photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Wednesday, April 21, 2010
पाकेटमार की पिटाई
बस स्टाप पर एक युवक की बेदम पिटाई हो रही थी। जिसे मौका मिल रहा था एकाध हाथ जमा देता था। लोगों पांव के जूते हाथों में लिये पिले पड़े थे। जिसे वे पीट रहे थे वह दोनों बाहों के बीच अपने सिर को छिपाए चुपचाप मार खा रहा था। तभी पुलिस पहुंची और भीड़ अंतिम लात, घूंसा मारकर परे हट गई। पुलिस ने दो लातें और जमार्इं और पूछा पाकिट मारी? युवक ने हामी भरी और मुट्ठी में से पर्स को फिसल जाने दिया और फिर बेहोश होकर पसर गया। शायद कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। उसे देखते ही दिल्ली का वह डाक्टर याद आ गया। हां! उसका नाम वरुण कौल है। वह एमबीबीएस डाक्टर है। टेबिल टेनिस का राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुका था। उसके पिता भारतीय नौसेना में चिकित्सक थे। उसने किसी फौरी जरूरत के लिए नहीं बल्कि अपना शौक पूरा करने के लिए फर्जी डिमांड ड्राफ्टों के जरिये कार डीलरों को चूना लगाया। मजे की बात यह है कि उसके पिता ने भी इसमें उसका साथ दिया। फर्जी डिमांड ड्राफ्ट देकर इस इज्जतदार आदमी ने टाटा सफारी, स्कार्पियो और होंडा सिटी खरीदी। यह एक प्रकरण यह बताने के लिए काफी है कि जरूरी नहीं है कि जुर्म गरीबी और जरूरत की खातिर ही किया जाए। अपना शौक पूरा करने के लिए नौजवान पीढ़ी अपराध करने से भी गुरेज नहीं कर रही है। दरअसल, यह अपराध का नया और बेहद डरावना चेहरा है। चिंता का पहलू यह है कि ऐसे गैर पेशेवर अपराधियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो उच्च शिक्षित होने के साथ-साथ संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। यह कंगाल अथवा मजबूर लोग नहीं हैं। यह मध्यम वर्ग की वह संतानें हैं, जिनके पास समृद्धि हासिल करने के तमाम विकल्प हैं। पर जिन्हें पैसे की हवस अपराध की राह पर ले जा रही है। इन अपराधियों को पकड़ना पुलिस के लिए भी कम चुनौतीपूर्ण काम नहीं है, क्योंकि उनका रिकार्ड पुलिस के पास उपलब्ध नहीं रहता। पुलिस को भी नहीं सूझ रहा कि ऐसे अपराधियों को अपराध शास्त्र की किस श्रेणी में रखा जाए? पुलिस अक्सर इन शातिराना अपराधियों के रहन-सहन व सामाजिक रुतबे से चकमा खा जाती है, लेकिन डॉक्टर की गिरफ्तारी से इतना तो पता चलता है कि अपराधी चाहे कितना भी चालक और शातिर हो, कानून की गिरफ्त से नहीं बच सकता है। मुख्य सवाल लालच की उस संस्कृति के खात्मे का भी है, जिसके वशीभूत लोग अपराध की डगर पर चल निकले हैं। आत्मानुशासन के सिवाय अपराध के इस नये सिलसिले को थामने की कोई दूसरी राह नहीं दिखती है।
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