Tuesday, April 20, 2010

एमआरपी और इज्जतदार

ग्राहकों को जगाने के तमाम अभियान इस्पात नगरी में आकर फेल हो गए हैं। यहां इज्जतदार ग्राहक जागरूक नहीं और यदि किसी तरह जाग गया तो उसकी इज्जत नीलाम होते देर नहीं लगती। एमआरपी याने मैक्ज़िमम रिटेल प्राइस। हिन्दी में इसे कहते हैं सर्वाधिक खुदरा मूल्य। यह वस्तु का न्यूनतम मूल्य नहीं है। कोई वस्तु बनती देश के किसी कोने में है और बिकती पूरे देश में है। हर जगह अलग-अलग टैक्स, हर जगह पहुंचने का अलग-अलग भाड़ा। इन सब बातों का ख्याल रखकर एक एमआरपी तय की जाती है जिससे अधिक नहीं लिया जा सकता। चूंकि यह मूल्य उत्पादन स्थल से अधिकतम दूरी के लिए निर्धारित होती है इसलिए आम तौर पर एमआरपी से कुछ कम में बेचने पर भी दुकानदार को कोई नुकसान नहीं होता बल्कि अधिकांश दुकानदार ऐसा ही करते भी हैं। इस्पात नगरी में एक ही वस्तु सिविक सेन्टर, सेक्टर-6, जवाहर मार्केट और सुपेला में अलग-अलग दामों में बिकती है। सभी जगह एमआरपी एक ही होता है किन्तु वास्तविक बिक्री मूल्य कम ज्यादा होता है। इज्जतदारों वाले मार्केट में एमआरपी पर माल खरीदने वाले कस्टमर अधिक होते हैं। ग्राहक ने थोड़ी भी जागरूकता दिखाई तो दुकानदार पहले तो यही कहता है कि इस आयटम में बिल्कुल मार्जिन नहीं है। फिर कहता है, ‘आपसे गलत नहीं लेंगे।’ जब ग्राहक किसी और दुकान के बारे में बताता है तो वह भड़क जाता है और अपना माल वापस खींच कर कहता है, ‘वहीं चले जाइए।’ ग्राहक खामोशी से बाहर निकलने लगता है तो उसके कानों में यह शब्द पिघले शीशे की तरह पड़ते हैं, ‘न जाने कहां-कहां से चले आते हैं।’ ग्राहक मुंहजोरी नहीं करता। वह अपना दांव खामोशी से खेलता है। जिस बाजार में पैदल चलना मुश्किल था वहां ग्राहक अब कार लेकर पहुंचते हैं। पहले ग्राहकों की राशन दुकानें फिक्स होती थीं, अब कपड़ों से लेकर जूतों तक की दुकानें फिक्स हो गई हैं। वह सदव्यवहार चाहता है। वाजिब दाम चाहता है। वैसे शहर में इज्जतदार होने के तरीके भी नायाब हैं। अंचल के एक नामचीन कदरन नए होटल में जाने का मौका मिला। महलों जैसा इंटीरियर। कभी हम वेटरों को तो कभी अपने आप को देखते थे। हमारा स्पांसर बड़ा था। वह इससे नीचे के होटल में नहीं जाता। उसे तो इस होटल से भी शिकायत थी। हमारा टेबल बुक था। पहले स्टार्टर आया। हमने किक मारी और स्टार्ट हो गए। अलबत्ता मेजबान सेल्फ मार रहा था। उसे स्टार्ट होने में थोड़ा वक्त लगा। इस बीच हमारी निगाह डाइनिंग हाल में घूम गई। औद्योगिक क्षेत्र का सबसे बड़ा बिजली चोर कोने के टेबल पर सपरिवार बैठकर 20 रुपए नग रोटी खा रहा था। गौर से देखा तो एक अंधेरे कोने में एक स्थापित शाकाहारी परिवार दोनों हाथों से किसी वस्तु को पकड़कर उसे दांतों से नोंच रहा था। इच्छा हुई कि उसे बताऊं कि खाना ही हो तो वहां खाओ जहां यह सब फ्रेश मिलता है। फिर अगले की इज्जत का ख्याल आ गया। हकीकत यही है कि एक वर्ग के लोगों को अब एमआरपी की परवाह नहीं रही। देशी अंग्रेजों की यह पीढ़ी आम आदमी से दूरी बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकती है।

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