photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Wednesday, May 12, 2010
स्टोरी बाज पुलिस
घटना स्थल का मुआयना और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर गढ़ी गई कहानियों से ही अकसर आपराधिक मामलों की गुत्थी सुलझाई जाती है। इसी कहानी के आधार पर सुराग तलाशे जाते हैं और जांच की दिशा तय की जाती है। कम से कम जासूसी उपन्यास पढ़ने का अपना टोटल एक्सपीरियन्स तो यही कहता है, फिर चाहे वह उपन्यास अंग्रेजी का हो या हिन्दी का। जासूस लिफाफा देखकर मजमून भांप लेते हैं, उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं। वे बला की नजर रखते हैं। फर्श और बिस्तर पर पड़ी ऐसी अनगिनत चीजें उन्हें दिख जाते हैं जिन्हें पुलिस नजर अंदाज करके जा चुकी होती है। कहते हैं क्राइम का ताना-बाना दिमाग में होता है। ऐसे लोगों को क्रिमिनल माइंडेड कहते हैं। ऐसे लोग ऊमदा जासूस हो सकते हैं। अच्छे क्राइम रिपोर्टर बन सकते हैं। जब वे इन दोनों में से कुछ भी नहीं बनते तो क्रिमिनल बन जाते हैं। इनके और पुलिस बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है। पर पुलिस को और भी काम होते हैं। उनका बस चले तो वे इस खेल से ही किनारा कर लें। पर मजबूरी है। उन्हें तनख्वाह इसी बात की मिलती है। इसलिए अकसर वे उन्हीं मामलों की तफ्तीश करते हैं जिनके लिए दबाव होता है। दबाव अकसर बड़े लोगों का होता है जो पुलिस को यह भी बता देते हैं कि फंसाना किसको है। और फिर पुलिस चुटकियों में केस हल कर देती है। शानदार कहानी गढ़ लाती है। आरोपी को गिरफ्तार भी कर लेती है। आरोपी जुर्म कबूल भी कर लेता है और फिर अगर वकील तगड़ा मिल गया तो बाकी जिन्दगी विचाराधीन कैदी बना रहता है। नोएडा के आरुषि हत्याकांड का उसने ऐसा पुलंदा बांधा कि सीबीआई भी नहीं खोल पा रही। नोएडा के ही पंधेर कोठी मामले में भी कुछ ऐसी ही हुआ। झारखंड के कोडरमा में एक पत्रकार की लाश की कुछ ऐसी पड़ताल हुई कि मामला दाखिल दफ्तर होने के कगार पर है। मुजफ्फरपुर में तो हद ही हो गई। कथित आॅनर किलिंग के मामले में यहां लाश की शिनाख्त हो गई, हत्यारा पकड़ा गया, उसके बयान दर्ज हो गए और फिर लाश अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़कर जीवित लौट आया। वैसे मीडिया भी कुछ कम नहीं। छत्तीसगढ़ के नक्सलप्रभावित कांकेर जिले से खबर आई कि नक्सलियों ने कोयलीबेड़ा के एक गांव के दर्जनों लोगों को मार कर जला दिया है। प्राय: सभी अखबारों में यह खबर सुर्खियां बनीं किन्तु बाद में पता लगा कि वहां कुछ हुआ ही नहीं है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि क्राइम डिटेक्शन की हमारी पूरी ट्रेनिंग सत्यकथा, मनोहर कहानियां, कर्नल रंजीत, सुरेन्द्र मोहन पाठक के स्कूलों में होती है। फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजधानी पुलिस एक अजीब मामले को लेकर फंसी है। एक अज्ञात 18-20 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। युवती की मौत हो जाती है। आरोपी पकड़े जाते हैं, जुर्म कबूल करते हैं। पुलिस मामले को पुख्ता करने डीएनए टेस्ट की बात करती है और ऐन वक्त पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ जाता है कि किसी का जबरिया डीएनए टेस्ट नहीं कराया जा सकता। लिहाजा ‘खा गीता की कसम, फिर चाहे जो मुंह में आए बोल’ वाली कहावत चरितार्थ होने दे।
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Civil societies are facing interesting problems- 1. To ensure that no innocent citizen b punished for any reason whatsoever.
ReplyDelete2. Various verdicts by supreme court regarding forcible DNA test or NArco test are to prevent anarchy by system
3. Real culprits make ful use of this lineancy and get exonerated.
4. Thats y, US takes captured terorist to GUATENAMO and does whatever they wish without any human right wala crying about it. India will also find its GUATENAMO if criminals will misuse the system.