Friday, April 30, 2010

कामचोरों की जमात

लालफीताशाही को कर्मचारी संकट का नाम देकर केन्द्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री ए इलावरासन ने भले ही साग से मछली ढंकने की कोशिश की हो किन्तु हकीकत यही है कि केन्द्रीय वेतनमान, महंगाई भत्ता और तमाम तरह की सुविधाएं देने के बाद भी सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते। वे तब तक किसी काम में रुचि नहीं लेते जब तक कि उसमें उनकी कोई व्यक्तिगत दिलचस्पी न पैदा कर दी जाए। पूरी दुनिया विभिन्न जिन्सों का पेटेन्ट करवाने की होड़ में लगी है ताकि कल को जब बौद्धिक संपदा कमाई का सबसे बड़ा साधन बने तो सबके खाते में कुछ न कुछ हो, किन्तु भारत इसका अपवाद है। केन्द्रीय राज्यमंत्री के अनुसार पेटेन्ट के 73 हजार आवेदन लंबित हैं। ये वो आवेदन हैं जो नीचे की बाधाओं को पार कर वहां तक पहुंचे हैं। उन लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो पेटेन्ट कराने की पहली सीढ़ी पर पांव धरने के लिए कतार में हैं। सरकारी कामकाज के कछुआ चाल की वजह से कितने ही लोगों के ख्वाब टूट जाते हैं, कितने ही लोगों की जिन्दगी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है। मुश्किल तो यह है कि सरकार को इसका अहसास तक नहीं है। वैसे जहां पूरा सरकारी ढांचा कमीशनखोरी पर टिका हुआ हो वहां किसी अच्छी पहल की उम्मीद करना भी बेकार है। जब वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री लंबित पेटेंट आवेदनों की चर्चा कर रहे थे, ठीक उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल सदन को बता रहे थे कि सरकार ने 11 राज्यों में 327 माडल स्कूलों को मंजूरी दी थी तथा 252 करोड़ रुपए जारी भी कर दिये थे किन्तु न तो इन रुपयों का आहरण हुआ और न ही स्कूल खुले। इस एक साल में बहुत सारे निजी स्कूल और खड़े हो गए। जमीन से लेकर मान्यता तक में लाखों के वारे न्यारे हो गए। हर साल कमाई का रास्ता और खुल गया। माडल स्कूलों से क्या मिलता भला। कुछ इसी तरह का मामला 21 फर्जी विश्वविद्यालयों का है। ये विश्वविद्यालय पिछले कितने सालों से सक्रिय हैं इसका कोई रिकार्ड हालांकि नहीं दिया गया है किन्तु इतना तो तय है कि इन विश्वविद्यालयों में अब तक हजारों छात्र अपना स्थायी नुकसान करा चुके होंगे। उनकी डिग्रियों की मान्यता शून्य हो गई होगी। उनके जो साल इसमें बर्बाद हो गए उनकी क्षतिपूर्ति कोई नहीं कर सकता। क्या इन्हें कोई हर्जाना देगा?

बैलट प्रूफ सरकार

सरकार को बुलेट शब्द से नफरत है। वह चाहती है कि लोग बुलेट छोड़कर बैलट (मतदान) के रास्ते पर आएं। इस काम में इसे महारत हासिल है। वह खिलाड़ियों की खिलाड़ी है। इसमें वह अच्छे खासे सूमो पहलवान को पटखनी देने की ताकत रखती है। उसके पास बैलट प्रूफ जैकेट है। जैकेट क्या पूरा कम्बल है। सिर से पांव तक ढंकने वाला। कहने को विधानसभा और लोकसभा में जनता के प्रतिनिधि हैं। लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए सांसद और विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। दरअसल इससे बड़ा झूठ और कुछ हो ही नहीं सकता। ये जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टियों के प्रतिनिधि हैं। इनकी अपनी कोई सोच या समझ नहीं है। जब-जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर सदन में मतविभाजन की बारी आती है, इन्हें पार्टी के प्रति अपनी वफादारी साबित करनी पड़ती है। पार्टी आलाकमान चाबुक (व्हिप) चलाता है और सब सिर झुकाकर दुम हिलाने लगते हैं। यह बात केवल पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वालों पर ही लागू नहीं होती बल्कि उन चिल्हर पार्टियों पर भी लागू होती है जो इनसे बैसाखी उधार लेकर सरकार बनाते हैं। संख्या बल में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विपक्ष है ही नहीं। एक सत्ता पक्ष है और बाकी उसके रिश्तेदार। इनमें आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता है। सरकार किसी की भी बने, ये सभी खुश रहते हैं। महंगाई पर कटौती प्रस्तावों को लेकर भी यही सब होता रहा। शिबू सोरेन ने भाजपा की बात नहीं मानी तो भाजपा ने झारखण्ड में उसकी सरकार की टांग खींच दी। गुरुजी को स्कूली छात्र की तरह मिमियाना पड़ा, ‘मेरी तबियत खराब थी। गलती हो गई। झारखण्ड में सरकार आप ही बना लो।’ गोया कि सरकार जनता ने नहीं चुनी। जनता ने तो केवल मतदान किया है। सरकार तो किसी की कृपा से बनी है। किसी को वह तोहफे में मिली है तो किसी ने उसे किसी समझौते के तहत मोल ली है। केन्द्र बिन्दास है। उसे किसी की परवाह नहीं है। जिसे धमकाना होता है उसके खिलाफ चार छह मामले सीबीआई को सौंप देती है। इनकम टैक्स वाले अलग से पीछे लग लेते हैं। वह हाय! हाय! करता हुआ दौड़कर शरण में चला आता है। पांव पर गिरता है, माफी मांगता है, बाल बच्चों की दुहाई देता है और फिर निष्ठा और समर्पण का वायदा कर अपनी जान छुड़ा लेता है। दलित की बेटी ने एक दांव खेला और अपने हाथी और पुतले बचा ले गई। वामपंथियों को और बहाना नहीं सूझा तो सांप्रदायिक सांप्रदायिक-सांप्रदायिक चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। और जब वित्तीय विधेयक पास हुआ, उस समय संसद में विरोध करने वाला कोई नहीं था। जनता ठगी की ठगी रह गई। पता नहीं क्यों कुछ लोग सत्ता हथियाने के लिए बुलेट-बुलेट खेल रहे हैं जिसमें आज नहीं तो कल उनकी जान जा सकती है। यदि उन्हें सत्ता ही चाहिए तो वे संसद के गलियारों का आईपीएल सीखें। उधारी टट्टुओं और भाड़े के खिलाड़ियों की टीम बनाएं। कोई दमदार फ्रेंचाइजी ढूंढें और देशी-विदेशी कंपनियों के ‘लोगो’ वाला ड्रेस और बल्ला लेकर उतरें। इसमें तो जीत में भी जीत है और हार में भी जीत।

Wednesday, April 28, 2010

शादी और नौकरी

शादी और नौकरी दोनों एक ही गोत्र, एक ही राशि के हैं। दोनों में समानताएं जुड़वा बहनों जैसी हैं। दोनों के ख्याल किशोरावस्था में आने लगते हैं। दोनों की तैयारी करते जवानी आ जाती है। दोनों ही में स्टार्टिंग डिमाण्ड हाई-फाई होती है। दोनों ही में वक्त निकल जाने पर जो हाथ लगा उसे अपनाना होता है। दोनों ही मामलों में जिन्दगी भर पराई थाली में घी ज्यादा नजर आता है। नौकरी अच्छी हो तो खूबसूरत बीवी मिलती है, पत्नी अच्छी हो तो धरती स्वर्ग हो जाती है। जीवन के इन दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से किसी एक की भी उपेक्षा नारकीय कष्ट दे सकती है। भिलाई में हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन में प्रश्न सत्र भी हुए। 98 फीसदी प्रश्न विवाह, नौकरी और कारोबार से जुड़े थे। दो फीसदी लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे। एक प्रकाण्ड ज्ञानी ज्योतिष सबको एक ही जवाब दे रहे थे। आप जब चाहो शादी कर सकते हो किन्तु च्वाइस फैक्टर आड़Þे आ रही है। आप कभी भी 100% श्योर नहीं हो सकते। फिर इतनी नौटंकी क्यों? खूबसूरती का कोई मापदण्ड नहीं होता। जिसे रोज-रोज देखते हो उससे लगाव हो जाता है। अपने माता-पिता, भाई-बहनों को देखो। क्या वे सभी खूबसूरत हैं? फिर भी वे न केवल आपके अपने हैं बल्कि प्यारे भी हैं। नौकरी के संबंध में भी उनकी कुछ ऐसी ही राय थी। वे किस्सा भी सुनाते थे, ‘एक युवक खूबसूरत लड़की से विवाह करना चाहता था। उसके पास शानदार मोटी पगार वाली नौकरी थी। इसलिए खूबसूरत बीवी को वह अपना हक समझता था। किसी की नाक टेढ़ी लगती, किसी की आंख छोटी तो किसी के होंठ पसंद नहीं आ रहे थे। ढूंढते-ढूंढते कब वह 45 का हो गया पता ही नहीं चला। अब वह किसी से भी शादी करने को तैयार है। कहता है विधवा परित्यक्ता भी चलेगी। दूसरा किस्सा एक उच्च शिक्षित युवती का है। उसे घर के पास स्कूल में टीचर की नौकरी मिल रही थी। उसका कहना था कि वह ऐसी टुच्ची नौकरियों के लिए नहीं बनी। उसने पीएचडी भी कर लिया। एक निजी कालेज में नौकरी आफर हुई, उसने इंकार कर दिया। अब वह एक कंपनी में फ्रंट आफिस जाब कर रही है। घर पर ट्यूशन पढ़ा रही है।’ कहना न होगा कि दूसरे दिन उस ज्योतिष महाराज के पास कोई भी नहीं गया। लोगों की भीड़ उस बाजीगर के पास जुट रही थी जो वशीकरण का ताबीज दे रहा था, भाग्योदय के रत्न बेच रहा था, संकटहरण नुस्खे बता रहा था। राहू-केतु का खेल समझा रहा था। नीच और उच्च के शनि-बुध के समीकरण बता रहा था। हाथ की रेखाओं से सुनहरा भविष्य खोजकर निकाल रहा था। वह सपनों का सौदागर था। सपने बेच रहा था। लोग खरीद रहे थे। परेशानहाल को वैसे भी क्या चाहिए, तसल्ली!

छठी इंद्रीय फेल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में दो छात्रों ने अपनी दो सहपाठियों को कमरे पर बुलाया। छात्राओं की छठी इंद्रीय ने कुछ नहीं कहा। वे बिंदास अपने सहपाठियों के पास पहुंच गर्इं। वहां उनके दो और मित्र मौजूद थे। चारों ने मिलकर उनके साथ वही किया जिसकी खबरें आए दिन पढ़ने को मिलती हैं। मुंबई की एक छात्रा को उसके एक सीनियर ने खामख्वाह कार में लिफ्ट आफर की। छात्रा को एक बार भी उसकी नियत पर शक नहीं हुआ और वह उसके साथ कार में सवार हो गई। रास्ते में जो कुछ भी हुआ वह खबर बन गई। ट्यूटर, मोहल्ले के भइया, पड़ोस वाले अंकल जब चाहे छेड़खानी करके निकल जाते हैं। 99फीसदी मामलों में रिपोर्ट ही नहीं लिखाई जाती। जिन मामलों की रिपोर्ट लिखाई जाती है वह भी हजारों में है। प्रकृति ने सभी को अपनी-अपनी सुरक्षा का औजार दिया है। साही को कांटे, रीछ को घने बाल, हिरण को रफ्तार तो कछुए को सख्त खोल। कुदरत ने औरत को भी एक हथियार दिया था, छठी इंद्रीय। छठी इंद्रीय से वह खतरे को बहुत पहले से ताड़ लेती थी और अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक सावधानी बरतने लगती थी। किसी के इरादे नेक नहीं लगे तो उसके सामने अकेला पड़ने से बचती थी फिर चाहे वह गुरुजी हो, ताऊ हो, चाचा हो या सगा बाप ही क्यों न हो। उसकी इन आशंकों को उनकी माताएं भी समझती थीं। अब तो आधुनिक माताएं खुद ही बेटी को उकसाती हैं। ज्ञात रहे कुदरत ने मनुष्य को छोड़Þ सभी प्राणियों में नर को खूबसूरत बनाया है। अपनी मादा को रिझाने के लिए मोर नाचता है, मुर्गा कलगी हिलाकर गर्दन लहराता है, शेर अपनी केशर नुमा जुल्फों को लहराता है तो मेढक अपने गले की थैली में हवा भरकर टर-टराता है। इंसान इसका अपवाद है। यहां नारी खूबसूरत होती है। उसकी खूबसूरती के आगे पुरुष लार टपकाता फिरता है। इन अस्त्रों से लैस नारी जब खुद ही आ बैल मुझे मार करे तो क्या हो? नारी वादी कहते हैं कि औरत पर दोष मढ़ देने से पुरुषों के खून माफ नहीं हो जाते। मत हों। पुरुष अपने खून माफ करवाने के लिए मरा नहीं जा रहा। वह तो लड़की को रिझाने के लिए सातवीं मंजिल से कूदने को तैयार है, 80 की रफ्तार से भीड़ भरी सड़कों से गुजरने को उतावला है। वह स्टॉपी मारकर दुपहिया के पिछले पहिए उठाकर प्रणाम करना चाहता है, व्हीली मारकर गाड़ी को घोड़े की तरह पिछले पांव पर खड़ा करना चाहता है। और फिर उसके लिए सजा तजवीज करके नारी को हासिल क्या होगा? कुछ नहीं। वह लुट चुकी होगी। लोग चटखारे ले लेकर उसके किस्से पढ़ेंगे। औरतें अफसोस में छिपाकर ताने देंगी, ‘हाय! रे कैसे करी होगी.. इतने सारे लड़के..।’ लुटने के दौर में मोबाइल कैमरे की दुआ से वीडियो क्लिप बन गई तो सैकड़ों लोग मजा लेंगे। लूटने वाला सात-आठ-दस साल जेल में रह लेगा। उसे फांसी भी दे दो तो क्या? सवाल इन अपराधों को टालने का है। अपराधों के घटित होने के बाद सजा तजवीज करने का नहीं।

