photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, April 30, 2010
कामचोरों की जमात
बैलट प्रूफ सरकार
Wednesday, April 28, 2010
शादी और नौकरी
छठी इंद्रीय फेल
Monday, April 26, 2010
पंचायतों का न्याय
Sunday, April 25, 2010
पालीथीन में पर्यावरण
सादगी, खादी और शाकाहार
Friday, April 23, 2010
गायत्री परिवार के पाखण्डी
जिन्दगी का खौफ
लेडीज टायलेट में स्पाईकैम
Thursday, April 22, 2010
मुफ्त के बाराती
कालिख से लिखा नाम
Wednesday, April 21, 2010
पाकेटमार की पिटाई
अब लगा महंगाई का नम्बर
Tuesday, April 20, 2010
महंगी पड़ी होशियारी
एमआरपी और इज्जतदार
Sunday, April 18, 2010
स्पोकन इंग्लिश
Saturday, April 17, 2010
विनाशकाले विपरीत बुद्धि
Friday, April 16, 2010
ताड़मेटला के साइड इफेक्ट्स
वैकेशन होमवर्क
कचरे का निपटान
Wednesday, April 14, 2010
दंतेवाड़ा के खलनायक
Tuesday, April 13, 2010
मरीज से छेड़छाड़
छेड़छाड़ भी बड़ा अजीब सा शब्द है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने कोई किस्सा छेड़ दिया हो और फिर बिखेर दिया हो। पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। कोई छेड़ता है तो कोई और उसे छुड़ाता है। वैसे कानून की भाषा में छेड़छाड़ का बड़ा व्यापक अर्थ है। कानून ने महिलाओं को घूरना भी छेड़खानी की परिभाषा में शामिल किया है। अब घूरना शब्द की तो कोई परिभाषा है नहीं। अब कोई किसी को निहार रहा है, आंखों ही आंखों में तारीफ कर रहा है यो बुरी नजर से देख रहा है, इसका फैसला या तो कानून को करना है या फिर उसको जिसको किसी से दुश्मनी निकालनी हो। जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र में हुई घटना भी कुछ ऐसी ही है। जिस चिकित्सक पर छेड़खानी का आरोप लगा है, उसके मित्र बताते हैं कि उसके पास अपनी बीवी को छेड़ने का भी वक्त नहीं। वह इतना बिजी डाक्टर है कि लोग फोन पर भी उससे खुजली और खाज की दवा पूछते हैं। वैसे वे हैं भी चर्मरोग विशेषज्ञ। लोग उनके पास खाज-खुजली का इलाज करवाने भी जाते हैं। अब किसे क्या तकलीफ है, यह कोई और कैसे बता सकता है। चिकित्सक और मरीज के बीच की बातें वैसे भी गोपनीय होती हैं। बहरहाल इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। यहां तो मरीज चिकित्सक तक पहुंची ही नहीं थी। उसे शिकायत तो इसी बात की थी कि एक बड़ी नेता को साथ लेकर जाने के बाद भी बीएसपी के एक डाक्टर ने उसे घास नहीं डाली थी। उसे लाइन से आने के लिए कहा था। यही इस अस्पताल का कायदा है। उसे यह पसंद नहीं था। उसने डाक्टर की खबर लेने की ठानी। लिहाजा हल्ला कर दिया। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशक ने तत्काल एक समिति का गठन कर दिया है। समिति मामले की जांच करेगी। समिति यह पता लगाएगी कि आइंदा ऐसे मरीजों को चिकित्सक देखें या पूछकर ही दवा दे दें। बातों पर भी छेड़खानी का आरोप लग सकता है, बल्कि लगता रहा है। लोग कथित आपत्तिजनक शब्दों के कारण जेल जाते रहे हैं। तो क्या अब डाक्टर मरीज को फीडबैक फार्म देकर उसे भरने के लिए कहेगा? कहना मुश्किल है। दुनिया तेजी से बदल रही है। कथित कम्प्यूटर फार्म का जमाना है जिसमें सवाल दिये होते हैं और उनके आगे खाने बने होते हैं। सवाल होंगे खुजली कब हुई। कितनी कितनी देर से हुई, खुजाने पर कैसा लगा, क्या खुजाने पर चमड़े का रंग बदल जाता है, क्या वहां से रस निकलने लगता है, आदि आदि। मरीज इस फार्मेट को भरकर दे देगा। डाक्टर आंकड़ों को कम्प्यूटर में डाल देगा और फिर जो भी दवा तजवीज की जाएगी उसे एक पर्ची पर लिखेगा, फिर उसकी इंट्री अपने रजिस्टर में करेगा और मरीज वाह! वाह! करता हुआ घर चला जाएगा। यही हाईटेक जमाने की डिमांड है, फिर चाहे इसका नतीजा कुछ भी क्यों न निकले...
