Wednesday, April 28, 2010

छठी इंद्रीय फेल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में दो छात्रों ने अपनी दो सहपाठियों को कमरे पर बुलाया। छात्राओं की छठी इंद्रीय ने कुछ नहीं कहा। वे बिंदास अपने सहपाठियों के पास पहुंच गर्इं। वहां उनके दो और मित्र मौजूद थे। चारों ने मिलकर उनके साथ वही किया जिसकी खबरें आए दिन पढ़ने को मिलती हैं। मुंबई की एक छात्रा को उसके एक सीनियर ने खामख्वाह कार में लिफ्ट आफर की। छात्रा को एक बार भी उसकी नियत पर शक नहीं हुआ और वह उसके साथ कार में सवार हो गई। रास्ते में जो कुछ भी हुआ वह खबर बन गई। ट्यूटर, मोहल्ले के भइया, पड़ोस वाले अंकल जब चाहे छेड़खानी करके निकल जाते हैं। 99फीसदी मामलों में रिपोर्ट ही नहीं लिखाई जाती। जिन मामलों की रिपोर्ट लिखाई जाती है वह भी हजारों में है। प्रकृति ने सभी को अपनी-अपनी सुरक्षा का औजार दिया है। साही को कांटे, रीछ को घने बाल, हिरण को रफ्तार तो कछुए को सख्त खोल। कुदरत ने औरत को भी एक हथियार दिया था, छठी इंद्रीय। छठी इंद्रीय से वह खतरे को बहुत पहले से ताड़ लेती थी और अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक सावधानी बरतने लगती थी। किसी के इरादे नेक नहीं लगे तो उसके सामने अकेला पड़ने से बचती थी फिर चाहे वह गुरुजी हो, ताऊ हो, चाचा हो या सगा बाप ही क्यों न हो। उसकी इन आशंकों को उनकी माताएं भी समझती थीं। अब तो आधुनिक माताएं खुद ही बेटी को उकसाती हैं। ज्ञात रहे कुदरत ने मनुष्य को छोड़Þ सभी प्राणियों में नर को खूबसूरत बनाया है। अपनी मादा को रिझाने के लिए मोर नाचता है, मुर्गा कलगी हिलाकर गर्दन लहराता है, शेर अपनी केशर नुमा जुल्फों को लहराता है तो मेढक अपने गले की थैली में हवा भरकर टर-टराता है। इंसान इसका अपवाद है। यहां नारी खूबसूरत होती है। उसकी खूबसूरती के आगे पुरुष लार टपकाता फिरता है। इन अस्त्रों से लैस नारी जब खुद ही आ बैल मुझे मार करे तो क्या हो? नारी वादी कहते हैं कि औरत पर दोष मढ़ देने से पुरुषों के खून माफ नहीं हो जाते। मत हों। पुरुष अपने खून माफ करवाने के लिए मरा नहीं जा रहा। वह तो लड़की को रिझाने के लिए सातवीं मंजिल से कूदने को तैयार है, 80 की रफ्तार से भीड़ भरी सड़कों से गुजरने को उतावला है। वह स्टॉपी मारकर दुपहिया के पिछले पहिए उठाकर प्रणाम करना चाहता है, व्हीली मारकर गाड़ी को घोड़े की तरह पिछले पांव पर खड़ा करना चाहता है। और फिर उसके लिए सजा तजवीज करके नारी को हासिल क्या होगा? कुछ नहीं। वह लुट चुकी होगी। लोग चटखारे ले लेकर उसके किस्से पढ़ेंगे। औरतें अफसोस में छिपाकर ताने देंगी, ‘हाय! रे कैसे करी होगी.. इतने सारे लड़के..।’ लुटने के दौर में मोबाइल कैमरे की दुआ से वीडियो क्लिप बन गई तो सैकड़ों लोग मजा लेंगे। लूटने वाला सात-आठ-दस साल जेल में रह लेगा। उसे फांसी भी दे दो तो क्या? सवाल इन अपराधों को टालने का है। अपराधों के घटित होने के बाद सजा तजवीज करने का नहीं।

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