनी मिट्टी के बरतन। रंगीन छपाई वाला मीनू कार्ड। वर्दीधारी वेटर। ऐसे होटलों में कोई छोटू-टिल्लू या काका खाना सर्व नहीं करता। ऐसे होटलों में प्याज को चक्कों में काटा जाता है। स्टेनलेस स्टील की छोटी प्लेट में नहीं बल्कि चीनी मिट्टी के बड़े से प्लेट पर सजा कर परोसा जाता है। यहां पानी की बोतल वैसे ही लाकर नहीं रख दी जाती बल्कि उसे नैपकिन में लपेट कर शैम्पेन की तरह पेश किया जाता है। लिहाजा रेट भी अजब लगता है। एक प्याज का 12 रुपए, एक बोतल पानी का 30 से 70 रुपए। दो चम्मच चावल 40 रुपए का। चपाती तो ऐसी जगहों पर मिलती ही नहीं। 10-20 रुपए की तंदूरी रोटी और इसी अनुपात में कुलचा-नान। यहां आने वाले लोग खाते कम, चुभलाते ज्यादा हैं। एक दूजे की आंखों में झांकते दो चम्मच चावल भी पूरा खाया नहीं जाता। लोग जूठन छोड़कर उठ जाते हैं। क्या फिर भी आप कहोगे कि गरीबी बढ़ रही है, जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ रहा?
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