Thursday, December 2, 2010

छिछोरेपन की मिसाल

पच्चीस हजारी सूट आपको वीआईपी की लाइन में तो खड़ा कर सकता है किन्तु आपकी इज्जत तभी तक बनी रहती है जब तक कि आप अपना मुंह नहीं खोलते। मुंह खोलते ही आपकी औकात पता लग जाती है। इसी तरह येन केन प्रकारेण पैसे कमा लेने मात्र से कोई आभिजात्य नहीं हो जाता। करोड़ों का बंगला, लाखों की गाड़ियां, फैंसी खादी आपका गेटअप तो सुधार सकती है, माइंडसेट नहीं बदल सकती। हाल ही में शहर के एक नामचीन स्कूल के बच्चे चंपारण राजिम ले जाए गए। स्कूल बस में ठूंस-ठूंस कर ले जाए गए बच्चों से दो-दो सौ रुपए वसूले गए। मांगा जाता तो पेरेन्ट्स तीन सौ रुपए भी दे देते। इतनी दलिद्दरी की जरूरत नहीं थी। बच्चों को सुबह के नाश्ते में 3-3 रुपए का ठंडा पोहा दिया गया। दोपहर को पूड़ी और बरबट्टी बैंगन की बेमेल सब्जी। एजुकेशन टूर के नाम पर किये गए इस आयोजन में किसी बच्चे को यह तक नहीं बताया गया कि वे क्या देख रहे हैं। जो देख रहे हैं उसका ऐतिहासिक या धार्मिक महत्व क्या है। अधिकांश बच्चों को यह तक नहीं पता चला कि राजिम में नदियों का संगम होता है। यहां कुंभ का मेला भरता है। दरअसल इसकी उम्मीद उनसे की जा सकती थी जो केवल स्कूल चलाते हैं। जिनका पूरा ध्यान बच्चों की शिक्षा पर रहता है। वे एजुकेशन टूर पर बच्चों को उस स्थल विशेष की जानकारी देते हैं, उसका महत्व बताते हैं। किन्तु यहां तो बात ही और है। यह पैसे कमाने के लिए एकत्र हुए लोगों का एक जमावड़ा मात्र है। एजुकेशनल टूर भी यहां उगाही का एक माध्यम मात्र है। शिक्षाविद कहलाने वाले ये लोग दरअसल पुराने जिन्सों के कबाड़ी, भवन निर्माण के ठेकेदार, होस्टल चलाने वाले मकान मालिक, मेस चलाने वाला हलवाई, गाय-भैंस पालने वाले डेयरी संचालक और बसों की फ्लीट खड़ी करने वाले ट्रांसपोर्टर हैं। ये कपड़ा भी बेचते हैं और किताबें भी। स्टेशनरी की तो पूरी दुकान ही खोले बैठे हैं।  इस तरह के स्कूलों में अपने बच्चों को लोग शिक्षा के लिए नहीं, स्टेटस के लिए भेजते हैं। वे स्कूल की बिल्डिंग देखकर थर्रा जाते हैं। वे यह सोचकर खुद को तसल्ली देते हैं कि इतने सारे लोग यहां अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं, सबके सब मूर्ख तो नहीं हैं। यह एक अजब फिलासफी है। जिसे अधिक लोग कर रहे हैं वही सही है। जो ढंग का स्कूल बिल्डिंग तक नहीं बनवा पाया वह क्या प्रेरणा देगा भला। जो खुद पैसे नहीं कमा सका, वह पैसे कमाना क्या सिखाएगा? डैशिंग पर्सनालिटी तो वह होती है जो कार से ड्यूटी जाए तो सवारी बैठाकर पेट्रोल के भी पैसे वसूल ले। इसे अंग्रेजी में कहें तो ‘गेटिंग द मोस्ट आउट आफ इट।’

दीक्षित का इलाज

बहुत खराब लगता है जब किसी के गुजरने के बाद कोई टिप्पणी करनी पड़ती हो। खास कर तब जब वह अपनी, अपनी सोच की रक्षा करने के लिए उपलब्ध न हो। किन्तु यह तब जरूरी हो जाता है जब मामला औरों के लिए निदर्शन बन जाए। भारत स्वाभिमान का नारा देने और स्वदेशी पर गर्व करने वाले राजीव दीक्षित के साथ भिलाई और भिलाई के दो अस्पताल भी हमेशा के लिए दर्ज हो गए। इन दोनों अस्पतालों ने अपनी अपनी पूरी क्षमता झोंक दी थी किन्तु यहां वह भी हुआ जिसे आमतौर पर चिकित्सा के क्षेत्र में बर्दाश्त नहीं किया जाता। अंतत: वही झोला छाप वाली उक्ति चरितार्थ हुई कि जिसकी आई होती है उसे कोई टाल नहीं सकता। संयंत्र के मुख्य चिकित्सालय में भले ही कैथ लैब न हो किन्तु इस अस्पताल को साधन विहीन नहीं मान लेना चाहिए। इस अस्पताल ने ऐसी मिसालें भी पेश की हैं जिसपर विश्वस्तरीय किसी भी अस्पताल को गर्व हो सकता है। बस इसकी मार्केटिंग सही ढंग से नहीं की गई वरना दूर-दूर से लोग यहां इलाज के लिए आ रहे होते। आज भी अंचल के अधिकांश निजी प्रैक्शिनर अपने विजिटिंग कार्ड पर एक्स भिलाई स्टील प्लांट मेन हास्पीटल गर्व के साथ लिखवाते हैं। इसके अक्षर उनकी डिग्रियों से भी बड़े होते हैं। वह तो दीक्षित वीआईपी थे। मामले में योगगुरु बाबा रामदेव और एमडी का हस्तक्षेप था। आधी रात को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के बड़े डाक्टर और मरीज के पारिवारिक मित्र का सुझाव आया। वरना कोई यहां डाक्टर तो दूर नर्स को सुझाव देकर देखे। तत्काल जवाब मिलेगा, ‘डाक्टर आप हैं या हम? अपनी मर्जी चलानी हो तो मरीज को ले जाएं।’ वस्तुत: हुआ भी यही। इतने तल्ख शब्दों में भले ही न कहा गया हो किन्तु खामोश रहकर भी नाराजगी जाहिर की जा सकती है। शाम घिरते ही भिलाई इस्पात संयंत्र ने छह-आठ लाइन में राजीव दीक्षित के मामले के काम्पीलेक्शंस का प्रेस नोट भेज दिया ताकि लोगों का विश्वास इस अजीमोशान अस्पताल से न उठ जाए। लोग कहीं यह न मान बैठें कि अपोलो बीएसआर यहां का बड़ा अस्पताल हो गया है। यहां कुछ बातें गौर करने की हैं। दीक्षित को मासिव हार्ट अटैक शाम पौने पांच बजे के करीब आया था। वे पहले ही अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। हो सकता है उन्हें रास्ते में ही माइल्ड अटैक आए हों। उन्हें पांच बजे के बाद मेन हास्पीटल लाया गया जहां चिकित्सकों ने उनकी इमरजेंसी मैनेजमेन्ट की और रात 11:30 बजे उन्हें उन्हीं के चिकित्सक की राय पर अपोलो बीएसआर शिफ्ट करने की इजाजत दे दी। चलो बला टली। अब आते हैं योगाचार्य पर। दीक्षित डायबिटीज के पेशेंट थे। उन्हें दिल का मर्ज था। दोनों ही मामलों को नियंत्रण में रखने के दर्जनों तरीके योगा करने वाले जुबानी सुझा देते हैं। इन तरीकों की दर्जनों किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। पर जब काल आता है तो यह सब गौण हो जाता है। केवल बहाने रह जाते हैं, क्या झोला छाप और क्या अटैची वाले।

