Monday, August 9, 2010

सड़क पर वीभत्स हादसे

कटे-फटे अंग प्रत्यंग, चीथड़ों की तरह शरीर पर झूलते कपड़ों के अवशेष, कुछ दूर पड़ी मुड़ी तुड़ी सी मोटरसाइकिल। चारों तरफ राहगीरों की भीड़। कोई सहानुभूति दर्शा रहा है तो कोई मोबाइल पर पुलिस को सूचित करने की कोशिश कर रहा है। इनके अलावा ढेर सारे लोग तमाशा देख रहे हैं। कोई मोबाइल का कैमरा आन कर लेता है तो कोई छू लेने को बेताब होता है। मुन्ना रोज 12:30 तक घर आ जाता है, आज एक बज रहे हैं फिर उसका पता नहीं। दो बजे खबर आती है कि मुन्ना अब इस दुनिया में नहीं रहा। माँ गश खाकर गिर जाती है। बस स्टैण्ड पर एक महिला धूल से सने वस्त्रों में बैठी है। बालों में जटाएं पड़ गई हैं। लोग बताते हैं कि उसका बेटा सड़क हादसे का शिकार होकर चल बसा। शव इतना विकृत हो चुका था कि माँ को आज भी यकीन नहीं है कि वह उसका बेटा था। बेटे के इंतजार में वह आज भी बस स्टैण्ड पर बैठी रहती है। वर्ष 2007 में देशभर में हुई 479216 सड़क दुर्घनाओं में 114444 लोगों को मौत हुई थी। देश में प्रति घंटे कम से कम 13 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है। 75 फीसदी हादसे चालकों की लापरवाही या गलती से होते हैं। एक से तीन फीसदी मामलों में पैदल या साइकिल सवार की गलती पाई जाती है। देश की 36 लाख किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़कों पर प्रति वर्ष औसतन चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनायें होती हैं। देश में राष्टÑीय राजमार्ग और राष्टÑीय एक्सप्रेस मार्ग की लम्बाई 70 हजार किलोमीटर से अधिक है। तकरीबन प्रमुख शहर राजमार्गों पर बसे हैं। राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग, रायपुर भी इसके अपवाद नहीं। इसलिए जब दुर्ग पुलिस ने बच्चों को यातायात के प्रति जागरूक एवं प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया तो एक आस जगी कि इन हादसों में कमी आएगी। पर यह अकेली पुलिस का काम नहीं है। यह प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने की कोशिश करे। घर पर बच्चों के साथ यातायात सुरक्षा की बातें करे। दुर्घटनाओं की तरफ से आंखें न फेर लें बल्कि उसकी वीभत्सता और परिवार पर पड़ने वाले इसके प्रभाव की चिंता करे। जिस तरह साल में एक दिन पिकनिक मनाने जाते हैं उसी तरह एक दौरा बड़े अस्पतालों के अस्थि विभाग का भी करें।

1 comment:

  1. aapne yeh theek kaha ki har ek mata-pita ki jimmedari banti hai ki we apne baccho ko is baare me sachet kare.

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