Sunday, April 25, 2010

सादगी, खादी और शाकाहार

सादगी की परिभाषा अब बदलने लगी है। यहां बात उन लोगों की नहीं हो रही जो सरकारी दाल-भात केन्द्रों में पांच रुपये में पेट भरते हैं। यहां बात उन लोगों की भी नहीं हो रही जो थाली रेस्तरां में जाते हैं। यहां तो बात उन लोगों की हो रही है जो खादी पहनकर, सफेद कार में बैठकर शुद्ध शाकाहारी गार्डन रेस्तरां में जाते हैं। स्कूलों में ग्रीष्म की छुट्टियां लगी हुई थीं किन्तु हम परेशान थे। नए साल की एनुअल फीस की रकम जुटानी अभी बाकी थी। पुस्तक कापियों और ड्रेस, बैग आदि में पांच हजार रुपए उड़ चुके थे। खर्च कम करने हमने पर्यटन कैंसल कर दिया था। ऐसे में मेहमान आ जाएं तो होश फाख्ता हो ही जाते हैं। मामाजी बहुत दिन बाद आए थे। श्रीमतीजी ने कहा, अच्छा हुआ अकेले आए हैं। कपड़ा लत्ता देने, खाने-खिलाने में दिक्कत नहीं जाएगी। हम भी खुश हुए। चलो सस्ते छूट जाएंगे। शाम को बाहर खाने का कार्यक्रम बना। मामा जी ने शिवनाथ किनारे के एक शाकाहारी रेस्तरां का नाम लिया। समझ में आ गया कि सुबह-सुबह का उनका पड़ोस का दौरा खाली नहीं गया था। खूब बदला लिया था पड़ोसी ने। बहरहाल शाम को हम शिवनाथ किनारे पहुंच गए। बड़ा खूबसूरत समा था। बच्चे खेल रहे थे। टेबलों के इर्द गिर्द गार्डनचेयर्स पर उनके माता पिता बैठे बतिया रहे थे। झक्क सफेद कपड़ों में वेटर आर्डर ले रहे थे। हमने मीनू कार्ड मामाजी की तरफ बढ़ा दिया। शर्माते सकुचाते उन्होंने वेज पुलाव, रायता, ग्रीन सलाद, नान का आर्डर दिया। इस बीच बच्चे रबड़ के विशाल गुब्बारे पर कूदने के दस-दस रुपए लेकर जा चुके थे। लिहाजा हम उनकी तरफ से निश्चिंत थे। खेलने कूदने के चक्कर में वे मीनू कार्ड मांगना भूल गए थे। आधा घंटे बाद भोजन लगना शुरू हुआ। हमने बच्चों को बुला लिया। डिशेज पर नजर फेरने के बाद वे खामोशी के साथ बैठ गए और थोड़ा-थोड़ा खाकर भाग गये। तभी बिल आ गया। चौहद सौ सत्तर रुपये का बिल देखकर हमारी सांस अटक गई। पांच बड़े और दो बच्चों ने ऐसा क्या खा लिया था? इज्जत बचाने के लिए पर्स के कोने में कई महीनों से छिपाकर रखे हुए लाल गांधियों में से दो को हमने खींच लिया। एक झेंपी हंसी के साथ उसे बिल में दबाया और सौंफ-मिस्री पर टूट पड़े। लौटते समय रास्ते में हम तो खामोश थे किन्तु बच्चों ने समीक्षा जारी रखी। इससे तो अच्छा था बोनलेस चिकन चिली ले आते। बीस तंदूरी रोटियों में हम सबका पेट भर जाता। पांच-छह सौ रुपये में पूरा परिवार डकार ले रहा होता। मामाजी खामोश थे। सादा जीवन, सादा भोजन और सादा पहनावे पर उनके प्रवचनों को ब्रेक लग चुका था। दो दिन बाद हम मार्केट गए। खादी का कुर्ता और पाजामा खरीदा। चौहद सौ रुपयों का बिल चुकाया और सामने की दुकान पर लटकते कूटॉन्स में सत्तर फीसदी डिस्काउन्ट का बोर्ड देखते रह गए। लौटते समय मामाजी ने चौक पर गाड़ी रुकवाई। सीधे चिकन चिली की दुकान पर गए। आर्डर दिया और पनवाड़ी के पास तबतक पान बनवाते रहे जबतक कि आर्डर पार्सलपैक नहीं हो गया। फिर बिल चुकाया और खामोशी के साथ आकर गाड़ी में बैठ गए। रात को उन्होंने दबाकर खाना खाया। कुर्ते को ढीला और पाजामा को तंग बताकर उन्हें लौटाना तय कर लिया। बच्चों को सीने में भींचकर बोले, बेटा तुम जीते हम हार गए।

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