कबाड़ जैसी किताबें

पहले दंतेवाड़ा और अब दुर्ग। सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत पहली से आठवीं तक के बच्चों को नि:शुल्क दी जाने वाली लाखों की किताबें कबाड़ी के यहां मिलीं। इसको लेकर खूब हंगामा हो रहा है। वैसे हंगामा करना हमारी आदत में शुमार है। हम किसी भी बात पर हंगामा खड़ा कर सकते हैं। उत्सव प्रेमियों का देश जो ठहरा। यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन ही उत्सव है। भई जो किताबें कबाड़ हैं, वह कबाड़ी के पास ही तो जाएंगी। नहीं जाएंगी तो सरकारी गोदामों में सड़ेंगी। दरअसल यह भीति (भय) से उपजी संस्कृति है। हम हमेशा इस बात का खौफ खाए रहते हैं कि कम न पड़े। घर में भोजन थोड़ा अधिक ही बनता है ताकि कम न पड़े। क्या पता किसी के साथ कोई आ ही जाए। अकसर कोई नहीं आता। तब यह अतिरिक्त भोजन हम खुद कर लेते हैं कि अनाज का अपमान नहीं होना चाहिए। कोई आश्चर्य नहीं कि देश में भूख से कभी कभार ही कोई मरता है किन्तु ज्यादा खाकर मरने वालों की संख्या प्रतिदिन हजारों में है। यही भय हमें शादी ब्याह में अतिरिक्त इंतजाम करने के लिए प्रेरित करता है। यदि कैटरर रखे गए हैं तो आटा, तेल, घी, चावल, सब्जियां सभी बच जाती हैं। यदि खुद खाना बनवाया है तो एकाध मन भोजन कुत्तों को डाल दिया जाता है या भिखारी ढूंढे जाते हैं। सर्वशिक्षा अभियान के साथ भी ऐसा ही है। पुस्तकों का आर्डर चूंकि सत्रारंभ से काफी पहले हो जाता है इसलिए वह प्रवेश की अनुमानित संख्या पर आधारित होता है और कुछ अधिक ही होता है। प्रवेश कम हुआ तो पुस्तकें बच जाती हैं। पर किसी भी हालत में पुस्तकें कम नहीं पड़नी चाहिए। भय जनित संस्कृति हमें ज्यादा भेजने के लिए उकसाती है। वनग्रामों में शाला पंजी में दर्ज बच्चों में से आधे ही स्कूल आते हैं। इसलिए यदि सही संख्या में भी पुस्तकें भेजी जाएं तो बचत होती है। हर स्कूल के लिए थोड़ी-थोड़ी पुरौनी डालते डालते पुरौनी सैकड़ों किलो हो जाती है। जब जिलों से ये पुस्तकें गांव-देहात की शालाओं के लिए चलती हैं तो दर्ज संख्या के आधार पर रजिस्टर में इंट्री के साथ पुस्तकें इश्यू की जाती हैं। इसलिए बड़ी मात्रा में पुस्तकें बच जाती हैं। एक-दो साल में इन अतिशेष पुस्तकों के भंडारण की समस्या सिर उठाने लगती है। बीच का रास्ता निकालने वाले साहसी अफसर इन्हें कबाड़ी के हाथों बेच देते हैं। पुस्तकों पर सील होती है जिससे उन शालाओं की पहचान हो सकती है जहां के लिए उन्हें मंगवाया गया था। लिहाजा पुस्तकों को बिक्री के लिए चोरी छिपे दूसरे जिलों में भेजना पड़ता है। साहसी कबाड़ी यह दुस्साहस करते हैं और किताबों को ट्रकों में भरकर ले जाते हैं। वहां कोई बड़ा सा गोदाम किराए पर लेकर पुस्तकों से कवर को अलग किया जाता है और फिर कबाड़ बिक जाता है। वैसे भी कागज की रिसाइक्लिंग पर्यावरण की रक्षा करती है।

Tuesday, November 30, 2010

कीमती चेहरा

  कीमती चेहरा
वर्षों पहले आम आदमी की बारात पैदल भी जाती थी। दुल्हन को लेकर लौटते समय नए जूतों को दूल्हा कांख में दबा लेता था और पुराने जूतों को पहनकर ही घर तक का सफर तय करता था। 40 साल पहले मिडिल क्लास पैदा हुआ। घर में बैठक के लिए जगह निकाली जाने लगी। डिजाइनदार सोफे बैठक की शोभा बढ़ाने लगे। इसके साथ ही आया सेन्टर टेबल। सेन्टर टेबल खराब न हो इसके लिए सनमाइका के टाप बनने लगे। सनमाइका खराब न हो इसके लिए उसपर टेबल क्लाथ बिछाया जाने लगा। आज सेन्टर टेबल का टॉप शीशे का होता है। अकसर यह स्क्रैच फ्री होता है किन्तु इसे भी स्क्रैच से बचाने के लिए इसपर पारदर्शी कवर डाला जाता है। अब शरीर को संवारने की बारी है। लड़के-लड़कियां समान रूप से वैक्सिंग, ब्लीचिंग, कलरिंग करवाती हैं। क्लीन्जिंग मिल्क से चेहरा साफ करते हैं, नमी बनाए रखने के लिए माइस्चराइजर लगाते हैं। इस ेचेहरे को धूल मिट्टी या धूप न लग जाए इसके लिए साफा बांध लेते हैं। स्लीवलैस कपड़ों में वैक्सिंग की हुई बांहों को बचाने के लिए लंबे दस्ताने पहनते हैं। अब पता नहीं क्या-क्या बचाने के लिए युवा क्या-क्या करते हैं किन्तु पुलिस के लिए यह खासा सिरदर्द बन चुका है। प्लेटफार्म पर भटकती मिली लड़की हो या मोहल्ले में मिली लड़की की लाश, उसे या तो उसके घर वाले पहचान पाते हैं या फिर वह लोग जिनके लिए वह खास होती है। बाकी लोगों के लिए मोहल्ले की हर लड़की एक अलग रंग का साफा मात्र है। शायद इसकी जरूरत भी हो किन्तु यह जरूरत आम आदमी की समझ से परे है। इसकी एक जरूरत यह हो सकती है कि आज का युवा सार्वजनिक रूप से पहचाना नहीं जाना चाहता। वह कभी भी कहीं भी हो सकता है। वहां उसके मोहल्ले के और लोग भी हो सकते हैं। या वे लोग हो सकते हैं जिनके घरों के सामने से होकर उनका रोज का गुजरना होता है। ऐसे लोगों की नजरों से बचा रहना उनके लिए जरूरी हो जाता है। अब कौन लड़की यह गवारा करेगी कि पड़ोस वाली आंटी आकर उसकी मम्मी को यह बताए कि जब वह कोचिंग के नाम पर घर से निकली थी तब पड़ोसी के लड़के के साथ सिविक सेन्टर में पावभाजी खा रही थी। किसे पसंद होगा कि जब वह जवाहर उद्यान, मैत्राबाग या शिवनाथ वाटिका की तन्हाई में बैठी हो तो कोई, ‘हाय! शिवानी’ कहकर दाल भात में मूसरचंद की तरह आकर ठस जाए। वैसे समझ में यह नहीं आता कि इतनी मेहनत और नफासत से चेहरे को संवारा ही क्यों जाता है, जब उसे किसी को दिखाना न हो। जो प्यार करता है, वह तो सावन का अंधा होता है। वह तो चेहरे के दागों को भी छूता-सहलाता-चूमता है। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सावन के अंधे को व्यक्ति से नहीं बल्कि उसके होठों के तिल से, नाक के मस्से से ही प्यार होता है। फिर इतनी सजावट किसके लिए?

