Tuesday, April 13, 2010

डाक्टर रमन सिंह ने दिखाया दम

दंतेवाड़ा का ताड़मेटला गांव पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है। यहां नक्सलियों को ढूंढने निकली सीआरपीएफ की पार्टी पर जबरदस्त एम्बुश हुआ और 76 जवानों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। देश में नक्सलियों द्वारा किए गए इस सबसे बड़े एम्बुश के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक हिल गए थे। लोगों में ऐसी दहशत व्याप गई थी कि जवानों के प्रशिक्षण से लेकर इस अभियान के औचित्य तक पर उंगलियां उठने लगी थीं। पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व आईपीएस-आईएएस अधिकारियों तथा मानवाधिकार वादियों ने दिल्ली में जमकर हंगामा काटा। लोगों को लगा कि सरकार डिफेंसिव हो जाएगी। किन्तु ठाकुर ऐसा नहीं करते। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री इतने कमजोर नहीं हैं। जितने दमखम के साथ वे मीडिया का सामना करते हैं, उतने ही साहस के साथ वे आसन्न मौत का भी सामना कर सकते हैं। जब मामला जवानों का हौसला बढ़ाने का हो तो वे एयरकंडीशंड आफिस में बैठकर भाषण नहीं देते बल्कि सीधे दुश्मन के घर तक पहुंचकर अपनी आवाज बुलंद करते हैं। ग्राम सुराज के इस चरण का आगाज धुर नक्सल क्षेत्र में कर मुख्यमंत्री ने यह साबित कर दिया है कि उनका साहस दिखावटी नहीं है। वे न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामरिक चुनौतियों का सामना भी मैदान में उतर कर करने को तैयार हैं। इसमें रंचमात्र की भी अतिशयोक्ति नहीं है कि उनके इस कदम से न केवल उन गांव वालों का हौसला बढ़ा है जो ताड़Þमेटला और उसके आसपास के गांवों से पलायन करने लगे थे बल्कि दूर-दराज से यहां भेजे गए सीआरपीएफ के जवानों का उत्साह भी दोबाला हो गया है। कहते हैं कि युद्धभूमि में सेनापति की दृढ़ता और दक्षता दोनों का बराबर महत्व होता है। इसका सैनिकों के मनोबल पर जबरदस्त असर होता है। उनके भीतर यह विश्वास पैदा हो जाता है कि जब तक सेनापति उनके साथ है उन्हें कोई हरा नहीं सकता, पराजित नहीं कर सकता। ऐसे सेनापतियों के नाम इतिहास में स्वर्णिण अक्षरों में दर्ज हैं। नक्सली चुनौती एक लंबे समय तक चलने वाली समस्या है, यह सभी जानते हैं। यह विवादास्पद ही सही पर एक विचारधारा है जिसका पूरी तरह सफाया कभी नहीं किया जा सकता। किन्तु इसी को सत्य मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे भी नहीं रहा जा सकता। किसी को तो पहल करनी थी। वह पहल छत्तीसगढ़ के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने की है। इसके लिए वे बड़ी कीमत चुका चुके हैं, चुका रहे हैं और आगे भी ऐसे बहुत मौके आएंगे जब उनके आंसू बहेंगे किन्तु एक कर्त्तव्य निष्ठ दृढ़ सिपहसालार की तरह वे इन झंझावातों का मुकाबला करते रहेंगे। यही ठाकुर की आन, यही उसकी शान और यही उसकी पहचान है। एक कोमल हृदय चिकित्सक जब किसी बीमारी के पीछे पड़ता है तो औषधि, पथ्य, शल्यक्रिया किसी भी विधा से परहेज नहीं करता। डॉ. रमन सिंह तो आयुर्वेद के चिकित्सक हैं। वे किसी भी रोग को जड़मूल से उखाड़ कर फेंकने में यकीन करते हैं और वे यही कर रहे हैं। ईश्वर उन्हें कामयाबी दे।

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