Tuesday, April 20, 2010

महंगी पड़ी होशियारी

इंसान ने चक्का बनाया, आग जलायी। रफ्तार और ऊर्जा की चकाचौंध करती ताकत ने उसे अंधा बना दिया और वह सरपट भागने लगा। वह धरती फोड़कर उसके पेट का पानी निकाल लाया। बहती नदियों का प्रवाह रोक दिया। धरती का सीना चीरकर पाताल में उतर गया। वहां से खनिज बाहर ले आया। गला-गला कर धरती के सीने पर इमारतें बना लीं। धरती को छोड़ चांद की तरफ भागा, मंगल तक घूम आया। अपनी बुद्धि के कमाल पर मुग्ध होता रहा। पर प्रकृति का एक पलटवार इंसानी प्रगति की तमाम उपलब्धियों पर प्रश्न चिन्ह लगा जाता है। भूकंप, सुनामी, बाढ़, चक्रवात, तूफान इन सबको हम प्राकृतिक आपदा कहते हैं। आपदा प्रकृति की ओर से आती है तो प्राकृतिक ही कहलाएगी, लेकिन इसके आगमन की पृष्ठभूमि इंसानी करतूतों से ही बनती है। जीवन को आसान बनाने वैज्ञानिक आविष्कार वरदान साबित हुए हैं, लेकिन जब यही तरक्की कुछ इंसानों के लिए स्वर्गिक आनंद और कुछ के लिए नारकीय पीड़ा बन जाए, और आने वाली पीढ़ियों के लिए अस्तित्व के खतरे का प्रश्न उत्पन्न करें, प्रकृति को नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त करें तो सोचना होगा कि ये उपलब्धियां हमें किस कीमत पर हासिल हो रही हैं। दुनिया भर में तबाही मचाने वाले भूकम्पों का सिलसिला सा चल पड़ा है। हैती, तिब्बत, बिहार, पश्चिम बंगाल में हजारों लोगों की जानें गर्इं और अरबों की सम्पत्ति कबाड़ में तब्दील हो गई। विकसित समाज इसकी सीधी जिम्मेदारी लेने के बजाए ग्रीन हाउस गैसों का नाम आगे कर रहा है। ये ग्रीन हाउस गैसें भी अंतत: उसकी करतूतों से उपजी हैं। अपने रहन-सहन के लिए पेड़ों को बेतहाशा काटना, प्राकृतिक ऊर्जा के अधिकतम दोहन की जगह कृत्रिम ऊर्जा का उत्पादन और फिर अपव्यय करना। उस पर नाटक यह कि ऊर्जा बचाने, पर्यावरण संरक्षण की फिक्र सबसे ज्यादा इन्हीं को है। ताजा उदाहरण आईपीएल मैचों का है। टॉस के वक्त पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाता है और शाम के मैच में हजारों वाट के बल्बों की रौशनी कर बिजली का दुरुपयोग होता है। इसका भुगतान वंचित तबका गर्मी में लू और ठंड में खून जमा देने वाली हवाओं से लड़ते हुए अपनी जान देकर चुकाता है। तूफान और बाढ़ के पानी में इनका जीवन बह जाता है और उच्च वर्ग इनकी बरबादी का हवाई जायजा लेता है। लेकिन अब इस उड़ान पर प्रकृति ने खुद पाबंदी लगाई है। आइसलैंड के इजाफालाजोएकुल ग्लेशियर में गत बुधवार को फटे ज्वालामुखी की राख ने पिछले पांच दिनों से दुनिया के पश्चिमी हिस्से को उड़ान से वंचित कर रखा है। 24 देशों में उड़ान सेवाएं बंद हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहला मौका है जब इतने बड़े पैमाने पर उड़ान सेवा बंद हुई हो। आईसलैंड का यह ज्वालामुखी आखिरी बार 1812 में फटा था और तब एक वर्ष तक सुलगता रहा था। यूरेशिया और उत्तरी अमरीका महाद्वीपों की सीमा पर मध्य अटलांटिक पट्टी पर आईसलैंड स्थित है। इस क्षेत्र की भूगर्भीय रचना ऐसी है कि जमीन के भीतर काफी हलचल होती है। ज्वालामुखी के फटने की वजह यही है। ज्वालामुखी की राख और धुएं के बादल आकाश में साढ़े आठ किलोमीटर तक फैले हैं और इनसे हवाई यात्रा के लिए मार्ग साफ न दिखने के अलावा विमानों को भी काफी नुकसान होता है। राख और धुएं के कण विमानों के इंजन में बैठ जाते हैं, जिससे नुकसान होता है। प्रकृति का यह थप्पड़ उस समाज की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए काफी होना चाहिए जिसे लगता है कि वह सर्वज्ञ हो गया है। जो ठोकर खाकर संभल जाए वही इंसान है और जो फिर भी न संभले वह बेवड़ा।

2 comments:

  1. धन्यवाद धीरज जी, आपने हमारा ब्लाग पढ़ा। यदि आपको ऐसा महसूस होता है कि खबरों पर हमारी टिप्पणी सही दिशा में किया जा रहा एक प्रयास है तथा इससे लोगों को विभिन्न ऐसी घटनाओं पर अपनी भड़ास निकालने का अवसर मिलेगा तो कृपया हमें अवगत कराएं। यदि कुछ सुझाव हों तो उनका भी स्वागत है।

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