Saturday, October 16, 2010

हम जू के जानवर नहीं

वृद्धजन दिवस, बुजुर्ग दिवस, सीनियर सिटिजन डे। नाम चाहे जितना भी शालीन हो, इसमें सम्मान लेशमात्र भी नहीं है। कर्मजीवन से रिटायर होने मात्र से क्या हम इंसान नहीं रहे? इंसान एक सामाजिक प्राणी है। वह परिवार चाहता है, पड़ोसी चाहता है। नाते रिश्तेदारों से ही उसकी दुनिया बसती है। अब जबकि हमारे पांव कब्र में लटके हुए हैं, तब लोग हमसे उम्मीद करते हैं कि हम अपना स्वभाव बदलें। यह सम्भव नहीं है। हम पके बांस हैं। पके बांस की खपच्चियों को मोड़कर आकार नहीं दिया जा सकता। न टोकनियां बनाई जा सकती हैं और न ही चटाई। आप कच्चे बांस हो, आप क्यों नहीं खुद को बदलते? हमारी पटरी नहीं बैठती। हम बदल नहीं सकते। अब हम कमाते नहीं हैं इसलिए घर के मुखिया नहीं हैं। मन नहीं लगा तो निकल कर सड़क पर आ गए। किसी ने व्यवस्था कर दी तो वृद्धाश्रम या सियान सदन चले आए। अब तो ऐसा इंतजाम होने लगा है कि लोग रिटायरमेंट के बाद अकेले रहने की तैयारी एडवांस में कर रहे हैं। कोई सियान सदन में बुकिंग करा रहा है तो कोई वृद्धाश्रम में। हमें अच्छा बुढ़ापा नहीं मिला, हमारी बदकिस्मती। पर हम जानवर भी नहीं हैं। हम दया के पात्र भी नहीं है। इसलिए हमारा तमाशा बनाना बंद करो। लोग अपने बच्चों को मैत्रीबाग में जानवर दिखाने ले जाते हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को बूढ़ा दिखाने के लिए सियान सदन ला रहे हैं। क्या उम्मीद करते हैं हमसे? हम रोते, बिलबिलाते या तड़पते हुए मिलें। ताकि तुम्हारे बच्चे को यह समझ में आए कि सियान सदन का अकेलापन कितना कष्टकारी है, ताकि तुम्हारा बुढ़ापा बेहतर हो। या फिर हम इतना खुश होकर दिखाएं कि तुम्हारा बच्चा अभी से तुम्हारी कल्पना किसी वृद्धाश्रम में करने लगे? बच्चे को बूढ़ा दिखाने के लिए उसे सियान सदन लेकर आने की जरूरत नहीं है। उसे उसका दादा -दादी या नाना-नानी दिखाओ। उसे बताओ कि ये तुम्हारे अपने मम्मी-पापा हैं जिन्होंने कभी अपने कंधे पर बिठाकर तुम्हें दशहरा दिखाया था। आज ये अशक्त हैं। यह हर किसी के जीवन का नियम है। जो आज बच्चा है, कल जवान होगा और फिर जीवन की संध्या में बूढ़ा होगा। यदि इन सबमे तालमेल बना रहा तो मनुष्य जीवन सार्थक होगा। यदि समर्थ जवानी ने बच्चों को पीटना और बूढ़ों को हकालना बंद नहीं किया तो समझ लो कि इंसानों की बस्ती की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

बुढ़ऊ को सीख

ऐ बुढ़ऊ! ले चा पी। सुबह-सुबह बहू गिलास में काली चाय लेकर आई थी। बुढ़ऊ ने चुपचाप चाय ले ली और चुसकने लगा। वह मन ही मन सोच रहा था, बहू कितना ख्याल रखती है। दूध वाली चाय पीने से कफ की शिकायत बढ़ सकती है। पेट में अफारा हो सकता है। गैस बन सकती है। तभी तो बहू फ्रिज में दूध रहते हुए भी उसके लिए अलग से काली चाय बनाकर लाई है। दोपहर के भोजन में भी सूखी रोटी और घीये की सब्जी देखकर वह प्रसन्न हो जाता है। बहू तो बेटी से भी ज्यादा ख्याल रखती है। उसे पता है कि बुढ़ापे में ज्यादा प्रोटीन खाना ठीक नहीं होता। किडनियां कमजोर हो गई हैं। ज्यादा दाल, घी, पनीर खाना मुसीबत को निमंत्रण देता है। गठिया की शिकायत बढ़ जाती है। बूढ़ा खुशी-खुशी सब्जी रोटी खाता है और बाहर पेड़ के नीचे बिछी खटिया पर जाकर बैठ जाता है। यहां पंछियों का कलरव है। सड़क पर आते-जाते लोग दिख जाते हैं। कोई राम-राम काका कहता है। बच्चे भी दादाजी को नमस्ते करना नहीं भूलते। कितना सुकून है यहां। मंद समीर के झोंके में न जाने कब आंख लग जाती है। स्कूल से लौटते ही बच्चे दादाजी को उठा देते हैं। चाय का वक्त हो चला है। बहू बरामदे में इंतजार कर रही है। कुल्ला करके वह चाय पीने पहुंचते हैं। शुगर फ्री बिस्किट के साथ काली चाय चुसकते हैं। फिर दूध का डिब्बा-कूपन लेकर सैर पर निकल जाते हैं। वहां उनकी उम्र के और भी लोग आते हैं। सब मिलकर बातें करते हैं। लोग अपनी-अपनी शिकायतों को पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं। बहू-बेटों की लानत मलामत करते हैं और अपना बुढ़ऊ बैठकर मुस्कुराता है। लोग कहते हैं, ‘तुम तो बहुत सुखी हो। तुम्हारी बहू तुम्हारा कितना ख्याल रखती है। घर में शांति है। हमारे यहां तो दिन भर किचकिच होती है। बहू ताने देती है। बेटा भी ऊंची आवाज में बातें करता है। अकसर डांट डपट देता है।’ बुढ़ऊ हंसता है। कहता है, ‘सब मन का फेर है। कल को मैं काली चाय की, सूखी रोटी की, शाम को दूध लाने की ड्यूटी की, शिकायत करने बैठूं तो हमारे यहां भी किच किच होगी। हर चीज का, हर हरकत का उजला पक्ष देखो, खुद भी सुखी रहोगे और बहू भी सुखी रहेगी। बेटा वैसे ही तो नहीं चिल्लाता। जब तुम्हारी किचकिच से बहू का पारा सातवें आसमान पर पहुंचता है और वह बेटे की ऐसी तैसी फेरती है, तभी वह चिड़चिड़ाता है। बहू आत्महत्या की धमकी दे सकती है, फांसी लगाने की कोशिश कर सकती है, घर छोड़ कर जाने की चेतावनी दे सकती है। वह डर जाता है। उसने तुम्हारी उंगली पकड़कर चलना सीखा है। मार भी खाई है और जिद भी की है। तुम उसके अपने हो। अपनी खिसियाहट, झल्लाहट इसलिए वह तुम पर उतारता है। वह इसे अपना अधिकार समझता है। यही तुम्हारी जीत है। वह आज भी तुम्हारा है।’