Monday, April 26, 2010

पंचायतों का न्याय

पंच भगवान होता था। अब जबकि भगवान की ही कोई इज्जत नहीं रही तो पंचों की क्या बिसात। बचपन में मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ी थी ‘पंच परमेश्वर’। पंच की गद्दी पर बैठते ही किस तरह से व्यक्ति का हृदयपरिवर्तन हो जाता है, इसका बड़ा खूबसूरत चित्रण इस कहानी में किया गया था। दरअसल दो घड़ी के लिए मिलने वाली यह इज्जत लोगों के मन पर गहरी लकीरें खींचती थी। वे इस पर खरा उतरने की कोशिश भी करते थे। इसके अलावा ईश्वर का खौफ था, पाप का बोध था, नर्क का भय था। सबका सामूहिक निचोड़ यह था कि जिसे पंच कह दिया वह वास्तव में भगवान बन कर दिखाने की कोशिश करता था। अब जबकि ईश्वर, पाप और नर्क का भय पूरी तरह से समाप्त हो चुका है, पैसा और प्रभाव ताकत का पर्यायवाची बन चुके हैं, तब क्या तो पंचायत और क्या ही पुलिस। अब पंचायतें प्रताड़ित करने का, अपने मन की कुण्ठाओं और विकृतियों को मूर्तरूप देने का जरिया बन गयी हैं। जवान विधवा पर नजरें मैली कीं। मान गयी तो ठीक और फटकार दिया तो टोनही होने का लांछन लगाकर गांव से निकाल दिया। इतने पर भी नहीं मानी तो सार्वजनिक रूप से उसकी इज्जत उछाल दी या फिर पीट-पीट कर मारने का आदेश सुना दिया। महिला टोनही हो सकती है किन्तु पुरुष टोनहा नहीं हो सकता। क्यों? कभी किसी पुरुष को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने का आदेश किसी पंचायत ने दिया हो, ऐसा सुनने या पढ़ने में नहीं आया। अलबत्ता महिलाओं के लिए ऐसे आदेशों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त मिल जाएगी। कपड़े नोंच लेना, मलमूत्र खिलाना, सामूहिक बलात्कार करना आदि के अपने फरमानों के जरिए पंचायतें अपनी यौन कुंठाओं को जी रही हैं। पंच अब परमेश्वर नहीं रहे। वे जमीन पर उतर आए हैं। अब वे न्याय के लिए नहीं, अपने लिए, अपने परिजनों के लिए, अपनी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। कहने को तो 24 अप्रैल 1993 को संविधान का 73वां संशोधन कर शासन की जिम्मेदारी त्रिस्तरीय पंचायतों को सौंप दी गई। 600 जिला पंचायतों, 600 माध्यमिक पंचायतों तथा 2 लाख 30 हजार ग्राम पंचायतों के जरिये 28 लाख प्रतिनिधि हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गये। 33 प्रतिशत आरक्षण से करीब 10 लाख महिलायें पंचायत प्रतिनिधि बन गई और 50 प्रतिशत आरक्षण होने पर उनकी संख्या 14 लाख तक बढ़ सकती है। किन्तु वास्तविकता के धरातल पर स्थिति विचित्र है। पंचायतों में पंच पतियों, पंच भाईयों, पंच पिताओं का बोलबाला है। देहात को छोड़ भी दें तो शहरी निकायों का यह हाल है कि पार्षद पति बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। गाड़ियों के नम्बर प्लेट पर शान से पार्षद पति, महापौर पति लिख रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह कहना कि पंचायतों के प्रभावी होने से नक्सलवाद खत्म हो सकता है, दूर की कौड़ी लगती है। स्वप्नदृष्टा होने में और सपने देखने में फर्क होता है। एक मौजूदा हालातों के आधार पर आने वाले समय की कल्पना करता है। दूसरा हालातों को झुठला कर सुखद कल्पनाओं में खोया रहता है। क्या उन्हें नहीं पता कि पंचायतों का नया संस्करण सरकारी ढांचे का एक्सटेंशन मात्र है। वे गांव की अच्छाइयों को उभार कर शहर लाने नहीं बल्कि शहर की गन्दगी को गांव तक पहुंचाने गए हैं।

Sunday, April 25, 2010

पालीथीन में पर्यावरण

बीते दिन कपड़ों का थैला लेकर बाजार जाने के। अब तो हर चीज पालीथीन के कैरीबैग में मिल जाती है। थैला तो केवल गंवार लेकर चलते हैं। एक पाव, आधा किलो सब्जी खरीदने वाले अब गाड़ियों से बाजार जाते हैं। रही सही कसर पालीथीन में सब्जी खरीदकर पूरी करते हैं। फिर पर्यावरण पर भाषण देते हुए निकल जाते हैं। पृथ्वी दिवस पर हमने पर्यावरण को संरक्षित करने तथा पृथ्वी की रक्षा करने का संकल्प लिया है, किन्तु यह औपचारिकता मात्र है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 में दिए गए निर्देशों का उल्लंघन होने पर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। अधिनियम की धारा 5 के अनुसार पर्यावरण से सम्बन्धित निर्देशों का उल्लंघन होने पर केन्द्र सरकार उद्योग को बन्द करने का आदेश दे सकती है। धारा 15 के अंतर्गत 5 वर्ष तक के कारावास अथवा एक लाख रुपए जुर्माना अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है। धारा 19 आम नागरिक को यह अधिकार देती है कि वह सरकार अथवा किसी भी प्राधिकृत संस्थान के विरूद्ध कार्रवाई प्रारम्भ करे। अब यह तथ्य प्रत्येक नागरिक के ज्ञान में है कि प्लास्टिक, जिसमें पॉलीथिन बैग, गिलास, प्याले व पत्तल-दोने शामिल हैं, धरती की उर्वरा शक्ति को कितनी हानि पहुंचा रहे हैं। पान मसाले व जर्दे के पाउच भी प्लास्टिक से बने होते हैं। उत्पादनकर्ता, विक्रेता और उपभोक्ता बिना किसी संकोच के इन प्लास्टिक अपशिष्टों से धरती का सीना छलनी कर रहे हैं। निजी समारोहों में ही नहीं, राजकीय समारोहों में भी भोजन प्लास्टिक की पत्तलों व दोनों में परोसा जाता है। प्लास्टिक के गिलासों में पानी पी रहे हैं। राजस्थान सरकार ने एक अगस्त से प्रदेश में प्लास्टिक की थैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। किंतु इतने से ही काम नहीं चलेगा। सर्वाधिक प्लास्टिक प्रदूषण पान मसाले व जर्दे के पाउचों, प्लास्टिक पत्तलों, दोनों तथा गिलासों से होता है। शुद्धता की नई फैंसी ने यूज-एंड-थ्रो को बढ़ावा दिया है। यह सही है कि पहले भी लोग शादी ब्याह या अन्य सामूहिक भोजन में धोए जाने वाले बर्तनों का उपयोग नहीं करते थे। इसमें कई दिक्कतें थीं। एक तो बड़े पैमाने पर बर्तनों को धोने की व्यवस्था करना और उसपर भी उसकी सफाई की गारंटी न होना एक बड़ी समस्या थी। इसलिए दोना पत्तलों का उपयोग किया जाता था। चूंकि लोग बैठकर खाते थे इसलिए कोई समस्या नहीं आती थी। किन्तु अब पार्टियों में लोग खड़े खड़े खाते हैं। इसलिये पत्तलों का मजबूत होना जरूरी है। पत्तों से बने पत्तलों को हाथ में लेकर खाया नहीं जा सकता इसलिए थर्मोकोल और प्लास्टिक पदार्थों से बनी मजबूत थालियों का चलन बढ़ा। यह वक्त का तकाजा है कि अब ऐसे दोना पत्तलों का विकास किया जाए तो पूरी तरह से या तो रिसाइक्लेबल हों या फिर जल्द से जल्द नष्ट होकर मिट्टी बन जाते हों। विज्ञान को इस दिशा में प्रयास करने होंगे। चांद और मंगल पर जाना उतना जरूरी नहीं है जितना की हमारी अपनी धरती को बचाए रखना।

सादगी, खादी और शाकाहार

सादगी की परिभाषा अब बदलने लगी है। यहां बात उन लोगों की नहीं हो रही जो सरकारी दाल-भात केन्द्रों में पांच रुपये में पेट भरते हैं। यहां बात उन लोगों की भी नहीं हो रही जो थाली रेस्तरां में जाते हैं। यहां तो बात उन लोगों की हो रही है जो खादी पहनकर, सफेद कार में बैठकर शुद्ध शाकाहारी गार्डन रेस्तरां में जाते हैं। स्कूलों में ग्रीष्म की छुट्टियां लगी हुई थीं किन्तु हम परेशान थे। नए साल की एनुअल फीस की रकम जुटानी अभी बाकी थी। पुस्तक कापियों और ड्रेस, बैग आदि में पांच हजार रुपए उड़ चुके थे। खर्च कम करने हमने पर्यटन कैंसल कर दिया था। ऐसे में मेहमान आ जाएं तो होश फाख्ता हो ही जाते हैं। मामाजी बहुत दिन बाद आए थे। श्रीमतीजी ने कहा, अच्छा हुआ अकेले आए हैं। कपड़ा लत्ता देने, खाने-खिलाने में दिक्कत नहीं जाएगी। हम भी खुश हुए। चलो सस्ते छूट जाएंगे। शाम को बाहर खाने का कार्यक्रम बना। मामा जी ने शिवनाथ किनारे के एक शाकाहारी रेस्तरां का नाम लिया। समझ में आ गया कि सुबह-सुबह का उनका पड़ोस का दौरा खाली नहीं गया था। खूब बदला लिया था पड़ोसी ने। बहरहाल शाम को हम शिवनाथ किनारे पहुंच गए। बड़ा खूबसूरत समा था। बच्चे खेल रहे थे। टेबलों के इर्द गिर्द गार्डनचेयर्स पर उनके माता पिता बैठे बतिया रहे थे। झक्क सफेद कपड़ों में वेटर आर्डर ले रहे थे। हमने मीनू कार्ड मामाजी की तरफ बढ़ा दिया। शर्माते सकुचाते उन्होंने वेज पुलाव, रायता, ग्रीन सलाद, नान का आर्डर दिया। इस बीच बच्चे रबड़ के विशाल गुब्बारे पर कूदने के दस-दस रुपए लेकर जा चुके थे। लिहाजा हम उनकी तरफ से निश्चिंत थे। खेलने कूदने के चक्कर में वे मीनू कार्ड मांगना भूल गए थे। आधा घंटे बाद भोजन लगना शुरू हुआ। हमने बच्चों को बुला लिया। डिशेज पर नजर फेरने के बाद वे खामोशी के साथ बैठ गए और थोड़ा-थोड़ा खाकर भाग गये। तभी बिल आ गया। चौहद सौ सत्तर रुपये का बिल देखकर हमारी सांस अटक गई। पांच बड़े और दो बच्चों ने ऐसा क्या खा लिया था? इज्जत बचाने के लिए पर्स के कोने में कई महीनों से छिपाकर रखे हुए लाल गांधियों में से दो को हमने खींच लिया। एक झेंपी हंसी के साथ उसे बिल में दबाया और सौंफ-मिस्री पर टूट पड़े। लौटते समय रास्ते में हम तो खामोश थे किन्तु बच्चों ने समीक्षा जारी रखी। इससे तो अच्छा था बोनलेस चिकन चिली ले आते। बीस तंदूरी रोटियों में हम सबका पेट भर जाता। पांच-छह सौ रुपये में पूरा परिवार डकार ले रहा होता। मामाजी खामोश थे। सादा जीवन, सादा भोजन और सादा पहनावे पर उनके प्रवचनों को ब्रेक लग चुका था। दो दिन बाद हम मार्केट गए। खादी का कुर्ता और पाजामा खरीदा। चौहद सौ रुपयों का बिल चुकाया और सामने की दुकान पर लटकते कूटॉन्स में सत्तर फीसदी डिस्काउन्ट का बोर्ड देखते रह गए। लौटते समय मामाजी ने चौक पर गाड़ी रुकवाई। सीधे चिकन चिली की दुकान पर गए। आर्डर दिया और पनवाड़ी के पास तबतक पान बनवाते रहे जबतक कि आर्डर पार्सलपैक नहीं हो गया। फिर बिल चुकाया और खामोशी के साथ आकर गाड़ी में बैठ गए। रात को उन्होंने दबाकर खाना खाया। कुर्ते को ढीला और पाजामा को तंग बताकर उन्हें लौटाना तय कर लिया। बच्चों को सीने में भींचकर बोले, बेटा तुम जीते हम हार गए।

