Thursday, April 22, 2010

कालिख से लिखा नाम

ताजमहल उनके लिए खास होगा जो इसे प्यार की निशानी के रूप में देखते हैं। ताज उनके लिए भी खास है जो इसे ऐतिहासिक इमारत मानते हैं। ताज उनके लिए भी मायने रखता है जो इसे विश्वधरोहर के रूप में सहेजना चाहते हैं किन्तु जो लोग ताज के आसपास रहते हैं उनके लिए ताजमहल की दीवारों में और सुलभ की दीवारों में कोई खास फर्क नहीं होता। एक का दर्शन सुबह नींद से जागते ही हो जाता है तो दूसरे को प्रतिदिन देखने जाना अनिवार्य होता है। अकेला ताज ही क्यों बल्कि आगरा स्थित प्रत्येक धरोहर वहां के स्थानीय बाशिंदों के लिए एक जैसा है। वे उन्हें देख-देख कर ऊब चुके हैं। उनकी दिलचस्पी उन लोगों में है जो इन धरोहरों को देखने आते हैं। उनसे उनकी रोजी-रोटी जुड़ी है। इंसानों की हर बस्ती की तरह प्यार यहां भी पनपता है। प्यार में डूबे युवा जोड़े चाहते हैं कि लोग उन्हें जानें, उनके प्यार की तसदीक करें और उन्हें याद रखें। अब स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने के लिए तो खुद के इतिहास बन जाने का इंतजार करना होगा। क्या पता उसके बाद भी उनका नाम इतिहास में आए न आए। लिहाजा अपना हाथ जगन्नाथ। उठाया जली हुई लकड़ी का टुकड़ा और घसीट दिया अपना नाम। फलां+ ढिमका। वैसे जमाना कोड लैंग्वेज का है। इसलिए अब पूरा नाम नहीं लिखा जाता। सु+गी, पु+अ लिखना काफी माना जाता है। कूट भाषा की बात चली तो याद आया, एक मित्र अपनी बिटिया के मोबाइल का मुआयना कर रहे थे। फोनबुक में नाम बहुत कम थे। अलबत्ता एए, 22, केके, एल4यू जैसे कूट नाम ढेरों थे। जिस नम्बर से सर्वाधिक काल आए थे, वह फोनबुक में नहीं था। शायद नम्बर याद कर लिया गया था। मित्र ने सिर पीट लिया था ठीक उसी तरह जिस तरह इन दिनों आगरे का भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग अपना सिर धुन रहा है। यहां स्थित दर्जनों विश्वधरोहरों पर कोयले के टुकड़े से नाम लिखे जा रहे हैं। हालांकि ताजमहल इससे सुरक्षित है किन्तु उसकी नींव पर लोग पेंट से नाम लिखना शुरू कर चुके हैं। शेष इमारतों का तो बुरा हाल है। वहां केवल प्रेमियों के नाम ही नहीं गुदे हुए वरन् विकेट भी बने हुए हैं। पुरातत्व विभाग का मानना है कि इन धरोहरों के आसपास अवैध निर्माणों के कारण इस प्रक्रिया में तेजी आई है। यहां झुग्गियां बस गई हैं। वहां बच्चे हैं। वे क्रिकेट खेलते हैं। क्रिकेट खेलने के लिए इन इमारतों की मजबूत दीवारों को विकेट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। लकड़ी कोयले से दीवारों पर विकेट खींच दिया जाता है। वैसे मोहल्ले की औरतें उसपर कंडा भी छाब लेती हैं। गरीब के जीवन में धरोहर जैसी विलासिता नहीं होती। उनका शादी का जोड़ा रोज पहनने के काम आने वाला डेलीयूज का वस्त्र होता है जो फट जाने के बाद पर्दे का भी काम करता है और फिर चिंदी-चिंदी होकर बिखर जाता है। उनके लिए पर्यटन कोई मायने नहीं रखती। रिश्तेदारों की शादी, मरनी धरनी पर वे मुश्किल से भाड़े के लिए पैसा निकाल पाते हैं। यह दो तीन दिन के फ्री भोजन पानी में एडजस्ट हो जाता है। इसलिए जब दिल्ली के लालमैदान में आडवाणी और गडकरी जैसे लोग अमीर और गरीब के बीच चौड़ी होती खाई की चर्चा करते हैं तो अजीब सा लगता है..

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