Sunday, April 25, 2010

पालीथीन में पर्यावरण

बीते दिन कपड़ों का थैला लेकर बाजार जाने के। अब तो हर चीज पालीथीन के कैरीबैग में मिल जाती है। थैला तो केवल गंवार लेकर चलते हैं। एक पाव, आधा किलो सब्जी खरीदने वाले अब गाड़ियों से बाजार जाते हैं। रही सही कसर पालीथीन में सब्जी खरीदकर पूरी करते हैं। फिर पर्यावरण पर भाषण देते हुए निकल जाते हैं। पृथ्वी दिवस पर हमने पर्यावरण को संरक्षित करने तथा पृथ्वी की रक्षा करने का संकल्प लिया है, किन्तु यह औपचारिकता मात्र है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 में दिए गए निर्देशों का उल्लंघन होने पर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। अधिनियम की धारा 5 के अनुसार पर्यावरण से सम्बन्धित निर्देशों का उल्लंघन होने पर केन्द्र सरकार उद्योग को बन्द करने का आदेश दे सकती है। धारा 15 के अंतर्गत 5 वर्ष तक के कारावास अथवा एक लाख रुपए जुर्माना अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है। धारा 19 आम नागरिक को यह अधिकार देती है कि वह सरकार अथवा किसी भी प्राधिकृत संस्थान के विरूद्ध कार्रवाई प्रारम्भ करे। अब यह तथ्य प्रत्येक नागरिक के ज्ञान में है कि प्लास्टिक, जिसमें पॉलीथिन बैग, गिलास, प्याले व पत्तल-दोने शामिल हैं, धरती की उर्वरा शक्ति को कितनी हानि पहुंचा रहे हैं। पान मसाले व जर्दे के पाउच भी प्लास्टिक से बने होते हैं। उत्पादनकर्ता, विक्रेता और उपभोक्ता बिना किसी संकोच के इन प्लास्टिक अपशिष्टों से धरती का सीना छलनी कर रहे हैं। निजी समारोहों में ही नहीं, राजकीय समारोहों में भी भोजन प्लास्टिक की पत्तलों व दोनों में परोसा जाता है। प्लास्टिक के गिलासों में पानी पी रहे हैं। राजस्थान सरकार ने एक अगस्त से प्रदेश में प्लास्टिक की थैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। किंतु इतने से ही काम नहीं चलेगा। सर्वाधिक प्लास्टिक प्रदूषण पान मसाले व जर्दे के पाउचों, प्लास्टिक पत्तलों, दोनों तथा गिलासों से होता है। शुद्धता की नई फैंसी ने यूज-एंड-थ्रो को बढ़ावा दिया है। यह सही है कि पहले भी लोग शादी ब्याह या अन्य सामूहिक भोजन में धोए जाने वाले बर्तनों का उपयोग नहीं करते थे। इसमें कई दिक्कतें थीं। एक तो बड़े पैमाने पर बर्तनों को धोने की व्यवस्था करना और उसपर भी उसकी सफाई की गारंटी न होना एक बड़ी समस्या थी। इसलिए दोना पत्तलों का उपयोग किया जाता था। चूंकि लोग बैठकर खाते थे इसलिए कोई समस्या नहीं आती थी। किन्तु अब पार्टियों में लोग खड़े खड़े खाते हैं। इसलिये पत्तलों का मजबूत होना जरूरी है। पत्तों से बने पत्तलों को हाथ में लेकर खाया नहीं जा सकता इसलिए थर्मोकोल और प्लास्टिक पदार्थों से बनी मजबूत थालियों का चलन बढ़ा। यह वक्त का तकाजा है कि अब ऐसे दोना पत्तलों का विकास किया जाए तो पूरी तरह से या तो रिसाइक्लेबल हों या फिर जल्द से जल्द नष्ट होकर मिट्टी बन जाते हों। विज्ञान को इस दिशा में प्रयास करने होंगे। चांद और मंगल पर जाना उतना जरूरी नहीं है जितना की हमारी अपनी धरती को बचाए रखना।

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