Friday, April 23, 2010

गायत्री परिवार के पाखण्डी

धर्म, आध्यात्म के क्षेत्र में पाखण्ड से इस्पात नगरी भिलाई भी अछूता नहीं है। कहीं नित्यानंद, कहीं इच्छाधारी संत तो कहीं साक्षात करैत। एक ऐसा ही पाखण्डी ॐगायत्री परिवार में भी है। ट्रैवल्स के धंधे में फर्जी बिल बना-बना कर अकूत धन इकट्ठा करने वाले इस परिवार ने भिलाई के एजुकेशन माफिया से भी रिश्ता जोड़ लिया है। न केवल रिश्ता गांठा है बल्कि एक इंजीनियरिंग कालेज भी खोल लिया है। कम ही लोगों को पता होगा कि इस व्यक्ति के पास नेहरू नगर में दर्जनों मकान हैं। ये सभी मकान किराये पर चढ़े हुए हैं जिनमें से 70 फीसदी बिना किसी एग्रीमेन्ट के हैं। इन किराएदारों को वे रसीद तक नहीं देते। अपने किराएदारों की तरक्की से जलने वाले इस परिवार की नई पीढ़ी करेला और नीम चढ़ा की कहावत को चरितार्थ कर रही है। पैसा उनके सिर चढ़कर ऐसा बोल रहा है कि वे आदमी को आदमी नहीं समझते। पता नहीं ॐमाता गायत्री इनकी पूजा भी कैसे स्वीकार करती होगी। हाल ही में इनके एक किराएदार ने अपना मकान बनवा लिया। इस किराएदार से उनका कारोबारी रिश्ता भी था। लेनदेन में एक पैसा भी बकाया नहीं था। बाप के कहने पर किराएदार को आनन फानन में कब्जा खाली करना पड़ा। कुछ दिन बाद बाप-बेटा साथ-साथ मकान पर पहुंचे और अपने पूर्व किराएदार की खूब बेइज्जती की। उसकी गाड़ी की चाभी छीन ली। चक्के की हवा निकाल दी। पूर्व किराएदार को भरी धूप में पैदल हिसाब-किताब लाने के लिए भेज दिया। जबरदस्ती एक चेक लिखवाया। हालांकि मध्यस्थता में शाम को जब हिसाब-किताब हुआ तो उसे चेक लौटाना पड़ा। ॐगायत्री परिवार के इस झण्डाबरदार ने इतनी इंसानियत भी न दिखाई कि सॉरी ही बोल देता। ऐसे पाखण्डियों की वजह से ही न केवल धर्म कमजोर हुआ है बल्कि हिन्दुत्व शर्मसार हुआ है। सरकारी अफसरों को लाखों रुपये रिश्वत देने की ताकत रखने वाला यह परिवार किसी सदुद्देश्य को लेकर शिक्षा के क्षेत्र में आया हो, यह मुमकिन नहीं दिखता किन्तु यही कलियुग की नियति है। अब धर्म का उपदेश देने वालों के बेडरूम से ही बारबालाएं, सिने तारिकाएं निकलती हैं। पढ़ने में कमजोर छात्राएं अपने माँ-बाप की इच्छा से बाबाओं के पास पहुंचती हैं और उनका खिलौना बन जाती हैं। कोई जिस्मफरोशी का नेटवर्क चलाकर दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है तो कोई शिक्षा की दुकान सजा लेता है। राष्ट्रपिता से छापे का फोटू बनकर रह गए गांधी ऐसे लोगों के घरों में बोरों में ठुंसे पड़े रहते हैं। अब यही इंडिया के भाग्यविधाता हैं।

जिन्दगी का खौफ

किसी जमाने में इंसान के जीवन में सबसे बड़ा डर मौत का था। आश्चर्यजनक रूप से आधुनिकता की चोटी पर खड़े मानव का मृत्यु का खौफ जाता रहा है। अब उसे जीने से डर लगने लगा है। भविष्य की अशक्त/अपंग जिन्दगी उसे बेहद डराती है। शहरियों में बुढ़ापे का अकेलापन एक ऐसी खौफनाक कल्पना है जिसे सोच-सोच कर लोगों की जवानी खराब हो रही है। पहले जहां इसकी चर्चा केवल मार्निंग वाक के दौरान बुजुर्ग पार्कों में बेंच पर बैठकर हम उम्र लोगों के बीच किया करते थे वहीं अब यह बैंकों, बीमा कंपनियों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए एक बड़ा विषय बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े शिकार हैं वे नौकरीपेशा लोग जो अमूमन आठ घंटे की नौकरी के बाद फुर्सत में होते हैं। जिनके सामने रिटायरमेन्ट की एक तारीख निश्चित होती है। जिनपर नौकरी में रहते हुए किसी तरह बच्चों का भविष्य तय करने तथा बुढ़ापे में सिर छिपाने की जगह जुटा लेने का दबाव होता है। चिंता का विषय यह है कि जीवन का यह डर युवाओं को तो अपनी गिरफ्त में ले ही चुका है और अब दबे पांव किशोरों और बालकों के जीवन में दाखिल होने लगा है। सुबह शाम घर में, पास पड़ौस में और टीवी के विज्ञापनों में सुरक्षित बुढ़ापे के विज्ञापन उसके कोमल बालमन में यह सवाल उत्पन्न कर रहा है कि यदि पापा किसी दुर्घटना का शिकार होकर चल बसे तो क्या उसके बाद भी जीवन वैसा ही रहेगा? विज्ञापन की दुनिया की यह कैसी क्रिएटिविटी है कि बच्चा अपने आप को साबित करने के लिए तनाव के दौर से गुजर रहा है। दिन में कई-कई बार उस खर्च के ताने सुन रहा है जो उसपर उसकी मर्जी पूछे बिना खर्च किये जा रहे हैं। इसी दबाव और तनाव में वह किशोरावस्था से सीधे बुढ़ापे में कदम रख रहा है। वह फटाफट सब कुछ पा लेना चाहता है। इसके लिए वह सामाजिक बंधनों को तोड़ रहा है। हर तरफ से उसपर केवल अपेक्षाओं का बोझ लादा जा रहा है। वह नितांत अकेला हो गया है। एक विधवा या विधुर से कहीं ज्यादा अकेला, जिसके पास अपना कहने को कोई नहीं। शायद यही वजह है कि दौड़ते-दौड़ते जहां उसके पांव थकते हैं, सुस्ताने के बजाय वह सीधे आत्मघाती कदम उठा लेता है। नौकरी छोड़ने की नौबत आने पर, चुकारे में असमर्थ होने पर, परीक्षा में फेल होने पर, प्यार में मुश्किलें बढ़ने पर वह सीधे पलायन का मार्ग अपना रहा है। क्या इसके बाद भी हमें गर्व होना चाहिए कि हम सामाजिक प्राणी हैं?

लेडीज टायलेट में स्पाईकैम

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक कॉल सेंटर के लेडीज टॉइलेट में स्पाई कैम रखने के मामले को एक साधारण आपराधिक मामला समझकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह की घटना का मतलब है कि बीपीओ जैसे सबसे आधुनिक समझे जाने वाले क्षेत्र में भी अब तक ऐसा माहौल नहीं बन सका है कि वहां कामकाजी महिलाएं अपनी सुरक्षा और सम्मान को लेकर निश्चिंत हो सकें। गौरतलब है कि जब सरकार ने फैक्टरीज ऐक्ट-1948 में संशोधन कर टेक्स्टाइल और आईटी सेक्टर में महिलाओं से नाइट शिफ्ट में काम लेने की अनुमति दी, तब स्त्रियों के कामकाज के दायरे का और विस्तार हुआ। हाल के वर्षों में कॉल सेंटरों ने बड़ी संख्या में लड़कियों को रोजगार दिए हैं। लेकिन कई जगहों पर नाइट शिफ्ट में काम करके लौट रही लड़कियों के साथ लूटपाट और छेड़छाड़ की घटनाएं घटीं। कई मामलों में तो कॉल सेंटर के ड्राइवर और दूसरे कर्मचारी ही उसमें लिप्त पाए गए। बेंगलुरु में कॉल सेंटर की एक लड़की के साथ रेप और उसकी हत्या की घटना आज भी सबको याद है। इसके बाद काफी हो-हल्ला मचा था और अनेक कंपनियों ने अपनी महिला कर्मचारियों की सिक्युरिटी को लेकर कई अहम कदम उठाए थे। इस संबंध में कई नए मानदंड भी तय किए गए। जाहिर है उसके बाद से स्थिति थोड़ी बहुत बदली है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। नियम-कायदे बनाने का फायदा भी तभी होगा जब समाज की सोच बदले। चाहे बीपीओ सेक्टर हो या कोई और क्षेत्र, पुरुषवादी मानसिकता हर जगह हावी है। पुरुषों का एक बड़ा तबका अब भी स्त्रियों के साथ काम करने को लेकर बहुत सहज नहीं है। शायद इसीलिए कामकाजी महिलाएं अपने सहकर्मियों के अस्वाभाविक और कुंठित व्यवहार की शिकायतें अक्सर करती रहती हैं। ऐसे ही लोग महिलाओं को दी जाने वाली सहूलियतों और उनके हित में बने नियमों पर भी सवाल उठाते हैं और उन्हें अमल में लाने में भी कोताही बरतते हैं। दिल्ली के कॉल सेंटर में स्पाई कैम रखने वाले कर्मचारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिसके तहत जुर्माने या अधिकतम एक साल तक की साधारण कैद या फिर दोनों का ही प्रावधान है। उसे और सख्त धाराओं के तहत अधिकतम सजा देने की जरूरत है, क्योंकि उसके कृत्य ने न सिर्फ उस कॉल सेंटर की, बल्कि देश भर की कामकाजी महिलाओं में असुरक्षा भाव पैदा किया है। यह संदेश देना जरूरी है कि औरतों के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने का अंजाम बेहद बुरा होता है।

