photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Wednesday, April 14, 2010
दंतेवाड़ा के खलनायक
दंतेवाड़ा की घटना के बाद पूरा देश मानो नींद से जागा है। सभी धड़ों ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी है। इस घटना में सबसे बड़े खलनायक की भूमिका में सामने आए नक्सलियों ने भी मानो जले पर नमक छिड़का है। उन्होंने घोषणा की है कि उन्हें भी जवानों की मौत का दुख है किन्तु यह उनकी मजबूरी थी। यह कार्रवाई उन्होंने खुद को बचाने के लिए की। केन्द्र और राज्य की सरकारों द्वारा शहीद जवानों के परिजनों को लाखों रुपए मुआवजा देने की घोषणा करने के बाद नक्सलियों ने भी ठीक यही किया। उन्होंने कहा कि वे शहीदों के परिजनों को मुआवजा देने को तैयार हैं। इस घोषणा के बाद प्याली में तूफान आ गया है। अखबारों के दफ्तर में बैठे कागज के शेर गुर्रा रहे हैं, दहाड़ना तो वे कब के भूल चुके। मुंह खोलते हैं तो मिमियाने की आवाज आती है इसलिये वे अब सिर्फ गुर्राते हैं। नक्सली तो बहुत बाद में आए हैं। इन कागज के शेरों से हम यह पूछना चाहेंगे कि देश में बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बनीं, हजारों लोग विस्थापित हुए। वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, क्या किसी को खबर है। 1950 के दशक में बनी परियोजनाओं के विस्थापित आज तक भटक रहे हैं। दुनिया भर में पर्यावरण विनाश और ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा हो रही है। ऐसे देश जो यहां से केवल खनिज ले जाना पसंद करते थे और फिर उत्पादों को हमें वापस बेचते थे अब यहीं संयंत्र डालने की बात कर रहे हैं। क्या इसके पीछे का षडयंत्र किसी की समझ में आया है? अखबार वाले क्या घास खाने लगे हैं? सत्ता के पास ताकत होती है। ताकत का बर्बर इस्तेमाल किसी भी काल में, किसी भी देश में सफल नहीं रहा है फिर भी वे बार-बार एक ही बात की रट लगाए हुए हैं कि सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए। कैसी सख्ती किस तरह की सख्ती, इसकी विवेचना करने लायक बुद्धि भी क्या अब शेष नहीं रही। आज नक्सलियों को आप जंगलों में छिपा बता रहे हैं, तो जंगलों पर बमबारी करने की बातें कर रहे हैं। कल को उन्हें शहरों में छिपा बताएंगे तो क्या शहरों पर भी बमबारी करेंगे? यह तो माना कि नई पीढ़ी केवल आम खाने में विश्वास करती है, पेड़ लगाने में नहीं किन्तु उन्हें क्या पता कि पेड़ कहां लगा है। वे पढ़े लिखे हैं, उन्हें नौकरियां चाहिए फिर चाहे जंगलों का नामोनिशान ही क्यों न मिट जाए। पूरा देश खदानों और कारखानों से ही क्यों न पट जाए। चाहे आने वाली पीढ़ी के पैदा होने की संभावना ही क्यों न शून्य हो जाए। उन्हें क्या? क्या इस विभीषिका की तरफ ध्यान देने की फुर्सत अखबारों को है। आज कितने अखबार हैं जिन्होंने आदिवासी अंचलों या गांवों की वास्तविक स्थिति, वहां के लोगों की मानसिकता को समझने की कोशिश की है। उनकी इच्छाओं, आकांक्षाओं या महत्वाकांक्षाओं को जानना चाहा है। जंगलों में खड़े उनके भगवान सभ्य समाज के लिए सिर्फ वनसंपदा हैं। क्या समाचार पत्रों ने इस दिशा में कोई काम किया? हम कहीं से कहीं पहुंच गए और वनवासी बहुत पीछे छूट गए। इस विराट शून्यता को भरने की हमने कभी कोशिश नहीं की। आज भी नहीं कर रहे। अखबार भाट और चारणों की भूमिका अदा कर रहे हैं। राजा का यशगान कर चंद मोहरें जुटाने वालों को जमाने ने कभी कवि स्वीकार नहीं किया। थोथे यशगान से फूले राजाओं का भी हमेशा सर्वनाश ही हुआ है। वक्त रहते चेत जाएं वरना वह दिन दूर नहीं जब अखबार चेतना जगाना तो दूर स्वयं सामूहिक विनाश का कारण बनेंगे।
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