Thursday, April 22, 2010

मुफ्त के बाराती

देश में क्रिकेट और आम आदमी का रिश्ता दूल्हा और मुफ्त के बारातियों वाला है। आड़े वक्त में किसी के काम आएं न आएं, लोग उसकी शादी में जमकर नाचते हैं। सांप बनते हैं, बन्दर बनते हैं, रीछ की तरह हुल्ला-हुल्ला करते हैं। ठीक यही हालत क्रिकेट के दीवानों की है। अपने बच्चे को सुबह से शाम तक ट्यूशन, होमवर्क, स्कूल और कोचिंग में उलझाने वाला आदमी फुरसत मिलते ही रिमोट लेकर टीवी के आगे बैठ जाता है। किसी कारणवश मैच छूट जाए तो उसकी हालत किसी ऐसे नशेड़ी की तरह हो जाती है जिसे अपनी खुराक न मिली हो। जब खेल नशा हो जाता है तो नशे के व्यापारी भी पैदा हो ही जाते हैं। थरूर की विदाई बाद अब ललित मोदी के जाने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। अपने खिलाफ हो रही गोलबंदी और सरकारी धमकियों से खौफ खाकर वे आईपीएल की चेयरमैनी छोड़ भी दें तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? जिस तरह मोदी ने आईपीएल का धंधा खड़ा किया है, उसी तरह जगमोहन डालमिया ने एक दौर में क्रिकेट को मुनाफे का कारोबार बनाया था। लगता नहीं था कि कभी कोई डालमिया का बाल भी बांका कर पाएगा। फिर एक दिन डालमिया गए तो उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियों के आरोपों की बाढ़ सी आ गई थी। लगने लगा कि अब तो उन्हें जेल की चक्की पीसने से कोई नहीं बचा पाएगा, लेकिन समय बीतने के साथ ये आरोप हवा होते चले गए। अलबत्ता उनकी विदाई के बाद बीसीसीआई का कामकाज सुधरने की जो उम्मीद की जा रही थी, उसका हाल यह है कि आज की दशा देखते हुए उसका डालमिया संस्करण ही कहीं ज्यादा पाक-साफ जान पड़ता है। मान लें, मोदी नहीं मानते और अगली 26 अप्रैल को आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल को उन्हें धक्के देकर बाहर निकालने का फैसला करना पड़ता है। इससे क्या बीसीसीआई के अपने पाप धुल जाएंगे? टीमों के लिए फाइनैंसर जुटाने और उनके पक्ष में बोली छुड़ाने से लेकर भारत के बजाय विदेश में टूर्नामेंट कराने तक के किसी भी फैसले में क्या ललित मोदी के अलावा किसी और व्यक्ति का नाम कहीं सुनने को भी मिला था? बीसीसीआई के लोग आज चाहे जो भी कहें, लेकिन सारे तथ्यों का इशारा इसी तरफ है कि मोदी को आईपीएल का तानाशाह बनाने का फैसला बीसीसीआई का सामूहिक फैसला है, और ऐसा उसने इसलिए किया था क्योंकि उनके जरिए इस संस्था से जुड़े सभी बड़े लोगों को कुछ न कुछ फायदा मिल रहा था। और बीसीसीआई को भी छोड़िए। इतने दिनों से हमारी ईमानदार केंद्र सरकार क्या कर रही थी, जिसका दावा है कि ललित मोदी के कई सारे घपलों की जानकारी इनकम टैक्स डिपाटर्मेंट की एक रिपोर्ट की शक्ल में उसके पास पिछले छह महीनों से पड़ी है? क्या इस रिपोर्ट को दिन का उजाला दिखाने की याद उसे तभी आई जब एक माननीय मंत्री इस्तीफा देने को मजबूर हो गए? क्या इस देश में कोई इस बात की गारंटी ले सकता है कि मोदी के पद छोड़ देने के बाद आईपीएल के खिलाफ चल रही सारी जांचें ठप नहीं हो जाएंगी, और इस सिलसिले में सरकार के पास पहले से मौजूद रिपोर्टें किसी अंधेरे कोने में सड़ने के लिए नहीं डाल दी जाएंगी? दरअसल, भारत की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है कि यहां व्यक्तियों को मुद्दा बनाकर व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं पर पर्दा डाल दिया जाता है और आईपीएल इसका अपवाद नहीं होगा।

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