डाक्टर रमन सिंह ने दिखाया दम
Sunday, April 11, 2010
12 रुपए पीस प्याज
जब सरकार कहती है कि लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठ रहा है, तब भले ही लोग हंसते हों किन्तु यह हकीकत है कि कुछ लोगों का जीवन स्तर वाकई बहुत ऊपर उठ गया है। यह अलग बात है कि आज भी वह सब्जी वाले से पाव के रेट को लेकर बहस करता है किन्तु यह भी सही है कि वह एक पीस प्याज के 12 रुपए भी हंसते हंसते अदा करता है। जी हां! भले ही आज भी देश के 70 फीसदी लोग छोटे-छोटे होटलों में प्याज के टुकड़े मांग कर खाने में यकीन रखते हों किन्तु ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है जो बाहर खाने को ‘ट्रीट’ की श्रेणी में रखते हैं। अब गया जमाना सूखे फूलों को डायरी में दबाए रखने का। अब तो प्यार का मतलब उसका प्रदर्शन करना होता है। रोज-रोज न सही हफ्ते में एक बार महंगी आईसक्रीम, पिज्जा, बर्गर, चाईनीज या बाहर का खाना खिलाना पड़ता है। जाहिर है गर्लफ्रेंड या बीवी को लेकर कोई सड़क छाप भोजनालय में तो जाएगा नहीं जहां दरवाजे पर किचन आपका स्वागत करता है। वह तो पेट भरने वालों की जगह है। वहां प्याज-ककड़ी-नींबू का टुकड़ा मांगने से मिल जाता है। भले ही वहां ताजा खाने की गारंटी हो किन्तु वहां न तो प्राइवेसी होती है और न क्लास। एकांत का साफ सुथरा टेबल, टेबल क्लाथ। टिशू पेपर का ‘गुलदस्ता’। कहीं कहीं कटलरी (छुरी-कांटा) भी। चीनी मिट्टी के बरतन। रंगीन छपाई वाला मीनू कार्ड। वर्दीधारी वेटर। ऐसे होटलों में कोई छोटू-टिल्लू या काका खाना सर्व नहीं करता। ऐसे होटलों में प्याज को चक्कों में काटा जाता है। स्टेनलेस स्टील की छोटी प्लेट में नहीं बल्कि चीनी मिट्टी के बड़े से प्लेट पर सजा कर परोसा जाता है। यहां पानी की बोतल वैसे ही लाकर नहीं रख दी जाती बल्कि उसे नैपकिन में लपेट कर शैम्पेन की तरह पेश किया जाता है। लिहाजा रेट भी अजब लगता है। एक प्याज का 12 रुपए, एक बोतल पानी का 30 से 70 रुपए। दो चम्मच चावल 40 रुपए का। चपाती तो ऐसी जगहों पर मिलती ही नहीं। 10-20 रुपए की तंदूरी रोटी और इसी अनुपात में कुलचा-नान। यहां आने वाले लोग खाते कम, चुभलाते ज्यादा हैं। एक दूजे की आंखों में झांकते दो चम्मच चावल भी पूरा खाया नहीं जाता। लोग जूठन छोड़कर उठ जाते हैं। क्या फिर भी आप कहोगे कि गरीबी बढ़ रही है, जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ रहा?