यह है हिन्दुस्तान

अयोध्या मामले में अदालत की तीन सदस्यीय बेंच ने अपना फैसला सुना दिया। जैसा कि उम्मीद की जा रही थी वैसे कुछ भी नहीं हुआ। लोगों ने शांतिपूर्वक अदालत के फैसले को स्वीकार किया और सबकुछ जैसा चल रहा था, वैसा ही चलता रहा। अदालत ने यहां एक टिप्पणी की थी कि कोई भी इस पर प्रतिक्रिया मत करे। बस इतना ही काफी साबित हुआ। उन्मादियों के मुंह सिल गए। देश की जनता तो हमेशा से ही भाईचारे के साथ रहती आई है। जिन्हें भीड़ जुटानी होती है, मुद्दे वही तलाशते हैं। उनके मुंह पर टेप चिपकाकर अदालत ने एक बार फिर यह साबित करने का मौका दे दिया कि आम नागरिक दिल से, संस्कृति से, सभ्यता से एक हैं। कहते हैं, जब-जब संकट आता है - एका तब तब दिखता है। संकट के समय में समूचा भारत एक परिवार की तरह गुंथ गया। एक विशाल परिवार में छोटे-मोटे झगड़े-झंझट स्वाभाविक हैं। किन्तु संकट में एक होने की शक्ति ही उसकी ताकत होती है। भारतवासियों ने इसी एकजुटता और तटस्थता का परिचय देकर इसे एक बार फिर साबित कर दिया है। भारतीयों की इस एकजुटता को अवश्य ही दुनिया हसरत भरी निगाहों से देख रही होगी। क्योंकि दुुनिया हमारी इसी ताकत से डरती है। अवाम की एकता ही राष्ट्र को मजबूत बनाती है। यही उसकी असली ताकत है। हथियार और साजोसामान तो साधन मात्र हैं। लोगों को आपस में लड़ाकर एक तरफ जहां हथियारों के सौदागर मुनाफा कमाते हैं वहीं विघ्नसंतोषी तत्व इसपर अपनी रोटी सेंकते हैं। भारत की इस ताकत का स्वाद एक बार अंग्रेजों ने चखा था। सशस्त्र क्रांतिकारी उनकी नाक में दम अवश्य करते थे किन्तु उसके खिलाफ रणनीति बनाई जा सकती थी। उनकी धरपकड़ की जा सकती थी। उन्हें फांसी पर लटकाया जा सकता था। किन्तु जब पूरा देश महात्मा गांधी की पुकार पर एकजुट हो गया तो अंग्रेजों को संकेत मिल गया कि यहां अब बंदूक का जोर नहीं चलेगा। आप 33 करोड़ लोगों को बंदूकों से नहीं जीत सकते। और आज तो हम 135 करोड़ हैं। हमारे देश की हजारों प्रतिभाएं विदेशों में अपने दम पर अपना लोहा मनवा रहे हैं। हम जब भी हारे हैं फूट से हारे हैं। यदि फूट डालने वालों को हम पहचान लें तो क्या पाकिस्तान, क्या चीन और क्या अमरीका, कोई भी हमारी तरफ नजर उठाकर नहीं देख सकेगा। संभवत: हमारी यही सोई हुई शक्ति दोबारा जाग उठी है। दुनिया भर के चिंतकों का मानना है कि भारत एक बार फिर विश्व गुरु होगा, दुनिया उसके कदमों में होगी। इसकी शुरुआत गुरुवार को हो चुकी है। हमने दुनिया के आगे एक आदर्श रखा है। हमें इसे बनाए रखना होगा।

क्या मतलब है बस का

कहते हैं सामूहिक सवारी सस्ती पड़ती है। इसीलिए शहरों में बस सर्विस होती है। किन्तु छत्तीसगढ़ में यह कहानी उलटी साबित हो रही है। छत्तीसगढ़ में बस के बजाय निजी वाहन से यात्रा करना सस्ता पड़ता है। दुपहिया वाहन से यदि दो लोग दुर्ग से रायपुर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति 18 रुपए का खर्च आता है। यदि कार से चार लोग दुर्ग से रायपुर एसी चलाकर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति खर्च 22 से 26 रुपए आता है। यदि वह भेड़ बकरियों की तरह आधी सीट में घुटनों को अगली सीट की पुश्त से छीलते हुए रायपुर जाता है तो प्रति व्यक्ति खर्च 28 से 35 रुपए आता है। यानी बस वाला सिर्फ दो चीजों का फायदा उठाता है- या तो आपके पास अपना वाहन नहीं है, या फिर आपमें फोरलेन पर गाड़ी चलाने का हौसला नहीं है। यदि इसका नाम पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम है तो वाकई छत्तीसगढ़ ने बहुत तरक्की की है। यहां प्रति व्यक्ति आय में इतना इजाफा हो चुका है कि 10-20 रुपए अब कोई मायने नहीं रखते। यह बात और है कि एक-एक रुपए के लिए मिनी बसों के कंडक्टर गरीबों की इज्जत उतार रहे हैं। उन्हें बीच सड़क गाड़ी से उतार रहे हैं। माता पिता की गोद में जबरदस्ती बैठाए गए बच्चों का भी किराया वसूल रहे हैं। जिन लोगों ने कभी मिनी बस में सफर किया है उन्हें पता है कि इन बसों में गोद में बच्चा लेकर बैठना कितना कष्टकर है। जिन सीटों के बीच घुटनों के लिए जगह नहीं होती वहां गोद में बच्चा केवल वही निरीह बैठा सकता है जिसके मुंह में जुबान नहीं होती। उसे सरकार मारती है, पुलिस मारती है, नक्सली मारते हैं, बस वाले मारते हैं, ठेकेदार मारते हैं। वह केवल पिटने और मरने के लिए ही पैदा हुआ है। इस व्यवस्था का विरोध करना मना है। विरोध करने वाले को पहले तो बस वाले ही लात घूंसों से लहूलुहान कर देते हैं। फिर पुलिस डंडे से मारती है। अदालतों में केवल टाइमपास होता है। गरीब आदमी, रोजी मजदूर वहां जाना अफोर्ड नहीं कर सकता। हां! यही लोकतंत्र है। खास लोगों का लोकतंत्र। इसमें आम लोगों की गिनती नहीं होती। जिनकी गिनती नहीं होती उनका कोई तंत्र नहीं होता। वे तो भिखारी हैं। सरकारी आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में 34 लाख भिखारी परिवार हैं जिन्हें सरकार खाद्यान्न सुरक्षा देती है। ये लोग महीने में दो चार सौ रुपए का राशन तक नहीं खरीद सकते। ऐसे लोग रोजी मजदूरी के लिए शहर आना चाहते हैं। इलाज के लिए सदर अस्पताल आना चाहते हैं किन्तु इनके पास बस का भाड़ा ही नहीं है। सरकारी बस सेवा पहले ही हाशिए पर डाली जा चुकी है। अब तो शराब की तरह बसों का भी माफिया होने लगा है। तभी तो कहते हैं - सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, चाहो जहां से नोचो आवाज नहीं करता।

