photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Wednesday, April 21, 2010
अब लगा महंगाई का नम्बर
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आज राजधानी नई दिल्ली में महंगाई के खिलाफ हल्ला बोल हो रहा है। भाजपाइयों का मनोबल ऊंचा है। हाल ही में उन्होंने शशि थरूर को निपटाया है। आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी भी निपटने के कगार पर हैं। किसी भी बड़े यज्ञ के लिए पहले बलि दी जाती है। दो बलियां हो चुकीं। अब यज्ञ शुरू होने जा रहा है। यज्ञ हवन पूर्ण होने पर महंगाई गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाएगी। बताते चलें कि महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन के लिए बाकायदा मुहूर्त निकाला गया था। देश भर में कद्दावर नेताओं को जिम्मेदारियां दी गई थीं कि वे आदमी इकट्ठा करें और उन्हें लेकर दिल्ली पहुंचें। राज्यवार और जिलेवार लोगों को इकट्ठा करने का ठेका हुआ था। वैसे केन्द्र सरकार ने भी अपने कैलेण्डर पर 21 अप्रैल की तिथि पर गोला लगा दिया था। ठीक वैसा ही गोला जैसा दूधवाले के नहीं आने पर श्रीमतीजी दरवाजे के पास लटके भगवान वाले कैलेण्डर पर लगाती हैं। लिहाजा ठीक एक दिन पहले रिजर्व बैंक ने रेपो दर और रिवर्स दर में फेरबदल की सूचना दे दी। आधी जनता कनफ्यूज, अब क्या होगा? मौद्रिक उपाय अर्थशास्त्रियों की समझ में देर से आते हैं, आम आदमी की क्या बिसात? पर वह कन्फ्यूज तो होता ही है। इससे और कुछ हुआ हो या न हुआ हो प्रदर्शनकारियों के मनोबल पर जरूर असर हुआ होगा। वैसे भी भरी गर्मी में एसी-कूलर और घर का आराम चैन छोड़कर कौन मूर्ख ट्रेनों में ठुंसकर भेड़ बकरियों की तरह दिल्ली जाना पसंद करता है। पर मजबूरी है। आगे पद चाहिए तो इतना तो करना ही पड़ेगा। वैसे इस बंद का आम आदमी पर भी भारी असर पड़ा है। आम आदमी बेचारा गर्मियों की छुट्टी में गांव जाने की तैयारी किये बैठा था। दो महीना पहले से रिजर्वेशन करा रखा था किन्तु जब ट्रेन में चढ़ा तो अपनी सीटों पर सिर पर तीन रंगा साफा बांधे युवकों को बैठे देखा। उसका हलक सूख गया। विरोध क्या करता, अपना सामान रखने और बच्चे और लेडिज को बैठाने के लिए अवैध कब्जाधारियों को ‘रिक्वेस्ट’ करने लगा। ट्रेन का कंडक्टर और टीटीई पता नहीं कहां मर गए थे। खड़े खड़े मन को झूठी तसल्ली देता रहा कि भई ये लोग हमारे लिये ही तो दिल्ली जा रहे हैं। ये प्रदर्शन करेंगे तो केन्द्र सरकार की आंखें खुलेंगी। महंगाई कम होगी। थोड़ी राहत मिलेगी। पूरी बोगी का यही हाल था। जिनका रिजर्वेशन था उनका सामान बेंच के नीचे था। बच्चे ऊपर के बर्थ में माइक्रोवेव हो रहे थे। श्रीमतीजी बर्थ के कोने में लटकी कुढ़ रही थी कि चलो जी टिकट कैंसल करो, घर लौट चलते हैं। ऐसे तो बच्चे बीमार पड़ जाएंगे। मन तो श्रीमान का भी यही चाहता था किन्तु बच्चों की जिद के आगे एक न चली। ट्रेन का सफर और मामा के बागीचा का आम खाने की खुशी में बच्चे हर दुख, हर कष्ट झेल गये थे। खूब मन लगाकर पढ़ाई की थी। सफर के एक महीना पहले ही तय कर लिया था कि कौन खिड़की के पास बैठेगा। किन्तु यहां सबकुछ उलट पुलट हो गया था। ऊपर का बर्थ और लोहे की छत के बीच उनका भुर्ता बन रहा था। चेहरे पर बहते पसीने में आम आदमी की बेबसी के आंसू गुम हो रहे थे। ऐसा ही होता है, अकसर ऐसा ही होता है बल्कि अब तो ऐसा ही होता रहेगा।
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