कौमार्य की नीलामी
हांगकांग की एक किशोरी ने अपना कौमार्य इंटरनेट पर नीलाम किया। उसे साढ़े तीन लाख रुपये से कुछ अधिक की उच्चतम बोली मिली। उच्च शिक्षा के लिए उसे रकम की जरूरत थी। उससे पहले नताली डेलन ने भी मास्टर्स डिग्री का खर्च निकालने के लिए ऐसा ही किया था। कुछ लोगों को लगता है कि अपनी जरूरतों के लिए शरीर का सौदा करना ठीक नहीं है। हालांकि वे इसका कोई विकल्प भी नहीं सुझा पाते। दूसरे धड़े का मानना है कि जमीर और ईमान बेचने के बजाय कुछ मिनटों का सौदा कर यदि कई बड़ी मुसीबतों से निजात पाई जा सकती हो, तो इसमें बुराई भी कुछ नहीं है। वैसे भी हकीकत यही है कि नताली और नताली जैसी हजारों लड़कियां हैं जिन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए समझौते करने पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 1960 में शिक्षा को अधिकार बनाने की घोषणा की थी। इसके 50 साल बाद भारत ने शिक्षा को अधिकार बनाने का कानून बनाया। भारत ऐसा करने वाला 135वां देश बन गया। वैसे दुनिया भर में शिक्षा पूरी तरह से केवल 19 देशों में ही अधिकार बन पायी है। लिहाजा आज भी अधिकांश देशों में शिक्षा के लिए कोई पेट काट रहा है, कोई पीठ छिलवा रहा है और कोई जिस्म बेच रहा है। सरकार शिक्षा को अधिकार बताती है किन्तु पर्याप्त मात्रा में पुस्तकों तक की आपूर्ति नहीं कर पाती। एनसीईआरटी से लेकर राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगम तक कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता। बाजार में मांग के अनुपात में केवल 15 फीसदी पुस्तकों की ही आपूर्ति हो पाती है। लिहाजा निजी प्रकाशक कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। बेहतर कागज, बेहतर छपाई के नाम पर वे पालकों का गला काट रहे हैं। जो पुस्तक पाठ्य पुस्तक निगम 30 रुपये में उपलब्ध कराता है उसे निजी प्रकाशक 100 रुपये में बेचता है। एक जमाना था जब मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे पड़ोसी सीनियर्स की पुरानी पुस्तकों से काम चला लिया करते थे। पुस्तकें और नोट्स विरासत और अमानत की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जाती थी। सेकण्ड हैण्ड पुस्तकों का एक बड़ा बाजार हुआ करता था। अब प्रतिवर्ष पुस्तकें बदल रही हैं या यूं कहें अध्याय आगे पीछे कर पुस्तकों को नवीन रूप दिया जा रहा है। स्कूलों की जिद नई पुस्तक खरीदने की होती है। दरअसल यह एक पूरा रैकेट है जिसे केवल पैसे कमाने के लिए खड़ा किया गया है। यह सेक्स रैकेट से भी गंदा काम है जिसमें सीधे तौर पर तो किसी को जिस्म के बाजार में नहीं धकेला जाता अलबत्ता उसे प्रेरित अवश्य किया जाता है। पास कराने के नाम पर शिक्षक से लेकर प्राचार्य तक छात्राओं का शोषण करते हैं। नौकरी पेशा युवतियों की हालत भी जुदा नहीं है। फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में इसका बड़ा खूबसूरत चित्रण किया गया है कि टीम में अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए किस तरह एक खिलाड़ी कोच कबीर खान के सामने खुद को पेश करती है। यह साफ-साफ इशारा है उस सेटअप की ओर, जिसमें कुछ पाने के लिए कुछ खोने की संस्कृति पनप रही है। और जब बात खोने की ही हो तो क्यों न उसकी पूरी कीमत वसूल कर ली जाए? इस सेटअप को स्वीकार करने वालों के मुंह से नतालियों को प्रवचन, शोभा नहीं देता।----