Monday, August 9, 2010

आध्यात्म की दुकान

आध्यात्म अब फकीरों की जागीर नहीं रही। अब बड़े-बड़े आदमी कर्त्तव्यों को छोड़ आध्यात्म की चर्चा करने लगे हैं। स्कूलों में पूरी छुट्टी के बाद शाला निदेशक भूख से बिलबिला रहे बच्चों को पका रहे हैं। अपनी तकलीफों को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों को पकाया जा रहा है। समस्या का समाधान न ढूंढकर समस्या की आध्यात्मिक विवेचना की जा रही है। वंचित, पीड़ित, शोषित लोगों को समझाया जा रहा है कि सभी उंगलियां बराबर नहीं होतीं। जिस तरह उंगलियां छोटी-बड़ी होती हैं उसी तरह समाज में लोग ऊंचे-नीचे होते हैं। इसे कानून बनाकर नहीं बदला जा सकता। अंग्रेजों के जमाने का हवाला दिया जा रहा है जब जाति पूछकर ही नौकरियां दी जाती थीं। सबसे ज्यादा मुसीबत पत्रकारों की है। प्रवचनकारों का प्रवचन तो वे सुन भी लेते थे किन्तु प्रशासनिक एवं पुलिस के अधिकारियों का प्रवचन हजम करना मुश्किल हो रहा है। जाते दो मिनट के लिए हैं और प्रवचन सुनकर दो घंटे बाद खाली हाथ निकलना पड़ता है। फुर्सतिया पत्रकारों की बात और है किन्तु जिन्हें आम पाठकों के लिए खबरें लिखनी हो उन्हें यह भारी पड़ रहा है। इन दिनों थानों से एक ही रटा रटाया जवाब मिल रहा है। सब खैरियत है। कोई क्राइम नहीं। चोरी, लूट, छिनतई, बलात्कार अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं। ये भी कोई खबर है। बरबस ही नटवरलाल फिल्म के संवाद जेहन में ताजा हो जाते हैं जब अमिताभ बच्चों से कहते हैं, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू’। अब हर कोई काला-पीला तेल, प्लाट-मकान-दुकान की दलाली, नई-पुरानी कार की बात तो नहीं कर सकता। जुआ, सट्टा, कबाड़ में हर कोई दिलचस्पी नहीं ले सकता। हर किसी के पास कोई रैकेट भी नहीं होता कि वह उचंती खाता मेन्टेन कर सके। ऐसे बेकार लोगों के साथ पुलिस देश-विदेश, अंतरिक्ष स्वर्ग-नर्क की चर्चा न करे तो और क्या करे? जनता के बीच अपनी छवि बनाने को उतावली पुलिस की मीडिया से यह बेजारी समझ से परे है। कॉकस से घिरी पुलिस को यह भी शिकायत है कि उसकी अच्छी योजनाओं का प्रचार प्रसार नहीं हो पाता। लोगों को सिर्फ पुलिस की खामियां नजर आती हैं। दरअसल ऐसा है नहीं। सही मीडिया का चयन करें, प्रचार प्रसार भी होने लगेगा।

शिक्षा और वेश्यावृत्ति

नौकरी के लिए क्वालिफिकेशन चाहिए। क्वालिफिकेशन के लिए पैसे चाहिए। शिक्षा बेहद महंगी हो चुकी है। आपके परिवार के पास पैसे नहीं हैं। बैंक से ऋण लेना आसान नहीं है। आपके पास जिस्म है। बाजार में ग्राहकों की कमी नहीं है। आप किसी भी कीमत पर पढ़ना चाहती हैं। लिहाजा सौदा हो रहा है। विकसित देशों में तो अब बाकायदा उसी तरह जिस्मों की नीलामी हो रही है जिस तरह बताते हैं कि किसी जमाने में कोठे पर नथ उतराई की बोली लगाई जाती थी। फर्क केवल इतना है कि अब लड़की खुद अपनी नीलामी करती है। अब वह ग्राहकों की मंडी में नहीं खड़ी होती। कामातुर निगाहें उसे नहीं घूरतीं। यह नीलामी बेहद सभ्य ढंग से ई-बे नामक आनलाइन नीलामी साइट पर की जाती है। हाल ही में ब्रिटेन की मिस स्प्रिंग ने अपने जिस्म को नीलाम किया, दो लाख पाउंड में। इससे वह न केवल अपनी मेडिकल पढ़ाई का खर्च निकाल पाएगी बल्कि इस पढ़ाई के लिए लिए गए कर्ज को भी चुका पाएगी। भारत भी तेजी से इसी दिशा में बढ़ रहा है। सिम्बायसिस जैसी प्रबंधन संस्थान की छात्राएं कालगर्ल रैकेट में पकड़ी गई हैं। इतिहास में पढ़ा था कि किसी जमाने में शिक्षा पर आभिजात्य वर्ग का ही अधिकार था। केवल राजा, मंत्री और सेनापति के पुत्रों को ही विद्यादान किया जाता था। पढ़ा यह भी था कि वेदमंत्र सुन लेने मात्र से शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवा दिया जाता था। रजवाड़े खत्म हो गए, जमींदारी छिन गई, जाति प्रथा भी टूट गई किन्तु समाज आज भी बंटा हुआ है। आज का गरीब शूद्र है। गरीब तो क्या निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की हालत भी खास अच्छी नहीं है। सरकारें गरीबों के सशक्तिकरण के बजाय उन्हें भिखारी बनाकर और नीचे धकेलने का प्रयास कर रही हैं। अच्छा भोजन, अच्छी शिक्षा, अच्छा आवास सबकुछ अब मुट्ठीभर लोगों के लिए सुरक्षित-संरक्षित हो गया है। हर कोई अपनी-अपनी क्षमताओं, विशेषताओं, विशिष्टताओं की कीमत लगवा रहा है। उपभोक्तावाद चरम पर है। ऐसे में किसी को नैतिकता का भाषण देना घूरे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक करने जैसा है। दूसरी तरफ सुरा-सुन्दरी के धंधे में लोग रातों रात लखपति-करोड़पति बन रहे हैं। इनकी मांगें बढ़ रही है। अब लड़ने भिड़ने के दिन नहीं रहे। लिहाजा वे खरीद रहे हैं। आजादी को तिरेसठ साल ही हुए हैं और भारत की जमीन, नदियां, तालाबों का सौदा होने लगा है। बावला पाकिस्तान कुछ हजार वर्ग किलोमीटर जमीन के लिए पिछले 50 सालों से युद्ध कर रहा है। किसी दलाल को बयाना दे दिया होता तो कश्मीर कबका उसका हो चुका होता।

पढ़े लिखे ढीठ

बचपन में गर्मियों की छुट्टियां गांवों में बिताया करता था। हमारा अपना गांव सैकड़ों किलोमीटर दूर था। हर साल वहां जाना संभव नहीं होता था। लिहाजा हम बच्चे गर्मियों में अपने अड़ोसी पड़ोसी के गांव चले जाते थे। वहां हमने देखा था कि जब भी बच्चा साइकिल उठाकर गांव से बाहर जा रहा होता तो उसके माता पिता उसे टोकते और कहते कि ध्यान से साइकिल चलाना। सड़क की बार्इं तरफ से ही चलना। आने-जाने वाली गाड़ियों को निकल जाने देना। अपना ख्याल रखना। गांव में मैने देखा था कि जंगली आदिवासी भी जब लकड़ी या तेंदूपत्ता का गट्ठर लेकर सड़कों पर चलते हैं तो वे एक कतार में आगे पीछे चलते हैं। मरनी नहावन में आज भी स्थानीय लोग, फिर चाहे वे शहर के निवासी ही क्यों न हों, कतार में ही चलते हैं। कहने-सुनने को बहुत कुछ होता है किन्तु सड़क पर वे मौन धारण किये रहते हैं। आगे पीछे चलती इन महिलाओं की कतार कभी-कभी चार-पांच सौ मीटर लंबी होती है पर क्या मजाल की दो महिलाएं भी आजू बाजू चलती मिल जाएं। रास्ते के किनारे किनारे समान रफ्तार से चलती इन महिलाओं के कदम एक साथ उठते और पड़ते हैं। उनके बीच समान दूरी होती है। ऐसा लगता है जैसे सेना ने इन्हें ट्रेनिंग दी हो। आज भी नक्सल प्रभावित इलाकों में गश्त कर रहे कोया कमाण्डो इसी तरह एक के पीछे एक चलते हैं। पर यह संस्कृति शिक्षा के साथ ही विलुप्त हो जाती है। इन परिवारों के पढ़े लिखे बच्चों को ही लें तो उनपर शहरी ढिठाई चुटकियों में हावी हो जाती है। वे तीन-तीन की कतार में साइकिल या दुपहिया चलाते मिल जाएंगे। हार्न बजाने पर भी वे आने जाने वाले को साइड नहीं देंगे। ज्यादा हार्न बजाया तो घूर कर देखेंगे। कुछ ऐसे ही युवाओं से जब यातायात सुरक्षा के बारे में पूछताछ की गई तो उनके जवाब ने निराश किया। इनमें से सभी ने केवल अपने अधिकारों की बात की। सभी ने बड़ी गाड़ी वालों को दोषी ठहराया। सभी को इस बात का ज्ञान था कि किसी जगह किस तरह की दुर्घटना होने से किसकी गलती मानी जाती है। किन मामलों में इन्श्योरेंस क्लेम मिलता है और कब उसमें दिक्कत आती है। मगर किसी ने भी ट्रैफिक में अपनी जिम्मेदारी पर एक शब्द नहीं कहा। शायद नए जमाने की सोच का असर था। वे नहीं मानते कि छुरा कद्दू पर गिरे या कद्दू छुरे पर, कटना कद्दू को ही होता है। उनकी दिलचस्पी सड़क दुर्घटना में गलती निकालने में है। वे बाल की खाल निकालना चाहते हैं पर यह नहीं सोच पाते कि इस दुर्घटना को टाला कैसे जा सकता था। दिक्कत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल अधिकारों में उलझा हुआ है, कर्त्तव्यों को लगभग सभी ने विस्मृत कर दिया है। ऐसे तो नहीं बनेगा बात।

