photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, April 23, 2010
जिन्दगी का खौफ
किसी जमाने में इंसान के जीवन में सबसे बड़ा डर मौत का था। आश्चर्यजनक रूप से आधुनिकता की चोटी पर खड़े मानव का मृत्यु का खौफ जाता रहा है। अब उसे जीने से डर लगने लगा है। भविष्य की अशक्त/अपंग जिन्दगी उसे बेहद डराती है। शहरियों में बुढ़ापे का अकेलापन एक ऐसी खौफनाक कल्पना है जिसे सोच-सोच कर लोगों की जवानी खराब हो रही है। पहले जहां इसकी चर्चा केवल मार्निंग वाक के दौरान बुजुर्ग पार्कों में बेंच पर बैठकर हम उम्र लोगों के बीच किया करते थे वहीं अब यह बैंकों, बीमा कंपनियों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए एक बड़ा विषय बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े शिकार हैं वे नौकरीपेशा लोग जो अमूमन आठ घंटे की नौकरी के बाद फुर्सत में होते हैं। जिनके सामने रिटायरमेन्ट की एक तारीख निश्चित होती है। जिनपर नौकरी में रहते हुए किसी तरह बच्चों का भविष्य तय करने तथा बुढ़ापे में सिर छिपाने की जगह जुटा लेने का दबाव होता है। चिंता का विषय यह है कि जीवन का यह डर युवाओं को तो अपनी गिरफ्त में ले ही चुका है और अब दबे पांव किशोरों और बालकों के जीवन में दाखिल होने लगा है। सुबह शाम घर में, पास पड़ौस में और टीवी के विज्ञापनों में सुरक्षित बुढ़ापे के विज्ञापन उसके कोमल बालमन में यह सवाल उत्पन्न कर रहा है कि यदि पापा किसी दुर्घटना का शिकार होकर चल बसे तो क्या उसके बाद भी जीवन वैसा ही रहेगा? विज्ञापन की दुनिया की यह कैसी क्रिएटिविटी है कि बच्चा अपने आप को साबित करने के लिए तनाव के दौर से गुजर रहा है। दिन में कई-कई बार उस खर्च के ताने सुन रहा है जो उसपर उसकी मर्जी पूछे बिना खर्च किये जा रहे हैं। इसी दबाव और तनाव में वह किशोरावस्था से सीधे बुढ़ापे में कदम रख रहा है। वह फटाफट सब कुछ पा लेना चाहता है। इसके लिए वह सामाजिक बंधनों को तोड़ रहा है। हर तरफ से उसपर केवल अपेक्षाओं का बोझ लादा जा रहा है। वह नितांत अकेला हो गया है। एक विधवा या विधुर से कहीं ज्यादा अकेला, जिसके पास अपना कहने को कोई नहीं। शायद यही वजह है कि दौड़ते-दौड़ते जहां उसके पांव थकते हैं, सुस्ताने के बजाय वह सीधे आत्मघाती कदम उठा लेता है। नौकरी छोड़ने की नौबत आने पर, चुकारे में असमर्थ होने पर, परीक्षा में फेल होने पर, प्यार में मुश्किलें बढ़ने पर वह सीधे पलायन का मार्ग अपना रहा है। क्या इसके बाद भी हमें गर्व होना चाहिए कि हम सामाजिक प्राणी हैं?
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Sir aapka ye post bhi bahut accha laga. Lagta hai aapne is saal se hi blogging suru ki hai isliye post bahut kam hai.. Phir bhi Aaap likhte rahiye.
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