Thursday, April 22, 2010

मुफ्त के बाराती

देश में क्रिकेट और आम आदमी का रिश्ता दूल्हा और मुफ्त के बारातियों वाला है। आड़े वक्त में किसी के काम आएं न आएं, लोग उसकी शादी में जमकर नाचते हैं। सांप बनते हैं, बन्दर बनते हैं, रीछ की तरह हुल्ला-हुल्ला करते हैं। ठीक यही हालत क्रिकेट के दीवानों की है। अपने बच्चे को सुबह से शाम तक ट्यूशन, होमवर्क, स्कूल और कोचिंग में उलझाने वाला आदमी फुरसत मिलते ही रिमोट लेकर टीवी के आगे बैठ जाता है। किसी कारणवश मैच छूट जाए तो उसकी हालत किसी ऐसे नशेड़ी की तरह हो जाती है जिसे अपनी खुराक न मिली हो। जब खेल नशा हो जाता है तो नशे के व्यापारी भी पैदा हो ही जाते हैं। थरूर की विदाई बाद अब ललित मोदी के जाने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। अपने खिलाफ हो रही गोलबंदी और सरकारी धमकियों से खौफ खाकर वे आईपीएल की चेयरमैनी छोड़ भी दें तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? जिस तरह मोदी ने आईपीएल का धंधा खड़ा किया है, उसी तरह जगमोहन डालमिया ने एक दौर में क्रिकेट को मुनाफे का कारोबार बनाया था। लगता नहीं था कि कभी कोई डालमिया का बाल भी बांका कर पाएगा। फिर एक दिन डालमिया गए तो उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियों के आरोपों की बाढ़ सी आ गई थी। लगने लगा कि अब तो उन्हें जेल की चक्की पीसने से कोई नहीं बचा पाएगा, लेकिन समय बीतने के साथ ये आरोप हवा होते चले गए। अलबत्ता उनकी विदाई के बाद बीसीसीआई का कामकाज सुधरने की जो उम्मीद की जा रही थी, उसका हाल यह है कि आज की दशा देखते हुए उसका डालमिया संस्करण ही कहीं ज्यादा पाक-साफ जान पड़ता है। मान लें, मोदी नहीं मानते और अगली 26 अप्रैल को आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल को उन्हें धक्के देकर बाहर निकालने का फैसला करना पड़ता है। इससे क्या बीसीसीआई के अपने पाप धुल जाएंगे? टीमों के लिए फाइनैंसर जुटाने और उनके पक्ष में बोली छुड़ाने से लेकर भारत के बजाय विदेश में टूर्नामेंट कराने तक के किसी भी फैसले में क्या ललित मोदी के अलावा किसी और व्यक्ति का नाम कहीं सुनने को भी मिला था? बीसीसीआई के लोग आज चाहे जो भी कहें, लेकिन सारे तथ्यों का इशारा इसी तरफ है कि मोदी को आईपीएल का तानाशाह बनाने का फैसला बीसीसीआई का सामूहिक फैसला है, और ऐसा उसने इसलिए किया था क्योंकि उनके जरिए इस संस्था से जुड़े सभी बड़े लोगों को कुछ न कुछ फायदा मिल रहा था। और बीसीसीआई को भी छोड़िए। इतने दिनों से हमारी ईमानदार केंद्र सरकार क्या कर रही थी, जिसका दावा है कि ललित मोदी के कई सारे घपलों की जानकारी इनकम टैक्स डिपाटर्मेंट की एक रिपोर्ट की शक्ल में उसके पास पिछले छह महीनों से पड़ी है? क्या इस रिपोर्ट को दिन का उजाला दिखाने की याद उसे तभी आई जब एक माननीय मंत्री इस्तीफा देने को मजबूर हो गए? क्या इस देश में कोई इस बात की गारंटी ले सकता है कि मोदी के पद छोड़ देने के बाद आईपीएल के खिलाफ चल रही सारी जांचें ठप नहीं हो जाएंगी, और इस सिलसिले में सरकार के पास पहले से मौजूद रिपोर्टें किसी अंधेरे कोने में सड़ने के लिए नहीं डाल दी जाएंगी? दरअसल, भारत की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है कि यहां व्यक्तियों को मुद्दा बनाकर व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं पर पर्दा डाल दिया जाता है और आईपीएल इसका अपवाद नहीं होगा।

कालिख से लिखा नाम

ताजमहल उनके लिए खास होगा जो इसे प्यार की निशानी के रूप में देखते हैं। ताज उनके लिए भी खास है जो इसे ऐतिहासिक इमारत मानते हैं। ताज उनके लिए भी मायने रखता है जो इसे विश्वधरोहर के रूप में सहेजना चाहते हैं किन्तु जो लोग ताज के आसपास रहते हैं उनके लिए ताजमहल की दीवारों में और सुलभ की दीवारों में कोई खास फर्क नहीं होता। एक का दर्शन सुबह नींद से जागते ही हो जाता है तो दूसरे को प्रतिदिन देखने जाना अनिवार्य होता है। अकेला ताज ही क्यों बल्कि आगरा स्थित प्रत्येक धरोहर वहां के स्थानीय बाशिंदों के लिए एक जैसा है। वे उन्हें देख-देख कर ऊब चुके हैं। उनकी दिलचस्पी उन लोगों में है जो इन धरोहरों को देखने आते हैं। उनसे उनकी रोजी-रोटी जुड़ी है। इंसानों की हर बस्ती की तरह प्यार यहां भी पनपता है। प्यार में डूबे युवा जोड़े चाहते हैं कि लोग उन्हें जानें, उनके प्यार की तसदीक करें और उन्हें याद रखें। अब स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने के लिए तो खुद के इतिहास बन जाने का इंतजार करना होगा। क्या पता उसके बाद भी उनका नाम इतिहास में आए न आए। लिहाजा अपना हाथ जगन्नाथ। उठाया जली हुई लकड़ी का टुकड़ा और घसीट दिया अपना नाम। फलां+ ढिमका। वैसे जमाना कोड लैंग्वेज का है। इसलिए अब पूरा नाम नहीं लिखा जाता। सु+गी, पु+अ लिखना काफी माना जाता है। कूट भाषा की बात चली तो याद आया, एक मित्र अपनी बिटिया के मोबाइल का मुआयना कर रहे थे। फोनबुक में नाम बहुत कम थे। अलबत्ता एए, 22, केके, एल4यू जैसे कूट नाम ढेरों थे। जिस नम्बर से सर्वाधिक काल आए थे, वह फोनबुक में नहीं था। शायद नम्बर याद कर लिया गया था। मित्र ने सिर पीट लिया था ठीक उसी तरह जिस तरह इन दिनों आगरे का भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग अपना सिर धुन रहा है। यहां स्थित दर्जनों विश्वधरोहरों पर कोयले के टुकड़े से नाम लिखे जा रहे हैं। हालांकि ताजमहल इससे सुरक्षित है किन्तु उसकी नींव पर लोग पेंट से नाम लिखना शुरू कर चुके हैं। शेष इमारतों का तो बुरा हाल है। वहां केवल प्रेमियों के नाम ही नहीं गुदे हुए वरन् विकेट भी बने हुए हैं। पुरातत्व विभाग का मानना है कि इन धरोहरों के आसपास अवैध निर्माणों के कारण इस प्रक्रिया में तेजी आई है। यहां झुग्गियां बस गई हैं। वहां बच्चे हैं। वे क्रिकेट खेलते हैं। क्रिकेट खेलने के लिए इन इमारतों की मजबूत दीवारों को विकेट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। लकड़ी कोयले से दीवारों पर विकेट खींच दिया जाता है। वैसे मोहल्ले की औरतें उसपर कंडा भी छाब लेती हैं। गरीब के जीवन में धरोहर जैसी विलासिता नहीं होती। उनका शादी का जोड़ा रोज पहनने के काम आने वाला डेलीयूज का वस्त्र होता है जो फट जाने के बाद पर्दे का भी काम करता है और फिर चिंदी-चिंदी होकर बिखर जाता है। उनके लिए पर्यटन कोई मायने नहीं रखती। रिश्तेदारों की शादी, मरनी धरनी पर वे मुश्किल से भाड़े के लिए पैसा निकाल पाते हैं। यह दो तीन दिन के फ्री भोजन पानी में एडजस्ट हो जाता है। इसलिए जब दिल्ली के लालमैदान में आडवाणी और गडकरी जैसे लोग अमीर और गरीब के बीच चौड़ी होती खाई की चर्चा करते हैं तो अजीब सा लगता है..

Wednesday, April 21, 2010

पाकेटमार की पिटाई

बस स्टाप पर एक युवक की बेदम पिटाई हो रही थी। जिसे मौका मिल रहा था एकाध हाथ जमा देता था। लोगों पांव के जूते हाथों में लिये पिले पड़े थे। जिसे वे पीट रहे थे वह दोनों बाहों के बीच अपने सिर को छिपाए चुपचाप मार खा रहा था। तभी पुलिस पहुंची और भीड़ अंतिम लात, घूंसा मारकर परे हट गई। पुलिस ने दो लातें और जमार्इं और पूछा पाकिट मारी? युवक ने हामी भरी और मुट्ठी में से पर्स को फिसल जाने दिया और फिर बेहोश होकर पसर गया। शायद कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। उसे देखते ही दिल्ली का वह डाक्टर याद आ गया। हां! उसका नाम वरुण कौल है। वह एमबीबीएस डाक्टर है। टेबिल टेनिस का राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुका था। उसके पिता भारतीय नौसेना में चिकित्सक थे। उसने किसी फौरी जरूरत के लिए नहीं बल्कि अपना शौक पूरा करने के लिए फर्जी डिमांड ड्राफ्टों के जरिये कार डीलरों को चूना लगाया। मजे की बात यह है कि उसके पिता ने भी इसमें उसका साथ दिया। फर्जी डिमांड ड्राफ्ट देकर इस इज्जतदार आदमी ने टाटा सफारी, स्कार्पियो और होंडा सिटी खरीदी। यह एक प्रकरण यह बताने के लिए काफी है कि जरूरी नहीं है कि जुर्म गरीबी और जरूरत की खातिर ही किया जाए। अपना शौक पूरा करने के लिए नौजवान पीढ़ी अपराध करने से भी गुरेज नहीं कर रही है। दरअसल, यह अपराध का नया और बेहद डरावना चेहरा है। चिंता का पहलू यह है कि ऐसे गैर पेशेवर अपराधियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो उच्च शिक्षित होने के साथ-साथ संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। यह कंगाल अथवा मजबूर लोग नहीं हैं। यह मध्यम वर्ग की वह संतानें हैं, जिनके पास समृद्धि हासिल करने के तमाम विकल्प हैं। पर जिन्हें पैसे की हवस अपराध की राह पर ले जा रही है। इन अपराधियों को पकड़ना पुलिस के लिए भी कम चुनौतीपूर्ण काम नहीं है, क्योंकि उनका रिकार्ड पुलिस के पास उपलब्ध नहीं रहता। पुलिस को भी नहीं सूझ रहा कि ऐसे अपराधियों को अपराध शास्त्र की किस श्रेणी में रखा जाए? पुलिस अक्सर इन शातिराना अपराधियों के रहन-सहन व सामाजिक रुतबे से चकमा खा जाती है, लेकिन डॉक्टर की गिरफ्तारी से इतना तो पता चलता है कि अपराधी चाहे कितना भी चालक और शातिर हो, कानून की गिरफ्त से नहीं बच सकता है। मुख्य सवाल लालच की उस संस्कृति के खात्मे का भी है, जिसके वशीभूत लोग अपराध की डगर पर चल निकले हैं। आत्मानुशासन के सिवाय अपराध के इस नये सिलसिले को थामने की कोई दूसरी राह नहीं दिखती है।

