photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Saturday, April 17, 2010
विनाशकाले विपरीत बुद्धि
नहीं! अब रावण जितने ज्ञानी या गुणी लोग पैदा नहीं होते। या यूं कहें कि इस युग में रावण जैसा दशानन तैयार हो भी नहीं सकता। अब तो केवल रावण के अवगुण वाले लोग ही पैदा हो पाते हैं। विनाशकाले विपरीत बुद्धि वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए रावण ने हर उस व्यक्ति को लात मारकर दरबार से बाहर कर दिया था जिसने उसे माता सीता को लौटाकर श्रीराम से सुलह करने की सलाह दी। इससे रावण के साथ केवल वही लोग बच गए थे जो सत्ता के साथ चिपके रहने में ही भलाई समझते हैं। ऐसे लोगों की कमी न तो मुगल काल में थी और न अंग्रेजों के दौर में। तब लोग लूटने आते थे। अब हम खुद लुटने को तैयार बैठे हैं। विदेशों में जाकर सौदा कर आते हैं और फिर मार पीटकर अपने आदमियों को उनके हवाले कर देते हैं। उनकी संपत्ति छीनकर आक्रांताओं को सौंप देते हैं। वैसे त्रिलोकविजयी रावण ने संभवत: नारायण के हाथों अपना वध करवाने के लिए ही यह प्रपंच रचा था। मातासीता को बलपूर्वक अपनाना उनका उद्देश्य कतई नहीं था। अपनी इहलीला समाप्त करने के लिए यह उनकी मजबूरी थी। बचपन में क्रिकेट खेलने जाते थे तो हर कोई उसकी टीम में शामिल होना चाहता था जिसका बल्ला होता था। चिढ़ जाने पर वह अपना बल्ला लेकर घर चला जाता था। इसलिए उसके मूड का पूरा ख्याल रखा जाता था। पाले बाजी का यह खेल पिछले कुछ दिनों से फिर देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब खेलने वाले बड़े-बड़े लोग हैं। इनमें स्थापित बुद्धिजीवी हैं। तरुण विजय ने कहा कि अरुंधति राय को नक्सलियों के बारे में कुछ नहीं पता। वे कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नहीं गर्इं। वातानुकूलित कमरे में बैठकर लिखती हैं। यह तरुण विजय नहीं बल्कि उसके मन की वह हीन ग्रंथि बोल रही थी जिसे बुकर पुरस्कार नहीं मिला। जिसे बतौर लेखक सभ्य समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। तरुण को शायद नहीं पता कि अरुंधति चाय बागान में पैदा हुई थी और कम्युनिज्म के गढ़ केरल में उसका बचपन बीता था। हालांकि किसी का दर्द महसूस करने के लिए अपने सीने में नश्तर चुभाना जरूरी नहीं होता किन्तु यदि तरुण की यह बात मान भी ली जाए तो यह सवाल फिर भी खड़ा रहता है कि खुद तरुण क्या बस्तर में पैदा हुए थे? वैसे हुए भी हो सकते हैं। जब प्रचार तंत्र अपना हो तो व्यक्ति जहां चाहे वहां पैदा हुआ हो सकता है। वे सोनिया और राहुल पर चढ़ दौड़ते हैं कि सीआरपीएफ जवानों की शहादत पर वे खामोश क्यों हैं। हकीकत तो यही है कि इसपर कहने को क्या है? यही क्या कम है कि सोनिया और राहुल उन दोषियों के गिरहबान नहीं पकड़ रहे जिन लोगों ने जवानों को एक ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए भेज दिया जिसकी कोई रणनीति, कोई ट्रेनिंग उन्हें नहीं थी। बेहतर हो कि ऐसे लोग नगाड़ा बजाकर भीड़ इकट्ठा करने से बचें और आत्मनिरीक्षण करें कि गलती कहां हुई। वे उसमें सुधार करें ताकि आइंदा बेकसूर जवानों का कत्लेआम न हो। फिर चाहे वे नक्सलियों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें कुत्तों को खिला दें।
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