हांगकांग की एक किशोरी ने अपना कौमार्य इंटरनेट पर नीलाम किया। उसे साढ़े तीन लाख रुपये से कुछ अधिक की उच्चतम बोली मिली। उच्च शिक्षा के लिए उसे रकम की जरूरत थी। उससे पहले नताली डेलन ने भी मास्टर्स डिग्री का खर्च निकालने के लिए ऐसा ही किया था। कुछ लोगों को लगता है कि अपनी जरूरतों के लिए शरीर का सौदा करना ठीक नहीं है। हालांकि वे इसका कोई विकल्प भी नहीं सुझा पाते। दूसरे धड़े का मानना है कि जमीर और ईमान बेचने के बजाय कुछ मिनटों का सौदा कर यदि कई बड़ी मुसीबतों से निजात पाई जा सकती हो, तो इसमें बुराई भी कुछ नहीं है। वैसे भी हकीकत यही है कि नताली और नताली जैसी हजारों लड़कियां हैं जिन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए समझौते करने पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 1960 में शिक्षा को अधिकार बनाने की घोषणा की थी। इसके 50 साल बाद भारत ने शिक्षा को अधिकार बनाने का कानून बनाया। भारत ऐसा करने वाला 135वां देश बन गया। वैसे दुनिया भर में शिक्षा पूरी तरह से केवल 19 देशों में ही अधिकार बन पायी है। लिहाजा आज भी अधिकांश देशों में शिक्षा के लिए कोई पेट काट रहा है, कोई पीठ छिलवा रहा है और कोई जिस्म बेच रहा है। सरकार शिक्षा को अधिकार बताती है किन्तु पर्याप्त मात्रा में पुस्तकों तक की आपूर्ति नहीं कर पाती। एनसीईआरटी से लेकर राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगम तक कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता। बाजार में मांग के अनुपात में केवल 15 फीसदी पुस्तकों की ही आपूर्ति हो पाती है। लिहाजा निजी प्रकाशक कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। बेहतर कागज, बेहतर छपाई के नाम पर वे पालकों का गला काट रहे हैं। जो पुस्तक पाठ्य पुस्तक निगम 30 रुपये में उपलब्ध कराता है उसे निजी प्रकाशक 100 रुपये में बेचता है। एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे पड़ोसी सीनियर्स की पुरानी पुस्तकों से काम चला लिया करते थे। पुस्तकें और नोट्स विरासत और अमानत की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जाती थी। सेकण्ड हैण्ड पुस्तकों का एक बड़ा बाजार हुआ करता था। अब प्रतिवर्ष पुस्तकें बदल रही हैं या यूं कहें अध्याय आगे पीछे कर पुस्तकों को नवीन रूप दिया जा रहा है। स्कूलों की जिद नई पुस्तक खरीदने की होती है। दरअसल यह एक पूरा रैकेट है जिसे केवल पैसे कमाने के लिए खड़ा किया गया है। यह सेक्स रैकेट से भी गंदा काम है जिसमें सीधे तौर पर तो किसी को जिस्म के बाजार में नहीं धकेला जाता अलबत्ता उसे प्रेरित अवश्य किया जाता है। पास कराने के नाम पर शिक्षक से लेकर प्राचार्य तक छात्राओं का शोषण करते हैं। नौकरी पेशा युवतियों की हालत भी जुदा नहीं है। फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में इसका बड़ा खूबसूरत चित्रण किया गया है कि टीम में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए किस तरह एक खिलाड़ी कोच कबीर खान के सामने खुद को पेश करती है। यह साफ-साफ इशारा है उस सेटअप की ओर, जिसमें कुछ पाने के लिए कुछ खोने की संस्कृति पनप रही है। और जब बात खोने की ही हो तो क्यों न उसकी पूरी कीमत वसूल कर ली जाए? इस सेटअप को स्वीकार करने वालों के मुंह से नतालियों को प्रवचन, शोभा नहीं देता।----
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