अब लगा महंगाई का नम्बर

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आज राजधानी नई दिल्ली में महंगाई के खिलाफ हल्ला बोल हो रहा है। भाजपाइयों का मनोबल ऊंचा है। हाल ही में उन्होंने शशि थरूर को निपटाया है। आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी भी निपटने के कगार पर हैं। किसी भी बड़े यज्ञ के लिए पहले बलि दी जाती है। दो बलियां हो चुकीं। अब यज्ञ शुरू होने जा रहा है। यज्ञ हवन पूर्ण होने पर महंगाई गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाएगी। बताते चलें कि महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन के लिए बाकायदा मुहूर्त निकाला गया था। देश भर में कद्दावर नेताओं को जिम्मेदारियां दी गई थीं कि वे आदमी इकट्ठा करें और उन्हें लेकर दिल्ली पहुंचें। राज्यवार और जिलेवार लोगों को इकट्ठा करने का ठेका हुआ था। वैसे केन्द्र सरकार ने भी अपने कैलेण्डर पर 21 अप्रैल की तिथि पर गोला लगा दिया था। ठीक वैसा ही गोला जैसा दूधवाले के नहीं आने पर श्रीमतीजी दरवाजे के पास लटके भगवान वाले कैलेण्डर पर लगाती हैं। लिहाजा ठीक एक दिन पहले रिजर्व बैंक ने रेपो दर और रिवर्स दर में फेरबदल की सूचना दे दी। आधी जनता कनफ्यूज, अब क्या होगा? मौद्रिक उपाय अर्थशास्त्रियों की समझ में देर से आते हैं, आम आदमी की क्या बिसात? पर वह कन्फ्यूज तो होता ही है। इससे और कुछ हुआ हो या न हुआ हो प्रदर्शनकारियों के मनोबल पर जरूर असर हुआ होगा। वैसे भी भरी गर्मी में एसी-कूलर और घर का आराम चैन छोड़कर कौन मूर्ख ट्रेनों में ठुंसकर भेड़ बकरियों की तरह दिल्ली जाना पसंद करता है। पर मजबूरी है। आगे पद चाहिए तो इतना तो करना ही पड़ेगा। वैसे इस बंद का आम आदमी पर भी भारी असर पड़ा है। आम आदमी बेचारा गर्मियों की छुट्टी में गांव जाने की तैयारी किये बैठा था। दो महीना पहले से रिजर्वेशन करा रखा था किन्तु जब ट्रेन में चढ़ा तो अपनी सीटों पर सिर पर तीन रंगा साफा बांधे युवकों को बैठे देखा। उसका हलक सूख गया। विरोध क्या करता, अपना सामान रखने और बच्चे और लेडिज को बैठाने के लिए अवैध कब्जाधारियों को ‘रिक्वेस्ट’ करने लगा। ट्रेन का कंडक्टर और टीटीई पता नहीं कहां मर गए थे। खड़े खड़े मन को झूठी तसल्ली देता रहा कि भई ये लोग हमारे लिये ही तो दिल्ली जा रहे हैं। ये प्रदर्शन करेंगे तो केन्द्र सरकार की आंखें खुलेंगी। महंगाई कम होगी। थोड़ी राहत मिलेगी। पूरी बोगी का यही हाल था। जिनका रिजर्वेशन था उनका सामान बेंच के नीचे था। बच्चे ऊपर के बर्थ में माइक्रोवेव हो रहे थे। श्रीमतीजी बर्थ के कोने में लटकी कुढ़ रही थी कि चलो जी टिकट कैंसल करो, घर लौट चलते हैं। ऐसे तो बच्चे बीमार पड़ जाएंगे। मन तो श्रीमान का भी यही चाहता था किन्तु बच्चों की जिद के आगे एक न चली। ट्रेन का सफर और मामा के बागीचा का आम खाने की खुशी में बच्चे हर दुख, हर कष्ट झेल गये थे। खूब मन लगाकर पढ़ाई की थी। सफर के एक महीना पहले ही तय कर लिया था कि कौन खिड़की के पास बैठेगा। किन्तु यहां सबकुछ उलट पुलट हो गया था। ऊपर का बर्थ और लोहे की छत के बीच उनका भुर्ता बन रहा था। चेहरे पर बहते पसीने में आम आदमी की बेबसी के आंसू गुम हो रहे थे। ऐसा ही होता है, अकसर ऐसा ही होता है बल्कि अब तो ऐसा ही होता रहेगा।

Tuesday, April 20, 2010

महंगी पड़ी होशियारी

इंसान ने चक्का बनाया, आग जलायी। रफ्तार और ऊर्जा की चकाचौंध करती ताकत ने उसे अंधा बना दिया और वह सरपट भागने लगा। वह धरती फोड़कर उसके पेट का पानी निकाल लाया। बहती नदियों का प्रवाह रोक दिया। धरती का सीना चीरकर पाताल में उतर गया। वहां से खनिज बाहर ले आया। गला-गला कर धरती के सीने पर इमारतें बना लीं। धरती को छोड़ चांद की तरफ भागा, मंगल तक घूम आया। अपनी बुद्धि के कमाल पर मुग्ध होता रहा। पर प्रकृति का एक पलटवार इंसानी प्रगति की तमाम उपलब्धियों पर प्रश्न चिन्ह लगा जाता है। भूकंप, सुनामी, बाढ़, चक्रवात, तूफान इन सबको हम प्राकृतिक आपदा कहते हैं। आपदा प्रकृति की ओर से आती है तो प्राकृतिक ही कहलाएगी, लेकिन इसके आगमन की पृष्ठभूमि इंसानी करतूतों से ही बनती है। जीवन को आसान बनाने वैज्ञानिक आविष्कार वरदान साबित हुए हैं, लेकिन जब यही तरक्की कुछ इंसानों के लिए स्वर्गिक आनंद और कुछ के लिए नारकीय पीड़ा बन जाए, और आने वाली पीढ़ियों के लिए अस्तित्व के खतरे का प्रश्न उत्पन्न करें, प्रकृति को नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त करें तो सोचना होगा कि ये उपलब्धियां हमें किस कीमत पर हासिल हो रही हैं। दुनिया भर में तबाही मचाने वाले भूकम्पों का सिलसिला सा चल पड़ा है। हैती, तिब्बत, बिहार, पश्चिम बंगाल में हजारों लोगों की जानें गर्इं और अरबों की सम्पत्ति कबाड़ में तब्दील हो गई। विकसित समाज इसकी सीधी जिम्मेदारी लेने के बजाए ग्रीन हाउस गैसों का नाम आगे कर रहा है। ये ग्रीन हाउस गैसें भी अंतत: उसकी करतूतों से उपजी हैं। अपने रहन-सहन के लिए पेड़ों को बेतहाशा काटना, प्राकृतिक ऊर्जा के अधिकतम दोहन की जगह कृत्रिम ऊर्जा का उत्पादन और फिर अपव्यय करना। उस पर नाटक यह कि ऊर्जा बचाने, पर्यावरण संरक्षण की फिक्र सबसे ज्यादा इन्हीं को है। ताजा उदाहरण आईपीएल मैचों का है। टॉस के वक्त पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाता है और शाम के मैच में हजारों वाट के बल्बों की रौशनी कर बिजली का दुरुपयोग होता है। इसका भुगतान वंचित तबका गर्मी में लू और ठंड में खून जमा देने वाली हवाओं से लड़ते हुए अपनी जान देकर चुकाता है। तूफान और बाढ़ के पानी में इनका जीवन बह जाता है और उच्च वर्ग इनकी बरबादी का हवाई जायजा लेता है। लेकिन अब इस उड़ान पर प्रकृति ने खुद पाबंदी लगाई है। आइसलैंड के इजाफालाजोएकुल ग्लेशियर में गत बुधवार को फटे ज्वालामुखी की राख ने पिछले पांच दिनों से दुनिया के पश्चिमी हिस्से को उड़ान से वंचित कर रखा है। 24 देशों में उड़ान सेवाएं बंद हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहला मौका है जब इतने बड़े पैमाने पर उड़ान सेवा बंद हुई हो। आईसलैंड का यह ज्वालामुखी आखिरी बार 1812 में फटा था और तब एक वर्ष तक सुलगता रहा था। यूरेशिया और उत्तरी अमरीका महाद्वीपों की सीमा पर मध्य अटलांटिक पट्टी पर आईसलैंड स्थित है। इस क्षेत्र की भूगर्भीय रचना ऐसी है कि जमीन के भीतर काफी हलचल होती है। ज्वालामुखी के फटने की वजह यही है। ज्वालामुखी की राख और धुएं के बादल आकाश में साढ़े आठ किलोमीटर तक फैले हैं और इनसे हवाई यात्रा के लिए मार्ग साफ न दिखने के अलावा विमानों को भी काफी नुकसान होता है। राख और धुएं के कण विमानों के इंजन में बैठ जाते हैं, जिससे नुकसान होता है। प्रकृति का यह थप्पड़ उस समाज की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए काफी होना चाहिए जिसे लगता है कि वह सर्वज्ञ हो गया है। जो ठोकर खाकर संभल जाए वही इंसान है और जो फिर भी न संभले वह बेवड़ा।

एमआरपी और इज्जतदार

ग्राहकों को जगाने के तमाम अभियान इस्पात नगरी में आकर फेल हो गए हैं। यहां इज्जतदार ग्राहक जागरूक नहीं और यदि किसी तरह जाग गया तो उसकी इज्जत नीलाम होते देर नहीं लगती। एमआरपी याने मैक्ज़िमम रिटेल प्राइस। हिन्दी में इसे कहते हैं सर्वाधिक खुदरा मूल्य। यह वस्तु का न्यूनतम मूल्य नहीं है। कोई वस्तु बनती देश के किसी कोने में है और बिकती पूरे देश में है। हर जगह अलग-अलग टैक्स, हर जगह पहुंचने का अलग-अलग भाड़ा। इन सब बातों का ख्याल रखकर एक एमआरपी तय की जाती है जिससे अधिक नहीं लिया जा सकता। चूंकि यह मूल्य उत्पादन स्थल से अधिकतम दूरी के लिए निर्धारित होती है इसलिए आम तौर पर एमआरपी से कुछ कम में बेचने पर भी दुकानदार को कोई नुकसान नहीं होता बल्कि अधिकांश दुकानदार ऐसा ही करते भी हैं। इस्पात नगरी में एक ही वस्तु सिविक सेन्टर, सेक्टर-6, जवाहर मार्केट और सुपेला में अलग-अलग दामों में बिकती है। सभी जगह एमआरपी एक ही होता है किन्तु वास्तविक बिक्री मूल्य कम ज्यादा होता है। इज्जतदारों वाले मार्केट में एमआरपी पर माल खरीदने वाले कस्टमर अधिक होते हैं। ग्राहक ने थोड़ी भी जागरूकता दिखाई तो दुकानदार पहले तो यही कहता है कि इस आयटम में बिल्कुल मार्जिन नहीं है। फिर कहता है, ‘आपसे गलत नहीं लेंगे।’ जब ग्राहक किसी और दुकान के बारे में बताता है तो वह भड़क जाता है और अपना माल वापस खींच कर कहता है, ‘वहीं चले जाइए।’ ग्राहक खामोशी से बाहर निकलने लगता है तो उसके कानों में यह शब्द पिघले शीशे की तरह पड़ते हैं, ‘न जाने कहां-कहां से चले आते हैं।’ ग्राहक मुंहजोरी नहीं करता। वह अपना दांव खामोशी से खेलता है। जिस बाजार में पैदल चलना मुश्किल था वहां ग्राहक अब कार लेकर पहुंचते हैं। पहले ग्राहकों की राशन दुकानें फिक्स होती थीं, अब कपड़ों से लेकर जूतों तक की दुकानें फिक्स हो गई हैं। वह सदव्यवहार चाहता है। वाजिब दाम चाहता है। वैसे शहर में इज्जतदार होने के तरीके भी नायाब हैं। अंचल के एक नामचीन कदरन नए होटल में जाने का मौका मिला। महलों जैसा इंटीरियर। कभी हम वेटरों को तो कभी अपने आप को देखते थे। हमारा स्पांसर बड़ा था। वह इससे नीचे के होटल में नहीं जाता। उसे तो इस होटल से भी शिकायत थी। हमारा टेबल बुक था। पहले स्टार्टर आया। हमने किक मारी और स्टार्ट हो गए। अलबत्ता मेजबान सेल्फ मार रहा था। उसे स्टार्ट होने में थोड़ा वक्त लगा। इस बीच हमारी निगाह डाइनिंग हाल में घूम गई। औद्योगिक क्षेत्र का सबसे बड़ा बिजली चोर कोने के टेबल पर सपरिवार बैठकर 20 रुपए नग रोटी खा रहा था। गौर से देखा तो एक अंधेरे कोने में एक स्थापित शाकाहारी परिवार दोनों हाथों से किसी वस्तु को पकड़कर उसे दांतों से नोंच रहा था। इच्छा हुई कि उसे बताऊं कि खाना ही हो तो वहां खाओ जहां यह सब फ्रेश मिलता है। फिर अगले की इज्जत का ख्याल आ गया। हकीकत यही है कि एक वर्ग के लोगों को अब एमआरपी की परवाह नहीं रही। देशी अंग्रेजों की यह पीढ़ी आम आदमी से दूरी बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकती है।