इन्हें भी चिपकाओ तीन पेटी

पुलिस के पास एक अमोघ अस्त्र है तीन पेटी। हत्या, लूट, बलात्कार, हत्या के प्रयास के मामले में कभी-कभार पुलिस की भले ही न चले किन्तु तीन पेटी शराब चिपकाकर वह किसी का भी नाड़ा ढीला कर सकती है। यदि पुलिस नैतिकता के आधार पर समाज का कुछ भला करने की ठान ले तो कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें तीन पेटी चिपकाने से न केवल उन्हें पुण्य लाभ हो सकता है बल्कि देश की प्रतिभाओं का भी भला हो सकता है। इनमें से कुछ नाम खेल संगठनों से जुड़े हैं तो कुछ मुफ्त की नेतागिरी से। ऐसे लोगों की करतूतों का खामियाजा पहले कुछ लोग और बाद में पूरा समाज भुगतता है। ऐसे लोग किसी लिखित कानून को नहीं तोड़ते पर नन्हें खिलाड़ियों का दिल तोड़ने से लेकर देश की प्रतिभाओं का गला घोंटने और राष्ट्र को उसकी प्रतिभाओं से वंचित करने में इनकी बड़ी भूमिका होती है। देश का कोई कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। राज्य तथा केन्द्र की सरकारें इनके आगे नतमस्तक हैं। खेल के स्वतंत्र संघ इनके उदाहरण हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इन संगठनों पर बैठे मठाधीश इन पदों का उपयोग जागीरदार की तरह करते हैं। वे जो कुछ भी कह देते हैं वह पूरे देश पर बाध्यकारी हो जाता है। अपने इशारों पर नहीं नाचने वाली प्रतिभाओं का वे गला घोंट देते हैं। शायद यही वजह है कि 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश के हिस्से में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में केवल चुग्गा ही आता है। हम खिलाड़ियों और उनके प्रशिक्षकों को कोस कर रह जाते हैं। शैतान का सगा नाना पीछे बैठकर डोरियां खींचता रहता है। हाल ही में जबलपुर में आयोजित आॅल इंडिया जस्टिस तन्खा मेमोरियल ओपन चेस टूर्नामेन्ट में अपने हुनर की धाक जमाने वाले नन्हें खिलाड़ियों पर भी शतरंज से जुड़ी एक ऐसी ही संस्था की गाज गिरी हुई है। इसकी वजह से वे आफिशियल टूर्नामेन्ट में भाग नहीं ले सकते। यानी कि वे छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते फिर भले ही वे प्रतिभा में कास्पारोव के समकक्ष क्यों न हो जाएं। कानूनन इन मठाधीशों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर पुलिस चाहे तो ऐसा कर सकती है। पुलिस कप्तान वैसे भी खेल प्रतिभाओं के सरपरस्त माने जाते हैं। दर्जनों लोगों के खिलाफ तीन पेटी चिपकाने वाली पुलिस यदि ऐसे मठाधीशों पर तीन पेटी चिपकाकर दिखाए तो बहुतेरे खिलाड़ियों को तसल्ली मिलेगी।

चिता का र्इंधन, पिंड का निवाला

कुछ ही दिनों में हम आजादी की 63वीं वर्षगांठ मना रहे होंगे। इस बीच देश में बहुत कुछ बदला है। विकास की रफ्तार में अंधाधुंध तेजी आई है। बादशाह के महल से बड़े अफसरों के बंगले हो गए हैं। जनसेवकों की वेतन-सुविधा मल्टीनेशनल कंपनियों के सीईओ के पे-पर्क्स को मात दे रही है। जिन्हें नौकरियां मिल रही हैं, उन्हें महंगाई भत्ता भी मिल रहा है। पद के लिहाज से वाहन का आकार प्रकार बढ़ रहा है। चार बस और बारह ड्राइवर कम करने की कोशिश में 200 लोगों को स्कूटर और कार अलाउंस दे रहे हैं। लोग इनकम टैक्स बचाने इनवेस्ट कर रहे हैं। खर्चे हैं कि पूरे नहीं पड़ रहे। करों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। खाने पीने की चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। संसद से लेकर विधानसभा तक पक्ष-प्रतिपक्ष का टाईअप हो गया है। टाटा, बिड़ला, अंबानी, जिंदल, नेता, आईएएस, आईपीएस और भिखारी खाने-पीने की चीजों पर समान दर पर टैक्स अदा कर रहे हैं। जो खरीद पा रहे हैं वे खरीद रहे हैं। जो नहीं खरीद पा रहे वे चींटियों, बिल्लियों और कुत्तों का जीवन जी रहे हैं। ट्रेन में दो परिवार आमने सामने बैठे थे। एक अपर मिडिल क्लास तो दूसरी लोअर मिडिल क्लास का था। एक एलटीसी पर यात्रा कर रहा था तो दूसरा अंटी के पैसे खर्च कर किसी रिश्तेदार के यहां शादी में जा रहा था। एक परिवार ने ट्रेन में खाने का आर्डर दिया। दूसरे ने अपनी थैली से परांठा और अचार निकाल लिया। परांठे बच गए तो उसने करीने से उन्हें वापस पैक कर लिया और थैले में डाल दिया। ट्रेन का ‘मील’ कुछ विलंब से पहुंचा। बच्चे तब तक कुरकुरे और चिप्स खाकर सो चुके थे। उन्हें जगाया गया पर उनींदे बच्चों ने लंच पैक को जूठा करने के बाद खाने से इंकार कर दिया। सना-सनाया चावल दाल खिड़की से बाहर। गाड़ी स्टेशन पर रुकी थी। प्लेटफार्म पर अजीब नजारा था। मैले-कुचैले कपड़ों में बच्चे लंच पैक्स को लूट रहे थे। तकरीबन स्लीपर बोगियों के आसपास यही नजारा था। बनारस का घाट याद आ गया। वहां भी बच्चे, बूढ़े और जवान नदी में घंटों तैरते रहते हैं। उनके निशाना पर वे पिंड होते हैं जिन्हें लोग अपने पुरखों के नाम पर पानी में बहा देते हैं। कुछ ऐसे ही परिवार श्मशान के आसपास डेरा डाले रहते हैं। वे चिता की लकड़ी से घर के चूल्हे का र्इंधन और पिंड से बच्चों का निवाला चुराने कुत्तों से जंग करते हैं। अंधाधुंध शहरीकरण से कौए कम हो रहे हैं। कोई और उनकी जगह ले रहा है।

