Friday, April 16, 2010

कचरे का निपटान

गर्मियों में जब पानी की किल्लत सामने आई तब दुर्ग जिला कचहरी के शतायु कुएं की भी याद आई। अच्छा हुआ कि इसकी याद आ गई। 1906 में बने 40 फुट गहरे इस कुएं से ऐतिहासिक सामग्रियां बरामद हुर्इं। 1945 की हत्या में प्रयुक्त तलवार, 1947 की गुप्ती, खंजर, 1970 का चाकू और न जाने क्या-क्या। कत्ल के मामलों में पुलिस के पास इस तरह की चीजों का अम्बार लगता है। केस का फैसला होने तक ये सभी ‘एक्जीबिट’ होते हैं जिन्हें अदालत में पेश करना होता है। फैसला आ जाने के बाद ये चीजें बेकार हो जाती हैं। इन चीजों में खून आलूदा मिट्टी, खुरचन, कपड़े, दाग और धब्बे वाले अंत:वस्त्र, लावारिस लाशों का बिसरा आदि भी शामिल होते हैं। नश्वर सामान गल कर नष्ट हो जाते हैं या जला दिये जाते हैं। अलबत्ता धातु के बने हथियार नष्ट नहीं होते। इन्हें बंडल बांधकर तालाब या कुएं में फेंक दिया जाता है। कुछ थानों में इन वस्तुओं को पेड़ों पर पोटलियों की शक्ल में लटका हुआ भी देखा जा सकता है। पुलिस को हम ‘गरीब की बीवी गांव की भौजाई’ वाले रोल में देखने के आदी हैं। इसलिए जितने मुंह उतनी बातें हुर्इं। लोगों ने पुलिस को इस लापरवाही के लिए कोसा। किन्तु यदि हम अनावश्यक वस्तुओं के निपटान की अपनी आदतों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि स्थिति बेहद खराब है। अनावश्यक चीजों के साथ हम भी यही सलूक करते हैं, बल्कि इससे भी खराब सलूक करते हैं। बस या ट्रेन में बैठकर केला खाया, छिलका रास्ते पर या प्लेटफार्म पर फेंक दिया। घर में सुबह झाड़ू लगाया और कूड़े को उठाकर बाहर हवा में उछाल दिया। पालीथीन के पैकेट में सामान लेकर आए। सामान निकाल लिया और पालीथीन को बाहर फेंक दिया। कबाड़ निपटान को हम बेहद हल्के से लेते हैं। इलेक्ट्रानिक युग में कचरा बेहद खतरनाक हो सकता है। बैटरियों पर लिखा होता है कि उपयोग के बाद इसे जलाया न जाए। मोबाइल फोन, पुराना रेडियो, टीवी के पुर्जे, इन सभी चीजों के निपटान में बेहद सावधानी की जरूरत होती है किन्तु हम इसकी चिंता नहीं करते। और तो और विदेशों से इन वस्तुओं का कबाड़ खरीद कर लाते हैं ताकि उनसे रकम कमाई जा सके। रिसाइक्लिंग की जा सके। दिल्ली के मायापुरी में एक कबाड़ी रेडियोधर्मी कबाड़ ले आया। रेडियेशन के सम्पर्क में आने से लोग बीमार पड़ गए। इनमें मालिक खुद भी शामिल था। देश भर में हंगामा हो गया। वैसे यह कोई नई बात नहीं। हंगामा तो हम किसी भी बात पर कर सकते हैं, पर अपनी आदत नहीं सुधार सकते। हंगामा करने का एक अलग मजा है। इससे हम लाइम लाइट में आ जाते हैं। लोगों का ध्यान हमपर जाता है और हमारे अहम की तुष्टि होती है। जबकि आदत में सुधार कर हम केवल खुद को सुधार सकते हैं। अपने आसपास के माहौल को बेहतर बना सकते हैं, सुरक्षित बना सकते हैं। इसके लिए शाबासी देने का कोई पैमाना नहीं है। किसी ने देख लिया तो अच्छा कह दिया। बस इससे अधिक कुछ भी नहीं। जबकि ऊटपटांग हरकतों से हम सुर्खियों में आते हैं। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर छप सकते हैं, इलेक्ट्रानिक मीडिया पर छा सकते हैं। यदि ऊटपटांग हरकत निराली हुई तो लिमका या गिनीज बुक में भी दर्ज हो सकते हैं। इसलिए बेतरतीबी जिंदाबाद।

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