Sunday, April 18, 2010

स्पोकन इंग्लिश

मातृ भाषा और मोहल्ला भाषा से इतर इन दिनों बोलचाल की तीसरी भाषा अंग्रेजी हो गई है। हर कोई अंग्रेजी बोल रहा है या बोलने की कोशिश कर रहा है। अंग्रेजी के चार अक्षर बोल पाना शिक्षित होने की गारंटी हो गई है। वैसे अधिकांश धाराप्रवाह हिंग्लिश बोलते हैं। जिन्हें हिंग्लिश नहीं आती वे इतना क्लिष्ट इंग्लिश बोलते हैं कि अंग्रेजों की समझ में भी शायद ही आए। अंग्रेजी के कुछ फिकरे तो तकियाकलाम हो गए हैं। बाजार में थैला लिये एक मित्र मिला। बहुत दिनों बाद मिले थे। देखते ही चिल्लाया, ‘हाय!’ मेरे मुंह से भी निकल गया ‘हल्लो!’ करीब आते ही उसने मेरे कंधे पर हाथ मारा, एक हाथ दूर खड़ा होकर गौर से नीचे से ऊपर तक देखा और फिर बोला, ‘तुम आज भी बिल्कुल वैसे ही हो, यू..नो! बिल्कुल भी नहीं बदले।’ यह बात और है कि मैं बिल्कुल नहीं बदला, यह बात मुझे नहीं मालूम तो और किसे मालूम। सब्जी मंडी के बीच की संकरी सी राह पर हम फैल कर खड़े थे। तभी किसी पसरा वाले ने सांड को लाठी दे मारी। सांड तेजी से हमारे बाजू से निकला और मित्र का थैला उसकी चपेट में आ गया। कुछ टमाटर उछल कर जमीन पर आ गिरे। मित्र के मुंह से निकला, ‘ओह शिट्!’ समझ में नहीं आया ‘शिट्’ उसने टमाटर को कहा या सांड को, अलबत्ता असर किसी को नहीं हुआ। बातचीत के बीच-बीच में वह कहता, ‘ओ..खे, ओ..खे’। थोड़ी देर में समझ आ गया कि यह ओक़े का स्टाइलिश उच्चारण है। मेरी एक मित्र हैं जो अंग्रेजी अच्छी खासी बोलती हैं पर हर वाक्य के अंत में ‘ना’ बोलने की आदत है। कहेगा, ‘ही इज़ सो हैण्डसम, ना..’। मिनी बस के कंडक्टर से लेकर, रेहड़ी पर ककड़ी बेचने वाला भी अंग्रेजी के कुछ शब्द बोलता है। कहते हैं जब डिमाण्ड अच्छी हो तो सप्लाई की कीमत बढ़ जाती है। लोग इसलिए अब इंग्लिश सीखने जाते हैं। इसके लिए अच्छी खासी फीस अदा करते हैं। स्पोकन इंग्लिश की क्लास में ग्रामर सीखते हैं। पूरे ग्रामर के साथ जब वे अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते हैं तो सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है। उसकी हालत ठीक वैसी ही होती है जैसी नए सिंगर की रफी साहब के गीत गाते समय होती है। कुछ शब्द अंदर जाती सांस के साथ अंदर चले जाते हैं। हक़ीकत तो यही है कि बोलचाल की भाषा में ग्रामर का कोई रोल नहीं होता। वैसे भी भाषा में ग्रामर बाल की खाल उधेड़ने वाला काम है। किसी ने भी अपनी मातृभाषा का ग्रामर नहीं पढ़ा होता किन्तु इससे उसकी संप्रेषण क्षमता में कोई कमी नहीं आती। आप अंग्रेजी पढ़ते हैं, अंग्रेजी सुनते हैं, अंग्रेजी बोलते हैं तो यह भाषा आप सीख सकते हैं। आप जितना अधिक पढ़ते और सुनते हैं उतना ही आपका शब्द भंडार बढ़ता जाता है। कोई शब्द एडजेक्ट्वि है या वर्ब, नाउन है या प्रोनाउन, यह अगर आपको नहीं भी पता है तो कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे फर्राटे की ग्रामर वाली स्पोकन इंग्लिश सुननी हो तो निजी स्कूलों के प्रिंसिपल मैम के भाषण सुन लो। यदि बदकिस्मती से आपको अंग्रेजी आती हो तो राजू श्रीवास्तव फेल हो जाएगा। यह मुफ्त का लाफ्टर चैलेंज प्रोग्राम है। यह वैसा ही चुटकुला है जैसा कि कापी किताब लेकर स्पोकन इंग्लिश सीखने जाना।

Saturday, April 17, 2010

विनाशकाले विपरीत बुद्धि

नहीं! अब रावण जितने ज्ञानी या गुणी लोग पैदा नहीं होते। या यूं कहें कि इस युग में रावण जैसा दशानन तैयार हो भी नहीं सकता। अब तो केवल रावण के अवगुण वाले लोग ही पैदा हो पाते हैं। विनाशकाले विपरीत बुद्धि वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए रावण ने हर उस व्यक्ति को लात मारकर दरबार से बाहर कर दिया था जिसने उसे माता सीता को लौटाकर श्रीराम से सुलह करने की सलाह दी। इससे रावण के साथ केवल वही लोग बच गए थे जो सत्ता के साथ चिपके रहने में ही भलाई समझते हैं। ऐसे लोगों की कमी न तो मुगल काल में थी और न अंग्रेजों के दौर में। तब लोग लूटने आते थे। अब हम खुद लुटने को तैयार बैठे हैं। विदेशों में जाकर सौदा कर आते हैं और फिर मार पीटकर अपने आदमियों को उनके हवाले कर देते हैं। उनकी संपत्ति छीनकर आक्रांताओं को सौंप देते हैं। वैसे त्रिलोकविजयी रावण ने संभवत: नारायण के हाथों अपना वध करवाने के लिए ही यह प्रपंच रचा था। मातासीता को बलपूर्वक अपनाना उनका उद्देश्य कतई नहीं था। अपनी इहलीला समाप्त करने के लिए यह उनकी मजबूरी थी। बचपन में क्रिकेट खेलने जाते थे तो हर कोई उसकी टीम में शामिल होना चाहता था जिसका बल्ला होता था। चिढ़ जाने पर वह अपना बल्ला लेकर घर चला जाता था। इसलिए उसके मूड का पूरा ख्याल रखा जाता था। पाले बाजी का यह खेल पिछले कुछ दिनों से फिर देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब खेलने वाले बड़े-बड़े लोग हैं। इनमें स्थापित बुद्धिजीवी हैं। तरुण विजय ने कहा कि अरुंधति राय को नक्सलियों के बारे में कुछ नहीं पता। वे कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नहीं गर्इं। वातानुकूलित कमरे में बैठकर लिखती हैं। यह तरुण विजय नहीं बल्कि उसके मन की वह हीन ग्रंथि बोल रही थी जिसे बुकर पुरस्कार नहीं मिला। जिसे बतौर लेखक सभ्य समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। तरुण को शायद नहीं पता कि अरुंधति चाय बागान में पैदा हुई थी और कम्युनिज्म के गढ़ केरल में उसका बचपन बीता था। हालांकि किसी का दर्द महसूस करने के लिए अपने सीने में नश्तर चुभाना जरूरी नहीं होता किन्तु यदि तरुण की यह बात मान भी ली जाए तो यह सवाल फिर भी खड़ा रहता है कि खुद तरुण क्या बस्तर में पैदा हुए थे? वैसे हुए भी हो सकते हैं। जब प्रचार तंत्र अपना हो तो व्यक्ति जहां चाहे वहां पैदा हुआ हो सकता है। वे सोनिया और राहुल पर चढ़ दौड़ते हैं कि सीआरपीएफ जवानों की शहादत पर वे खामोश क्यों हैं। हकीकत तो यही है कि इसपर कहने को क्या है? यही क्या कम है कि सोनिया और राहुल उन दोषियों के गिरहबान नहीं पकड़ रहे जिन लोगों ने जवानों को एक ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए भेज दिया जिसकी कोई रणनीति, कोई ट्रेनिंग उन्हें नहीं थी। बेहतर हो कि ऐसे लोग नगाड़ा बजाकर भीड़ इकट्ठा करने से बचें और आत्मनिरीक्षण करें कि गलती कहां हुई। वे उसमें सुधार करें ताकि आइंदा बेकसूर जवानों का कत्लेआम न हो। फिर चाहे वे नक्सलियों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें कुत्तों को खिला दें।

Friday, April 16, 2010

ताड़मेटला के साइड इफेक्ट्स

दंतेवाड़ा के नक्सली हमले पर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह के लेख से कांग्रेस में भूचाल आ गया है। दिग्विजय सिंह ने एक लेख में सपाट लहजे में कह दिया कि पी चिदम्बरम उनके अच्छे मित्र हैं किन्तु उनका मानना है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अड़ियल स्वभाव के हैं। दिग्विजय सिंह ने लिखा कि नक्सलियों के खिलाफ युद्ध छेड़ देना ठीक नहीं है। यह एक आर्थिक सामाजिक समस्या है जिसका हल इस तरह से नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने कहा कि गोलियां चाहे नक्सली चलाएं या सुरक्षा बल अंतत: मौत आदिवासियों की ही होनी है। इस लेख के प्रकाशित होते ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस परेशानी में पड़ गई है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य के केशव राव और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य अजीत जोगी भी दिग्विजय सिंह के समर्थन में आ गए हैं। केशव राव इसपर दिग्विजय से भी दो कदम आगे पहुंच गए। उन्होंने कहा कि वनवासियों पर हम पिछले चार दशकों से बातें कर रहे हैं किन्तु उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं ला पाए हैं। हम आज भी केवल बातें ही कर रहे हैं। हमें वहां विकास कार्य करने चाहिए। इसकी रक्षा के लिए सुरक्षात्मक, संरक्षात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। वे कहते हैं, पाकिस्तान हम पर बार बार हमले करता है। कारगिल में हजारों जवान शहीद हुए, क्या हमने पाकिस्तान से बात करना छोड़ दिया? फिर हम नक्सलियों से बातचीत क्यों नहीं करना चाहते? कांग्रेस का तटस्थ धड़ा भी इन विद्रोहियों के खिलाफ नहीं है। वह केवल इतना चाहते हैं कि इन बातों को पार्टी फोरम में उठाया जाना चाहिए ताकि पार्टी अपना रुख स्पष्ट कर सके। छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के इकलौते सांसद चरणदास महंत ने इस मौके का दूसरा फायदा उठाया। उन्होंने नक्सलियों और भाजपा में सांठगांठ का आरोप लगाते हुए कह दिया कि नक्सल उपद्रव वाले अंचलों में भाजपा ने नक्सलियों से सांठगांठ कर रखी है। यही वजह है कि वहां न केवल भारी मतदान होता है बल्कि भाजपा ही जीतती है। दरअसल नक्सल समस्या पर मनभेद और मतभेद आरंभ से हैं। हमने पहले भी कहा है कि नक्सल समस्या अंधों का हाथी है। जो जिधर से छूता है उसे वैसा समझ में आता है। इस एक ही समस्या का देशभर में अलग अलग नाम है। कहीं ये माओवादी उग्रवादी कहलाते हैं तो कहीं प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के सदस्य कहलाते हैं तो कहीं केवल नक्सलवादी कहलाते हैं। इसका लाभ चरमपंथियों को मिलता है। वे जानते हैं कि जब दुश्मन अपने ही घर में लड़ पड़े तो उसे कमजोर समझना चाहिए। जनता में भी गलत सूचना जाती है। सरकार पर से उसका भरोसा उठने लगता है। ताड़मेटला मुठभेड़ के ये साइड इफेक्ट्स इस अभियान को कमजोर कर सकते हैं।

