Friday, April 16, 2010

ताड़मेटला के साइड इफेक्ट्स

दंतेवाड़ा के नक्सली हमले पर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के लेख से कांग्रेस में भूचाल आ गया है। दिग्विजय सिंह ने एक लेख में सपाट लहजे में कह दिया कि पी चिदम्बरम उनके अच्छे मित्र हैं किन्तु उनका मानना है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अड़ियल स्वभाव के हैं। दिग्विजय सिंह ने लिखा कि नक्सलियों के खिलाफ युद्ध छेड़ देना ठीक नहीं है। यह एक आर्थिक सामाजिक समस्या है जिसका हल इस तरह से नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने कहा कि गोलियां चाहे नक्सली चलाएं या सुरक्षा बल अंतत: मौत आदिवासियों की ही होनी है। इस लेख के प्रकाशित होते ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस परेशानी में पड़ गई है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य के केशव राव और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य अजीत जोगी भी दिग्विजय सिंह के समर्थन में आ गए हैं। केशव राव इसपर दिग्विजय से भी दो कदम आगे पहुंच गए। उन्होंने कहा कि वनवासियों पर हम पिछले चार दशकों से बातें कर रहे हैं किन्तु उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं ला पाए हैं। हम आज भी केवल बातें ही कर रहे हैं। हमें वहां विकास कार्य करने चाहिए। इसकी रक्षा के लिए सुरक्षात्मक, संरक्षात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। वे कहते हैं, पाकिस्तान हम पर बार बार हमले करता है। कारगिल में हजारों जवान शहीद हुए, क्या हमने पाकिस्तान से बात करना छोड़ दिया? फिर हम नक्सलियों से बातचीत क्यों नहीं करना चाहते? कांग्रेस का तटस्थ धड़ा भी इन विद्रोहियों के खिलाफ नहीं है। वह केवल इतना चाहते हैं कि इन बातों को पार्टी फोरम में उठाया जाना चाहिए ताकि पार्टी अपना रुख स्पष्ट कर सके। छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के इकलौते सांसद चरणदास महंत ने इस मौके का दूसरा फायदा उठाया। उन्होंने नक्सलियों और भाजपा में सांठगांठ का आरोप लगाते हुए कह दिया कि नक्सल उपद्रव वाले अंचलों में भाजपा ने नक्सलियों से सांठगांठ कर रखी है। यही वजह है कि वहां न केवल भारी मतदान होता है बल्कि भाजपा ही जीतती है। दरअसल नक्सल समस्या पर मनभेद और मतभेद आरंभ से हैं। हमने पहले भी कहा है कि नक्सल समस्या अंधों का हाथी है। जो जिधर से छूता है उसे वैसा समझ में आता है। इस एक ही समस्या का देशभर में अलग अलग नाम है। कहीं ये माओवादी उग्रवादी कहलाते हैं तो कहीं प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के सदस्य कहलाते हैं तो कहीं केवल नक्सलवादी कहलाते हैं। इसका लाभ चरमपंथियों को मिलता है। वे जानते हैं कि जब दुश्मन अपने ही घर में लड़ पड़े तो उसे कमजोर समझना चाहिए। जनता में भी गलत सूचना जाती है। सरकार पर से उसका भरोसा उठने लगता है। ताड़मेटला मुठभेड़ के ये साइड इफेक्ट्स इस अभियान को कमजोर कर सकते हैं।

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