सड़क पर वीभत्स हादसे

कटे-फटे अंग प्रत्यंग, चीथड़ों की तरह शरीर पर झूलते कपड़ों के अवशेष, कुछ दूर पड़ी मुड़ी तुड़ी सी मोटरसाइकिल। चारों तरफ राहगीरों की भीड़। कोई सहानुभूति दर्शा रहा है तो कोई मोबाइल पर पुलिस को सूचित करने की कोशिश कर रहा है। इनके अलावा ढेर सारे लोग तमाशा देख रहे हैं। कोई मोबाइल का कैमरा आन कर लेता है तो कोई छू लेने को बेताब होता है। मुन्ना रोज 12:30 तक घर आ जाता है, आज एक बज रहे हैं फिर उसका पता नहीं। दो बजे खबर आती है कि मुन्ना अब इस दुनिया में नहीं रहा। माँ गश खाकर गिर जाती है। बस स्टैण्ड पर एक महिला धूल से सने वस्त्रों में बैठी है। बालों में जटाएं पड़ गई हैं। लोग बताते हैं कि उसका बेटा सड़क हादसे का शिकार होकर चल बसा। शव इतना विकृत हो चुका था कि माँ को आज भी यकीन नहीं है कि वह उसका बेटा था। बेटे के इंतजार में वह आज भी बस स्टैण्ड पर बैठी रहती है। वर्ष 2007 में देशभर में हुई 479216 सड़क दुर्घनाओं में 114444 लोगों को मौत हुई थी। देश में प्रति घंटे कम से कम 13 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है। 75 फीसदी हादसे चालकों की लापरवाही या गलती से होते हैं। एक से तीन फीसदी मामलों में पैदल या साइकिल सवार की गलती पाई जाती है। देश की 36 लाख किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़कों पर प्रति वर्ष औसतन चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनायें होती हैं। देश में राष्टÑीय राजमार्ग और राष्टÑीय एक्सप्रेस मार्ग की लम्बाई 70 हजार किलोमीटर से अधिक है। तकरीबन प्रमुख शहर राजमार्गों पर बसे हैं। राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग, रायपुर भी इसके अपवाद नहीं। इसलिए जब दुर्ग पुलिस ने बच्चों को यातायात के प्रति जागरूक एवं प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया तो एक आस जगी कि इन हादसों में कमी आएगी। पर यह अकेली पुलिस का काम नहीं है। यह प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने की कोशिश करे। घर पर बच्चों के साथ यातायात सुरक्षा की बातें करे। दुर्घटनाओं की तरफ से आंखें न फेर लें बल्कि उसकी वीभत्सता और परिवार पर पड़ने वाले इसके प्रभाव की चिंता करे। जिस तरह साल में एक दिन पिकनिक मनाने जाते हैं उसी तरह एक दौरा बड़े अस्पतालों के अस्थि विभाग का भी करें।

यह कैसी फ्रेंडशिप

फ्रेंडशिप डे पर देशभर में रविवार को जो कुछ भी हुआ वह कोरी जिद की टकराहट का परिणाम था। न तो इसका फ्रेंडशिप से कोई लेना देना था और न ही हिन्दुत्व या राष्ट्रीयता की भावना से। एक तरफ जहां युवा मनमानी की जिद पर अड़े हैं वहीं ऐसे युवा, जिन्हें यह सुख हासिल नहीं उनकी मिट्टी पलीद करने में जुटे हैं। कम से कम इस मामले में प्रशासन उत्पातियों के साथ है क्योंकि इनका उत्पात प्रत्यक्ष है पर छोटा है। यह न तो सतयुग है और न द्वापर। अब कृष्ण और सुदामा नहीं होते। अब तो रईस बापों की बिगड़ैल औलादें सिम्बायसिस में मैनेजमेन्ट पढ़ती हैं। उनका मैनेजमेन्ट फंडा आम आदमी से अलग होना ही चाहिए। फ्रेंडशिप का मतलब अब मुंह में केक का क्रीम पोतकर एक दूसरे की गोद में बैठना हो गया है ताकि एक दूसरे के गालों को चाट कर साफ किया जा सके। किसी को दिक्कत भी नहीं है। जब किसी का 90 फीसदी ध्यान अपने तन को सजाने संवारने में हो तो उसका हासिल इससे जुदा नहीं हो सकता। आपका जिस्म है, आप जानो या आपके माडर्न माँ-बाप जानें। समाज को दिक्कत तब होती है जब आप शिकायत लेकर थाने पहुंचती हो। कभी कहती हो कि आपके बायफ्रेंड ने आपका एमएमएस बना लिया और अब ब्लैकमेल कर रहा है। कभी फूला हुआ पेट लेकर सहानुभूति बटोरने निकल पड़ती हो। हर बार वही कहानी। लड़के ने शादी का झांसा दिया। झांसा इतना तगड़ा था कि शादी से पहले ही हनीमून मना लिया। कई-कई साल तक मिल कर मजे किए और फिर आरोप लड़के पर मढ़ दिया कि उसने दैहिक शोषण किया। समाज को भरमाने के लिए मीडिया और कानून ने शब्दों का इजाद भले ही कर लिया हो किन्तु मेडिकल साइंस की राय इससे जुदा है। लंबे रिश्ते कभी एकतरफा नहीं होते। आप किसी मजबूरी में नहीं बंधी हुर्इं कि आपका शोषण किया जा सके। आपकी मजबूरी आपकी अपनी इच्छाएं हैं। बार-बार ठगी जा रही हैं फिर भी नहीं चेत रहीं। आपको एक बार भी नहीं सूझता कि जो युवक अपने माँ-बाप, भाई-बहन को धोखा देकर आपका साथ निभाने की कसमें खा रहा है वह किसी का नहीं। आप यह भी नहीं समझना चाहतीं कि कानून चाहे जो कहे किन्तु प्रकृति ने पुरुष और नारी को अलग-अलग बनाया है। आप अपनी लड़ाई खुद लड़ने निकल पड़ी हैं। कानून आपको हादसों से नहीं बचा सकता। हादसों के बाद हद से हद दोषी को सजा और आपको मुआवजा दिला सकता है। आप माडर्न बनें इसमें किसी को दिक्कत नहीं। बस इतनी मेहरबानी करें कि कुंवारी माँ बनें तो ठसन के साथ अकेले ही उसकी परवरिश करें। लड़का आपको छोड़े तो आप भी किसी दूसरे को पकड़ लें। पश्चिम हो या पूर्व किसी भी संस्कृति की आधी अधूरी नकल हमेशा तकलीफदेह होती है।