वैकेशन होमवर्क

मुसद्दीलाल मकान शिफ्ट कर रहे थे। दस चक्के का ट्रक घर के सामने खड़ा था। पुराना टेबल पंखा, टूटा केरोसीन स्टोव, पुराने बिस्तर-गद्दे, पुराने कपड़ों की पोटलियां, टूटी चप्पलें सबकुछ मोटरा बांधबांधकर ट्रक में डाला जा रहा था। हमसे रहा नहीं गया। वैसे भी मोहल्ले में मास्टर होने की इज्जत हासिल थी। पूछा, ‘भई इन पुरानी चीजों को ढोते फिरने का क्या फायदा? इस कबाड़ को ढोने के लिए ही इतना बड़ा ट्रक मंगवाना पड़ा है।’ मुसद्दी मुस्कराए। बोले, ‘कोई और कहता तो कोई बात नहीं थी, कम से कम आप तो मत ही बोलो। कबाड़ ढोना मैंने शिक्षा विभाग से ही सीखा है। नई-नई चीजें जुड़ती जा रही हैं, पुरानी को फेंक नहीं रहे। बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ बढ़ता ही चला जा रहा है। जिस इतिहास से हम कभी सबक नहीं लेते, उसे पढ़ना क्यों जरूरी है, समझाएंगे? जिन पूर्व प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों को देश भूल चुका उनके बारे में बच्चों को क्यों पढ़ाया जा रहा बताएंगे? यूरो-4 के जमाने में पाषाण युग क्यों रटाया जा रहा, विलुप्त प्राणियों पर क्यों वक्त बरबाद किया जा रहा कोई बताएगा?’ वे कहते ही चले जा रहे थे और हम अपने वस्त्रों में धंसते चले जा रहे थे। ‘इन बातों पर हमारा जोर नहीं चलता। हम तो बताया गया सिलेबस पढ़ाते हैं’, हम मिमियाये। मुसद्दीलाल तमतमा गए। छूटते ही कहा, ‘तो इसका जवाब दीजिए। रिजल्ट आने के बाद बमुश्किल दस दिन स्कूल लगा है। होमवर्क में तीन महीने का कोर्स दे दिया है। इसे बच्चा घर पर पढ़ेगा, या फिर ट्यूशन वाले से पढ़ेगा। क्या स्कूल उसकी फीस लौटाएगा? बच्चे के पास गांव जाने के लिए छुट्टियां नहीं। एलटीसी, एलएलटीसी लैप्स हो रहा है और उसे केरल का बैकवाटर पढ़ा रहे हो। मुर्शिदाबाद, ग्वालियर, आगरा, दिल्ली बता रहे हो। आपको क्या पता कि उसके लिए इन जगहों में और कार्टूनों की दुनिया में अब कोई फर्क नहीं रहा। न ये यहां जा सकते हैं और न वहां जा सकते हैं।’ हम सोच में पड़ गए। सच ही तो कहते हैं मुसद्दीलाल। बचपन में गर्मियों की छुट्टियां लगती थीं तो हम गांव जाते थे। रिश्तेदारों से मेल मुलाकात होती थी। बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी से परियों, राजकुमारों की कथाएं सुनते थे। ये कहानियां उन्हें जीवन भर याद रहती थीं। नाते रिश्तेदारों के बीच रहकर हम संस्कार सीखते थे। रिश्तों को पहचानते थे। बड़े छोटे का लिहाज सीखते थे। अब यह सब बीते दिनों की बात हो चुकी थी। छुट्टियां लगते ही स्कूल के संचालक लंबे टूर पर निकल जाते हैं पर बच्चे अपने अपने घरों में दुबक कर पहाड़ जैसा वैकेशन होमवर्क करते हैं। वह भी ऐसे पाठ का जिसे अभी स्कूल में पढ़ाया तक नहीं गया। माता-पिता, अभिभावक, अड़ोस-पड़ोस की सीनियर स्टूडेन्ट्स, ट्यूशन मास्टर से पूछपूछ कर होमवर्क कर लेता है। इन पाठों को वह घर पर ही पढ़ लेता है। स्कूल मुफ्त में इन पाठों को पढ़ाने की फीस वसूल लेता है। बच्चा मेहनत करता है, अपनी छुट्टियों की कुर्बानी देता है और फिर भी नाम स्कूल का होता है। हमने मुसद्दीलाल के पांव छुए और चुपचाप घर चला आया। बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताए।

कचरे का निपटान

गर्मियों में जब पानी की किल्लत सामने आई तब दुर्ग जिला कचहरी के शतायु कुएं की भी याद आई। अच्छा हुआ कि इसकी याद आ गई। 1906 में बने 40 फुट गहरे इस कुएं से ऐतिहासिक सामग्रियां बरामद हुर्इं। 1945 की हत्या में प्रयुक्त तलवार, 1947 की गुप्ती, खंजर, 1970 का चाकू और न जाने क्या-क्या। कत्ल के मामलों में पुलिस के पास इस तरह की चीजों का अम्बार लगता है। केस का फैसला होने तक ये सभी ‘एक्जीबिट’ होते हैं जिन्हें अदालत में पेश करना होता है। फैसला आ जाने के बाद ये चीजें बेकार हो जाती हैं। इन चीजों में खून आलूदा मिट्टी, खुरचन, कपड़े, दाग और धब्बे वाले अंत:वस्त्र, लावारिस लाशों का बिसरा आदि भी शामिल होते हैं। नश्वर सामान गल कर नष्ट हो जाते हैं या जला दिये जाते हैं। अलबत्ता धातु के बने हथियार नष्ट नहीं होते। इन्हें बंडल बांधकर तालाब या कुएं में फेंक दिया जाता है। कुछ थानों में इन वस्तुओं को पेड़ों पर पोटलियों की शक्ल में लटका हुआ भी देखा जा सकता है। पुलिस को हम ‘गरीब की बीवी गांव की भौजाई’ वाले रोल में देखने के आदी हैं। इसलिए जितने मुंह उतनी बातें हुर्इं। लोगों ने पुलिस को इस लापरवाही के लिए कोसा। किन्तु यदि हम अनावश्यक वस्तुओं के निपटान की अपनी आदतों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि स्थिति बेहद खराब है। अनावश्यक चीजों के साथ हम भी यही सलूक करते हैं, बल्कि इससे भी खराब सलूक करते हैं। बस या ट्रेन में बैठकर केला खाया, छिलका रास्ते पर या प्लेटफार्म पर फेंक दिया। घर में सुबह झाड़ू लगाया और कूड़े को उठाकर बाहर हवा में उछाल दिया। पालीथीन के पैकेट में सामान लेकर आए। सामान निकाल लिया और पालीथीन को बाहर फेंक दिया। कबाड़ निपटान को हम बेहद हल्के से लेते हैं। इलेक्ट्रानिक युग में कचरा बेहद खतरनाक हो सकता है। बैटरियों पर लिखा होता है कि उपयोग के बाद इसे जलाया न जाए। मोबाइल फोन, पुराना रेडियो, टीवी के पुर्जे, इन सभी चीजों के निपटान में बेहद सावधानी की जरूरत होती है किन्तु हम इसकी चिंता नहीं करते। और तो और विदेशों से इन वस्तुओं का कबाड़ खरीद कर लाते हैं ताकि उनसे रकम कमाई जा सके। रिसाइक्लिंग की जा सके। दिल्ली के मायापुरी में एक कबाड़ी रेडियोधर्मी कबाड़ ले आया। रेडियेशन के सम्पर्क में आने से लोग बीमार पड़ गए। इनमें मालिक खुद भी शामिल था। देश भर में हंगामा हो गया। वैसे यह कोई नई बात नहीं। हंगामा तो हम किसी भी बात पर कर सकते हैं, पर अपनी आदत नहीं सुधार सकते। हंगामा करने का एक अलग मजा है। इससे हम लाइम लाइट में आ जाते हैं। लोगों का ध्यान हमपर जाता है और हमारे अहम की तुष्टि होती है। जबकि आदत में सुधार कर हम केवल खुद को सुधार सकते हैं। अपने आसपास के माहौल को बेहतर बना सकते हैं, सुरक्षित बना सकते हैं। इसके लिए शाबासी देने का कोई पैमाना नहीं है। किसी ने देख लिया तो अच्छा कह दिया। बस इससे अधिक कुछ भी नहीं। जबकि ऊटपटांग हरकतों से हम सुर्खियों में आते हैं। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर छप सकते हैं, इलेक्ट्रानिक मीडिया पर छा सकते हैं। यदि ऊटपटांग हरकत निराली हुई तो लिमका या गिनीज बुक में भी दर्ज हो सकते हैं। इसलिए बेतरतीबी जिंदाबाद।

Wednesday, April 14, 2010

दंतेवाड़ा के खलनायक

दंतेवाड़ा की घटना के बाद पूरा देश मानो नींद से जागा है। सभी धड़ों ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी है। इस घटना में सबसे बड़े खलनायक की भूमिका में सामने आए नक्सलियों ने भी मानो जले पर नमक छिड़का है। उन्होंने घोषणा की है कि उन्हें भी जवानों की मौत का दुख है किन्तु यह उनकी मजबूरी थी। यह कार्रवाई उन्होंने खुद को बचाने के लिए की। केन्द्र और राज्य की सरकारों द्वारा शहीद जवानों के परिजनों को लाखों रुपए मुआवजा देने की घोषणा करने के बाद नक्सलियों ने भी ठीक यही किया। उन्होंने कहा कि वे शहीदों के परिजनों को मुआवजा देने को तैयार हैं। इस घोषणा के बाद प्याली में तूफान आ गया है। अखबारों के दफ्तर में बैठे कागज के शेर गुर्रा रहे हैं, दहाड़ना तो वे कब के भूल चुके। मुंह खोलते हैं तो मिमियाने की आवाज आती है इसलिये वे अब सिर्फ गुर्राते हैं। नक्सली तो बहुत बाद में आए हैं। इन कागज के शेरों से हम यह पूछना चाहेंगे कि देश में बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बनीं, हजारों लोग विस्थापित हुए। वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं, क्या किसी को खबर है। 1950 के दशक में बनी परियोजनाओं के विस्थापित आज तक भटक रहे हैं। दुनिया भर में पर्यावरण विनाश और ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा हो रही है। ऐसे देश जो यहां से केवल खनिज ले जाना पसंद करते थे और फिर उत्पादों को हमें वापस बेचते थे अब यहीं संयंत्र डालने की बात कर रहे हैं। क्या इसके पीछे का षडयंत्र किसी की समझ में आया है? अखबार वाले क्या घास खाने लगे हैं? सत्ता के पास ताकत होती है। ताकत का बर्बर इस्तेमाल किसी भी काल में, किसी भी देश में सफल नहीं रहा है फिर भी वे बार-बार एक ही बात की रट लगाए हुए हैं कि सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए। कैसी सख्ती किस तरह की सख्ती, इसकी विवेचना करने लायक बुद्धि भी क्या अब शेष नहीं रही। आज नक्सलियों को आप जंगलों में छिपा बता रहे हैं, तो जंगलों पर बमबारी करने की बातें कर रहे हैं। कल को उन्हें शहरों में छिपा बताएंगे तो क्या शहरों पर भी बमबारी करेंगे? यह तो माना कि नई पीढ़ी केवल आम खाने में विश्वास करती है, पेड़ लगाने में नहीं किन्तु उन्हें क्या पता कि पेड़ कहां लगा है। वे पढ़े लिखे हैं, उन्हें नौकरियां चाहिए फिर चाहे जंगलों का नामोनिशान ही क्यों न मिट जाए। पूरा देश खदानों और कारखानों से ही क्यों न पट जाए। चाहे आने वाली पीढ़ी के पैदा होने की संभावना ही क्यों न शून्य हो जाए। उन्हें क्या? क्या इस विभीषिका की तरफ ध्यान देने की फुर्सत अखबारों को है। आज कितने अखबार हैं जिन्होंने आदिवासी अंचलों या गांवों की वास्तविक स्थिति, वहां के लोगों की मानसिकता को समझने की कोशिश की है। उनकी इच्छाओं, आकांक्षाओं या महत्वाकांक्षाओं को जानना चाहा है। जंगलों में खड़े उनके भगवान सभ्य समाज के लिए सिर्फ वनसंपदा हैं। क्या समाचार पत्रों ने इस दिशा में कोई काम किया? हम कहीं से कहीं पहुंच गए और वनवासी बहुत पीछे छूट गए। इस विराट शून्यता को भरने की हमने कभी कोशिश नहीं की। आज भी नहीं कर रहे। अखबार भाट और चारणों की भूमिका अदा कर रहे हैं। राजा का यशगान कर चंद मोहरें जुटाने वालों को जमाने ने कभी कवि स्वीकार नहीं किया। थोथे यशगान से फूले राजाओं का भी हमेशा सर्वनाश ही हुआ है। वक्त रहते चेत जाएं वरना वह दिन दूर नहीं जब अखबार चेतना जगाना तो दूर स्वयं सामूहिक विनाश का कारण बनेंगे।

Tuesday, April 13, 2010

मरीज से छेड़छाड़

छेड़छाड़ भी बड़ा अजीब सा शब्द है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने कोई किस्सा छेड़ दिया हो और फिर बिखेर दिया हो। पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। कोई छेड़ता है तो कोई और उसे छुड़ाता है। वैसे कानून की भाषा में छेड़छाड़ का बड़ा व्यापक अर्थ है। कानून ने महिलाओं को घूरना भी छेड़खानी की परिभाषा में शामिल किया है। अब घूरना शब्द की तो कोई परिभाषा है नहीं। अब कोई किसी को निहार रहा है, आंखों ही आंखों में तारीफ कर रहा है यो बुरी नजर से देख रहा है, इसका फैसला या तो कानून को करना है या फिर उसको जिसको किसी से दुश्मनी निकालनी हो। जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र में हुई घटना भी कुछ ऐसी ही है। जिस चिकित्सक पर छेड़खानी का आरोप लगा है, उसके मित्र बताते हैं कि उसके पास अपनी बीवी को छेड़ने का भी वक्त नहीं। वह इतना बिजी डाक्टर है कि लोग फोन पर भी उससे खुजली और खाज की दवा पूछते हैं। वैसे वे हैं भी चर्मरोग विशेषज्ञ। लोग उनके पास खाज-खुजली का इलाज करवाने भी जाते हैं। अब किसे क्या तकलीफ है, यह कोई और कैसे बता सकता है। चिकित्सक और मरीज के बीच की बातें वैसे भी गोपनीय होती हैं। बहरहाल इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। यहां तो मरीज चिकित्सक तक पहुंची ही नहीं थी। उसे शिकायत तो इसी बात की थी कि एक बड़ी नेता को साथ लेकर जाने के बाद भी बीएसपी के एक डाक्टर ने उसे घास नहीं डाली थी। उसे लाइन से आने के लिए कहा था। यही इस अस्पताल का कायदा है। उसे यह पसंद नहीं था। उसने डाक्टर की खबर लेने की ठानी। लिहाजा हल्ला कर दिया। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशक ने तत्काल एक समिति का गठन कर दिया है। समिति मामले की जांच करेगी। समिति यह पता लगाएगी कि आइंदा ऐसे मरीजों को चिकित्सक देखें या पूछकर ही दवा दे दें। बातों पर भी छेड़खानी का आरोप लग सकता है, बल्कि लगता रहा है। लोग कथित आपत्तिजनक शब्दों के कारण जेल जाते रहे हैं। तो क्या अब डाक्टर मरीज को फीडबैक फार्म देकर उसे भरने के लिए कहेगा? कहना मुश्किल है। दुनिया तेजी से बदल रही है। कथित कम्प्यूटर फार्म का जमाना है जिसमें सवाल दिये होते हैं और उनके आगे खाने बने होते हैं। सवाल होंगे खुजली कब हुई। कितनी कितनी देर से हुई, खुजाने पर कैसा लगा, क्या खुजाने पर चमड़े का रंग बदल जाता है, क्या वहां से रस निकलने लगता है, आदि आदि। मरीज इस फार्मेट को भरकर दे देगा। डाक्टर आंकड़ों को कम्प्यूटर में डाल देगा और फिर जो भी दवा तजवीज की जाएगी उसे एक पर्ची पर लिखेगा, फिर उसकी इंट्री अपने रजिस्टर में करेगा और मरीज वाह! वाह! करता हुआ घर चला जाएगा। यही हाईटेक जमाने की डिमांड है, फिर चाहे इसका नतीजा कुछ भी क्यों न निकले...

