photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, April 16, 2010
वैकेशन होमवर्क
मुसद्दीलाल मकान शिफ्ट कर रहे थे। दस चक्के का ट्रक घर के सामने खड़ा था। पुराना टेबल पंखा, टूटा केरोसीन स्टोव, पुराने बिस्तर-गद्दे, पुराने कपड़ों की पोटलियां, टूटी चप्पलें सबकुछ मोटरा बांधबांधकर ट्रक में डाला जा रहा था। हमसे रहा नहीं गया। वैसे भी मोहल्ले में मास्टर होने की इज्जत हासिल थी। पूछा, ‘भई इन पुरानी चीजों को ढोते फिरने का क्या फायदा? इस कबाड़ को ढोने के लिए ही इतना बड़ा ट्रक मंगवाना पड़ा है।’ मुसद्दी मुस्कराए। बोले, ‘कोई और कहता तो कोई बात नहीं थी, कम से कम आप तो मत ही बोलो। कबाड़ ढोना मैंने शिक्षा विभाग से ही सीखा है। नई-नई चीजें जुड़ती जा रही हैं, पुरानी को फेंक नहीं रहे। बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ बढ़ता ही चला जा रहा है। जिस इतिहास से हम कभी सबक नहीं लेते, उसे पढ़ना क्यों जरूरी है, समझाएंगे? जिन पूर्व प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों को देश भूल चुका उनके बारे में बच्चों को क्यों पढ़ाया जा रहा बताएंगे? यूरो-4 के जमाने में पाषाण युग क्यों रटाया जा रहा, विलुप्त प्राणियों पर क्यों वक्त बरबाद किया जा रहा कोई बताएगा?’ वे कहते ही चले जा रहे थे और हम अपने वस्त्रों में धंसते चले जा रहे थे। ‘इन बातों पर हमारा जोर नहीं चलता। हम तो बताया गया सिलेबस पढ़ाते हैं’, हम मिमियाये। मुसद्दीलाल तमतमा गए। छूटते ही कहा, ‘तो इसका जवाब दीजिए। रिजल्ट आने के बाद बमुश्किल दस दिन स्कूल लगा है। होमवर्क में तीन महीने का कोर्स दे दिया है। इसे बच्चा घर पर पढ़ेगा, या फिर ट्यूशन वाले से पढ़ेगा। क्या स्कूल उसकी फीस लौटाएगा? बच्चे के पास गांव जाने के लिए छुट्टियां नहीं। एलटीसी, एलएलटीसी लैप्स हो रहा है और उसे केरल का बैकवाटर पढ़ा रहे हो। मुर्शिदाबाद, ग्वालियर, आगरा, दिल्ली बता रहे हो। आपको क्या पता कि उसके लिए इन जगहों में और कार्टूनों की दुनिया में अब कोई फर्क नहीं रहा। न ये यहां जा सकते हैं और न वहां जा सकते हैं।’ हम सोच में पड़ गए। सच ही तो कहते हैं मुसद्दीलाल। बचपन में गर्मियों की छुट्टियां लगती थीं तो हम गांव जाते थे। रिश्तेदारों से मेल मुलाकात होती थी। बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी से परियों, राजकुमारों की कथाएं सुनते थे। ये कहानियां उन्हें जीवन भर याद रहती थीं। नाते रिश्तेदारों के बीच रहकर हम संस्कार सीखते थे। रिश्तों को पहचानते थे। बड़े छोटे का लिहाज सीखते थे। अब यह सब बीते दिनों की बात हो चुकी थी। छुट्टियां लगते ही स्कूल के संचालक लंबे टूर पर निकल जाते हैं पर बच्चे अपने अपने घरों में दुबक कर पहाड़ जैसा वैकेशन होमवर्क करते हैं। वह भी ऐसे पाठ का जिसे अभी स्कूल में पढ़ाया तक नहीं गया। माता-पिता, अभिभावक, अड़ोस-पड़ोस की सीनियर स्टूडेन्ट्स, ट्यूशन मास्टर से पूछपूछ कर होमवर्क कर लेता है। इन पाठों को वह घर पर ही पढ़ लेता है। स्कूल मुफ्त में इन पाठों को पढ़ाने की फीस वसूल लेता है। बच्चा मेहनत करता है, अपनी छुट्टियों की कुर्बानी देता है और फिर भी नाम स्कूल का होता है। हमने मुसद्दीलाल के पांव छुए और चुपचाप घर चला आया। बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताए।
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