Monday, May 10, 2010

फ्रस्ट्रेशन डॉट कॉम

हाईस्कूल में पेंढारकर सर हमें फिजिक्स पढ़ाया करते थे। भौतिकी की कक्षा में हम भूतप्रेतों की चर्चा नहीं करते थे किन्तु हाँ! समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ चर्चाएं अकसर हो जाया करती थीं। वे जो कुछ कहते, हम उसपर पूरी श्रद्धा के साथ यकीन करते थे। उन दिनों सीनियर सेकण्डरी स्कूल में नया-नया आॅडिटेरियम बना था। बड़ी-बड़ी शीशे लगी खिड़कियां थीं। शैतान बच्चे इन शीशों पर निशाना साधते थे और प्रत्येक सुबह कांच के कुछ टुकड़े हॉल की भीतर बाहर बिखरे मिलते थे। कुछ बच्चे क्लासरूम में तोड़फोड़ मचाते थे। ब्रूसली स्टाइल में किक मारकर स्विचबोर्ड तोड़ना, पंखे के ब्लेड्स को मोड़ देना ऐसे छात्रों का खास शौक होता था। इसी पर टिप्पणी करते हुए एक दिन पेंढारकर सर ने कहा था कि अमरीका में टेंशन रिलीविंग सेन्टर होते हैं। वहां एक बड़े से कमरे में कांच के सामान रखे होते हैं। कुछ डॉलर देकर आप एक डंडा लेकर वहां जा सकते हैं। अपने अंदर का सारा गुस्सा, सारी फ्रस्ट्रेशन कांच के बर्तनों पर उतार सकते हैं। यहां से निकलने के बाद आप एकदम तरोताजा महसूस करते हैं। हमें नहीं पता कि अमरीका में ऐसा कोई सेंटर है या नहीं किन्तु हम इतना जरूर जानते हैं कि आक्रोश, हताशा और अव्यक्त शरारतों को यदि सिस्टम से बाहर नहीं निकाला गया तो यह घातक हो सकते हैं। मुम्बई में आधी रात को फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाड़ी चढ़ा देना, नई दिल्ली-नोएडा रोड पर युवाओं का अंधाधुंध रफ्तार से बाइक दौड़ाना, भिलाई-दुर्ग के नामचीन स्कूलों के छात्रों द्वारा अलसुबह उठकर गाड़ियों के शीशे फोड़ना। यह भी एक तरह का फ्रस्ट्रेशन आउटब्रेक है। एक काम्पीटिशन है कि कौन कितने शीशे तोड़ता है। समय के साथ काम्पीटिशन बदले हैं। कभी केटी-गुलेल का जमाना था। तालाब के पानी पर मटके के टुकड़ों को भी उछाला जाता था। पत्थर मारकर आम तोड़े जाते थे। सू-सू करने का भी काम्पीटिशन होता था। रेपुटेड स्कूल के बच्चों के पास अब खेलने को वक्त नहीं रहा। सुबह से रात तक वे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग, क्लास में बिजी होते हैं। खेलकूद की भी क्लास लगती है। वहां मजा नहीं है। परफारमेन्स का टेंशन है। ऐसे में यह भी फ्रस्ट्रेशन देता है जो कभी भी, कहीं भी निकल सकता है। वक्त की डिमाण्ड है कि एक पल को हम प्रतिस्पर्धा से बाहर आकर खड़े हों और जीवन को, अपनी उम्र को भरपूर जिएं। पुलिस, डण्डा और कानून से कभी दुनिया नहीं बदल सकती। बदलाव तो समाज को खुद ही लाना होता है।

1 comment:

  1. During 1970s in USA to vent out creativity and rebel againest system youth started GRAFITI i which they use to paint any and every clean surface to some paints chants and proclamation. School kids in Bhilai breaking glasses for no reason is not because they are frustrated, it is called as LIFESTYLE crime. Crime committed by people with ful stomachs without remeorse or concern and with prime purpose of EXCITEMENT, FUN and ADRENALIN RUSH.

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