डाक्टर रमन सिंह ने दिखाया दम

दंतेवाड़ा का ताड़मेटला गांव पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है। यहां नक्सलियों को ढूंढने निकली सीआरपीएफ की पार्टी पर जबरदस्त एम्बुश हुआ और 76 जवानों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। देश में नक्सलियों द्वारा किए गए इस सबसे बड़े एम्बुश के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक हिल गए थे। लोगों में ऐसी दहशत व्याप गई थी कि जवानों के प्रशिक्षण से लेकर इस अभियान के औचित्य तक पर उंगलियां उठने लगी थीं। पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व आईपीएस-आईएएस अधिकारियों तथा मानवाधिकार वादियों ने दिल्ली में जमकर हंगामा काटा। लोगों को लगा कि सरकार डिफेंसिव हो जाएगी। किन्तु ठाकुर ऐसा नहीं करते। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री इतने कमजोर नहीं हैं। जितने दमखम के साथ वे मीडिया का सामना करते हैं, उतने ही साहस के साथ वे आसन्न मौत का भी सामना कर सकते हैं। जब मामला जवानों का हौसला बढ़ाने का हो तो वे एयरकंडीशंड आफिस में बैठकर भाषण नहीं देते बल्कि सीधे दुश्मन के घर तक पहुंचकर अपनी आवाज बुलंद करते हैं। ग्राम सुराज के इस चरण का आगाज धुर नक्सल क्षेत्र में कर मुख्यमंत्री ने यह साबित कर दिया है कि उनका साहस दिखावटी नहीं है। वे न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामरिक चुनौतियों का सामना भी मैदान में उतर कर करने को तैयार हैं। इसमें रंचमात्र की भी अतिशयोक्ति नहीं है कि उनके इस कदम से न केवल उन गांव वालों का हौसला बढ़ा है जो ताड़Þमेटला और उसके आसपास के गांवों से पलायन करने लगे थे बल्कि दूर-दराज से यहां भेजे गए सीआरपीएफ के जवानों का उत्साह भी दोबाला हो गया है। कहते हैं कि युद्धभूमि में सेनापति की दृढ़ता और दक्षता दोनों का बराबर महत्व होता है। इसका सैनिकों के मनोबल पर जबरदस्त असर होता है। उनके भीतर यह विश्वास पैदा हो जाता है कि जब तक सेनापति उनके साथ है उन्हें कोई हरा नहीं सकता, पराजित नहीं कर सकता। ऐसे सेनापतियों के नाम इतिहास में स्वर्णिण अक्षरों में दर्ज हैं। नक्सली चुनौती एक लंबे समय तक चलने वाली समस्या है, यह सभी जानते हैं। यह विवादास्पद ही सही पर एक विचारधारा है जिसका पूरी तरह सफाया कभी नहीं किया जा सकता। किन्तु इसी को सत्य मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे भी नहीं रहा जा सकता। किसी को तो पहल करनी थी। वह पहल छत्तीसगढ़ के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने की है। इसके लिए वे बड़ी कीमत चुका चुके हैं, चुका रहे हैं और आगे भी ऐसे बहुत मौके आएंगे जब उनके आंसू बहेंगे किन्तु एक कर्त्तव्य निष्ठ दृढ़ सिपहसालार की तरह वे इन झंझावातों का मुकाबला करते रहेंगे। यही ठाकुर की आन, यही उसकी शान और यही उसकी पहचान है। एक कोमल हृदय चिकित्सक जब किसी बीमारी के पीछे पड़ता है तो औषधि, पथ्य, शल्यक्रिया किसी भी विधा से परहेज नहीं करता। डॉ. रमन सिंह तो आयुर्वेद के चिकित्सक हैं। वे किसी भी रोग को जड़मूल से उखाड़ कर फेंकने में यकीन करते हैं और वे यही कर रहे हैं। ईश्वर उन्हें कामयाबी दे।

Sunday, April 11, 2010

12 रुपए पीस प्याज

जब सरकार कहती है कि लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठ रहा है, तब भले ही लोग हंसते हों किन्तु यह हकीकत है कि कुछ लोगों का जीवन स्तर वाकई बहुत ऊपर उठ गया है। यह अलग बात है कि आज भी वह सब्जी वाले से पाव के रेट को लेकर बहस करता है किन्तु यह भी सही है कि वह एक पीस प्याज के 12 रुपए भी हंसते हंसते अदा करता है। जी हां! भले ही आज भी देश के 70 फीसदी लोग छोटे-छोटे होटलों में प्याज के टुकड़े मांग कर खाने में यकीन रखते हों किन्तु ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है जो बाहर खाने को ‘ट्रीट’ की श्रेणी में रखते हैं। अब गया जमाना सूखे फूलों को डायरी में दबाए रखने का। अब तो प्यार का मतलब उसका प्रदर्शन करना होता है। रोज-रोज न सही हफ्ते में एक बार महंगी आईसक्रीम, पिज्जा, बर्गर, चाईनीज या बाहर का खाना खिलाना पड़ता है। जाहिर है गर्लफ्रेंड या बीवी को लेकर कोई सड़क छाप भोजनालय में तो जाएगा नहीं जहां दरवाजे पर किचन आपका स्वागत करता है। वह तो पेट भरने वालों की जगह है। वहां प्याज-ककड़ी-नींबू का टुकड़ा मांगने से मिल जाता है। भले ही वहां ताजा खाने की गारंटी हो किन्तु वहां न तो प्राइवेसी होती है और न क्लास। एकांत का साफ सुथरा टेबल, टेबल क्लाथ। टिशू पेपर का ‘गुलदस्ता’। कहीं कहीं कटलरी (छुरी-कांटा) भी। चीनी मिट्टी के बरतन। रंगीन छपाई वाला मीनू कार्ड। वर्दीधारी वेटर। ऐसे होटलों में कोई छोटू-टिल्लू या काका खाना सर्व नहीं करता। ऐसे होटलों में प्याज को चक्कों में काटा जाता है। स्टेनलेस स्टील की छोटी प्लेट में नहीं बल्कि चीनी मिट्टी के बड़े से प्लेट पर सजा कर परोसा जाता है। यहां पानी की बोतल वैसे ही लाकर नहीं रख दी जाती बल्कि उसे नैपकिन में लपेट कर शैम्पेन की तरह पेश किया जाता है। लिहाजा रेट भी अजब लगता है। एक प्याज का 12 रुपए, एक बोतल पानी का 30 से 70 रुपए। दो चम्मच चावल 40 रुपए का। चपाती तो ऐसी जगहों पर मिलती ही नहीं। 10-20 रुपए की तंदूरी रोटी और इसी अनुपात में कुलचा-नान। यहां आने वाले लोग खाते कम, चुभलाते ज्यादा हैं। एक दूजे की आंखों में झांकते दो चम्मच चावल भी पूरा खाया नहीं जाता। लोग जूठन छोड़कर उठ जाते हैं। क्या फिर भी आप कहोगे कि गरीबी बढ़ रही है, जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ रहा?

कौमार्य की नीलामी

हांगकांग की एक किशोरी ने अपना कौमार्य इंटरनेट पर नीलाम किया। उसे साढ़े तीन लाख रुपये से कुछ अधिक की उच्चतम बोली मिली। उच्च शिक्षा के लिए उसे रकम की जरूरत थी। उससे पहले नताली डेलन ने भी मास्टर्स डिग्री का खर्च निकालने के लिए ऐसा ही किया था। कुछ लोगों को लगता है कि अपनी जरूरतों के लिए शरीर का सौदा करना ठीक नहीं है। हालांकि वे इसका कोई विकल्प भी नहीं सुझा पाते। दूसरे धड़े का मानना है कि जमीर और ईमान बेचने के बजाय कुछ मिनटों का सौदा कर यदि कई बड़ी मुसीबतों से निजात पाई जा सकती हो, तो इसमें बुराई भी कुछ नहीं है। वैसे भी हकीकत यही है कि नताली और नताली जैसी हजारों लड़कियां हैं जिन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए समझौते करने पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 1960 में शिक्षा को अधिकार बनाने की घोषणा की थी। इसके 50 साल बाद भारत ने शिक्षा को अधिकार बनाने का कानून बनाया। भारत ऐसा करने वाला 135वां देश बन गया। वैसे दुनिया भर में शिक्षा पूरी तरह से केवल 19 देशों में ही अधिकार बन पायी है। लिहाजा आज भी अधिकांश देशों में शिक्षा के लिए कोई पेट काट रहा है, कोई पीठ छिलवा रहा है और कोई जिस्म बेच रहा है। सरकार शिक्षा को अधिकार बताती है किन्तु पर्याप्त मात्रा में पुस्तकों तक की आपूर्ति नहीं कर पाती। एनसीईआरटी से लेकर राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगम तक कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता। बाजार में मांग के अनुपात में केवल 15 फीसदी पुस्तकों की ही आपूर्ति हो पाती है। लिहाजा निजी प्रकाशक कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। बेहतर कागज, बेहतर छपाई के नाम पर वे पालकों का गला काट रहे हैं। जो पुस्तक पाठ्य पुस्तक निगम 30 रुपये में उपलब्ध कराता है उसे निजी प्रकाशक 100 रुपये में बेचता है। एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे पड़ोसी सीनियर्स की पुरानी पुस्तकों से काम चला लिया करते थे। पुस्तकें और नोट्स विरासत और अमानत की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जाती थी। सेकण्ड हैण्ड पुस्तकों का एक बड़ा बाजार हुआ करता था। अब प्रतिवर्ष पुस्तकें बदल रही हैं या यूं कहें अध्याय आगे पीछे कर पुस्तकों को नवीन रूप दिया जा रहा है। स्कूलों की जिद नई पुस्तक खरीदने की होती है। दरअसल यह एक पूरा रैकेट है जिसे केवल पैसे कमाने के लिए खड़ा किया गया है। यह सेक्स रैकेट से भी गंदा काम है जिसमें सीधे तौर पर तो किसी को जिस्म के बाजार में नहीं धकेला जाता अलबत्ता उसे प्रेरित अवश्य किया जाता है। पास कराने के नाम पर शिक्षक से लेकर प्राचार्य तक छात्राओं का शोषण करते हैं। नौकरी पेशा युवतियों की हालत भी जुदा नहीं है। फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में इसका बड़ा खूबसूरत चित्रण किया गया है कि टीम में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए किस तरह एक खिलाड़ी कोच कबीर खान के सामने खुद को पेश करती है। यह साफ-साफ इशारा है उस सेटअप की ओर, जिसमें कुछ पाने के लिए कुछ खोने की संस्कृति पनप रही है। और जब बात खोने की ही हो तो क्यों न उसकी पूरी कीमत वसूल कर ली जाए? इस सेटअप को स्वीकार करने वालों के मुंह से नतालियों को प्रवचन, शोभा नहीं देता।----

आज से मैं भी हूँ