photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, April 30, 2010
बैलट प्रूफ सरकार
सरकार को बुलेट शब्द से नफरत है। वह चाहती है कि लोग बुलेट छोड़कर बैलट (मतदान) के रास्ते पर आएं। इस काम में इसे महारत हासिल है। वह खिलाड़ियों की खिलाड़ी है। इसमें वह अच्छे खासे सूमो पहलवान को पटखनी देने की ताकत रखती है। उसके पास बैलट प्रूफ जैकेट है। जैकेट क्या पूरा कम्बल है। सिर से पांव तक ढंकने वाला। कहने को विधानसभा और लोकसभा में जनता के प्रतिनिधि हैं। लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए सांसद और विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। दरअसल इससे बड़ा झूठ और कुछ हो ही नहीं सकता। ये जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टियों के प्रतिनिधि हैं। इनकी अपनी कोई सोच या समझ नहीं है। जब-जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर सदन में मतविभाजन की बारी आती है, इन्हें पार्टी के प्रति अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है। पार्टी आलाकमान चाबुक (व्हिप) चलाता है और सब सिर झुकाकर दुम हिलाने लगते हैं। यह बात केवल पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वालों पर ही लागू नहीं होती बल्कि उन चिल्हर पार्टियों पर भी लागू होती है जो इनसे बैसाखी उधार लेकर सरकार बनाते हैं। संख्या बल में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विपक्ष है ही नहीं। एक सत्ता पक्ष है और बाकी उसके रिश्तेदार। इनमें आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता है। सरकार किसी की भी बने, ये सभी खुश रहते हैं। महंगाई पर कटौती प्रस्तावों को लेकर भी यही सब होता रहा। शिबू सोरेन ने भाजपा की बात नहीं मानी तो भाजपा ने झारखण्ड में उसकी सरकार की टांग खींच दी। गुरुजी को स्कूली छात्र की तरह मिमियाना पड़ा, ‘मेरी तबियत खराब थी। गलती हो गई। झारखण्ड में सरकार आप ही बना लो।’ गोया कि सरकार जनता ने नहीं चुनी। जनता ने तो केवल मतदान किया है। सरकार तो किसी की कृपा से बनी है। किसी को वह तोहफे में मिली है तो किसी ने उसे किसी समझौते के तहत मोल ली है। केन्द्र बिन्दास है। उसे किसी की परवाह नहीं है। जिसे धमकाना होता है उसके खिलाफ चार छह मामले सीबीआई को सौंप देती है। इनकम टैक्स वाले अलग से पीछे लग लेते हैं। वह हाय! हाय! करता हुआ दौड़कर शरण में चला आता है। पांव पर गिरता है, माफी मांगता है, बाल बच्चों की दुहाई देता है और फिर निष्ठा और समर्पण का वायदा कर अपनी जान छुड़ा लेता है। दलित की बेटी ने एक दांव खेला और अपने हाथी और पुतले बचा ले गई। वामपंथियों को और बहाना नहीं सूझा तो सांप्रदायिक सांप्रदायिक-सांप्रदायिक चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। और जब वित्तीय विधेयक पास हुआ, उस समय संसद में विरोध करने वाला कोई नहीं था। जनता ठगी की ठगी रह गई। पता नहीं क्यों कुछ लोग सत्ता हथियाने के लिए बुलेट-बुलेट खेल रहे हैं जिसमें आज नहीं तो कल उनकी जान जा सकती है। यदि उन्हें सत्ता ही चाहिए तो वे संसद के गलियारों का आईपीएल सीखें। उधारी टट्टुओं और भाड़े के खिलाड़ियों की टीम बनाएं। कोई दमदार फ्रेंचाइजी ढूंढें और देशी-विदेशी कंपनियों के ‘लोगो’ वाला ड्रेस और बल्ला लेकर उतरें। इसमें तो जीत में भी जीत है और हार में भी जीत।
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