झोला वाले बाबा

बचपन में भिखारियों को देखने पर हम डर जाते थे। उसकी खिचड़ी बाल या दाढ़ी नहीं बल्कि उसके कंधे पर लटका थैला हमें डराता था। हमें बताया गया था कि उस झोले में ऐसे बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता की बात नहीं सुनते। अपने घर से दूर खेलने चले जाते हैं। झोला वाला बाबा दरअसल बच्चे पकड़ने के लिए ही घूमता रहता है। जहां भी कोई बच्चा अकेला दिखता है उसे झोले में डाल लेता है और फिर ले जाकर उसकी आंखें फोड़ देता है, उसकी टांगे तोड़ देता और उससे भीख मंगवाता है। कुछ ऐसा ही डर हमें अंधेरे से लगता था। हमें बताया गया था कि भूत प्रेत अंधेरे में रहते हैं। पेड़ों पर उनका निवास है। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए यह खौफ जाता रहा तथा इन कहानियों का मर्म भी समझ में आने लगा। रात को पेड़ों के नीचे नहीं जाने के वैज्ञानिक कारणों का भी पता लगा। वहां चिड़ियों के बसेरे के प्रति हम संवेदनशील होने लगे। यह भी समझ में आया कि बच्चों को एकांत में जाने से रोकने के लिए बाबा एक बहाना था। डरने-डराने का यह खेल आज भी जारी है। गुरुजी, ज्योतिषी, डाक्टर, बीमा एजेंट, अखबार सभी हमें डराने में लगे हुए हैं। यह डर हमें जीने नहीं देता। हम विकास से डरते हैं, परिवर्तन से डरते हैं। बिना देखे, बिना जाने आने वाले से डरते हैं। देखा जा रहा है कि किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले विरोध के स्वर उभरते हैं। देर सबेर ये शांत भी हो जाते हैं और फैक्ट्री स्थापित होकर रहती है। इस हंगामे में गरीब के घर चूल्हा नहीं जलता, उसका काम छूट जाता है, कुछ लोग मर भी जाते हैं। नेताओं की जेब गर्म हो जाती है और उद्योग स्थापित हो जाता है। ऐसे हर दूसरे मामले में गरीब, ग्रामीण जनता का केवल उपयोग किया जाता है। उसके हित की फिक्र किसी को नहीं होती। जिसके पास गंवाने को वैसे ही कुछ न हो उसे डर किस बात का। अलबत्ता झोला वाले बाबा, भूत प्रेत या चुड़ैल का डर उसे भी दिखाया जा सकता है। शहर के आसपास का हर तीसरा खेत बिल्डर के पास है। हर दूसरे खेत का बयाना हो चुका है। राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास कोई भूखण्ड शेष नहीं। पहले जमीन खरीद ली और फिर प्रशासन की मदद से वहां रहने वाले गरीबों को खेद दिया। यह रोज हो रहा है। प्रदेश ही नहीं पूरे देश की यही कहानी है। पर्यावरण के नाम पर जेके सीमेन्ट का विरोध करने वालों के घर में तुलसी के अलावा कोई पौधा नहीं। इसी तरह नक्सलियों के खिलाफ वायु सेना के प्रयोग की दलील देने वाले वायुसेना को जमीन देने को तैयार नहीं भली ही दो-चार पांच साल में वहां कालोनियां खड़ी हो जाएं।

दोस्ती की झेंप

समय के साथ शब्द के मायने बदल जाते हैं, सुना तो था किन्तु इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में मिला। जिससे भी उसके दोस्तों के बारे में पूछा शर्म से लाल हो गया। किसी के घर का माहौल स्ट्रिक्ट था तो किसी पर उसके बडेÞ भाइयों का जोर चलता था। किसी के लिए यह बेहद निजी प्रसंग था तो किसी के लिए एकांत चर्चा का विषय। हम सोचते रह गए कि हमने सवाल मित्र के संबंध में किया था या...। 20-25 साल पहले इस सवाल के जवाब कुछ और होते थे। हमारे गुरुजी पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बताया करते थे। संगीत चाचाजी का अभिन्न मित्र था। जब भी फुर्सत मिलती वे या तो कोई गीत गुनगुना रहे होते या फिर कुछ सुन रहे होते। पौधे और फूल मेरे पिता के मित्र थे। सुबह शाम फुर्सत निकालकर वे बगीचे के चार पौधों को संवारते। घास निकालते, कीड़े छुड़ाते, सूखे पत्तों को अलग करते। खाद-पानी देते। वे पौधों और बच्चों में कोई फर्क नहीं करते थे। माँ दोपहर को बाहर पड़ोसनों के साथ बैठतीं। सुख-दुख की चर्चा करने के साथ ही स्वेटर बुनाई का नया डिजाइन, कोई खास रेसिपी, नाते रिश्तेदारी की चर्चा होती। फुर्सत लोगों को आज भी है किन्तु दोस्तों के नाम बदल गए हैं। अब रेसिपी पड़ोसन नहीं बल्कि फाइवस्टार होटलों के शेफ बताते हैं। पड़ोसनों का स्थान एकता कपूर के झोल-झाल परिवारों ने ले लिया है जो एक बात का कम से कम तीन मतलब तो निकाल ही लेती हैं। जो दिन भर महंगी साड़ियां और जूलरी पहनकर कैमरे की तरफ मुंह किये खड़े-खड़े ही बातें करती हैं। कभी आदमी सुकून और दो गज जमीन की बातें करता था। आज प्लाट, बंगला और टेंशन की बातें करता है। ऐसे में दोस्त के मायने न बदलें यह कैसे हो सकता है। अब ‘शोले’ के जय और वीरू की तरह कोई ‘ये दोस्ती... हम नहीं..’ गाते हुए नहीं घूमते। ‘आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा...’ से शुरू हुआ यह दौर ‘आती क्या खंडाला...’ से भी आगे निकल चुका है। अब तो अलग-अलग गाड़ियां होती हैं। जुदा-जुदा राहें होती हैं। कहीं पर मिलते हैं और फिर अपनी-अपनी राह चले जाते हैं। फास्ट फारवर्ड लाइफ में जरूरत की जान-पहचान है। कहीं धन की, कहीं करियर की तो कहीं शरीर की जरूरत बोलती है। वैसे दोस्ती का भाव खत्म नहीं हुआ। दो घूंट लगाते ही वह बाहर आ जाता है। पिया-खाया आदमी दोस्ती पर जान लुटा देता है। पर्स निकालकर दे देता है, गाड़ी की चाबी थमा देता है। सौ मुश्किलें आसान कर देता है। पर लोग अब दोस्ती में नहीं पीते बल्कि पीने के लिए दोस्ती करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए...’ वाले दिन लद चुके हैं। हाँ में हाँ मिलाई तो ठीक वरना जयश्री राम!

पनीर के टुकड़े

जिस तरह कुछ लोगों में ब्रांडेड पहनने की फैंसी होती है, ठीक उसी तरह कुछ लोगों में पनीर की फैंसी होती है जबकि खाने के लिए उससे कहीं बेहतर कई चीजें उससे कहीं कम कीमत पर दुनिया में, खासकर भारत में उपलब्ध है। देश में सैकड़ों प्रकार की सब्जियां, दर्जनों किस्म के अनाज और दालें, तरह-तरह के पारम्परिक व्यंजनों की भरमार है किन्तु पनीर इन सबके बीच ब्रांड बनकर उभरा है। यदि हम दिमाग से इसके ब्रांड का भूत उतारकर इसके स्वाद की चर्चा करें तो शायद इसका नम्बर 50 व्यंजनों की हॉट लिस्ट में भी कहीं न आए। यहां तक पढ़ने के बाद कुछ लोगों को लगने लगा होगा कि लेखक पनीर नहीं खाता, या उसे पनीर पसंद नहीं। ऐसी बात नहीं है। कोफ्त तब होती है जब लोग केवल ब्रांडेड डिश के नाते पनीर परोसना चाहते हैं किन्तु उनकी जेब उन्हें इसकी इजाजत नहीं देतीं। शादी की पार्टियों में मटर पनीर के बाउल में जब लोग चने में छिपे पनीर के टुकड़ों को तलाशते हैं तो हंसी छूट जाती है। इसी तरह जब ‘अक्षय पात्र’ की रेसिपी में पनीर पुलाव आ जाता है तो सिर पीटने को जी करता है। ‘अक्षय पात्र’ मध्यान्ह भोजन बनाने की एक स्टेट आॅफ द आर्ट संस्थान है। जो बीएसपी के बंद हो चुके डेयरी के भवन में संचालित है। यहां पकने के बाद भोजन स्टील के कनस्तरों में स्कूलों को भेजा जाता है। मंगलवार को अक्षय पात्र ने न जाने क्यों बच्चों को पनीर पुलाव खिलाने का विचार किया। जाहिर है बच्चे पीले चावल में पनीर के टुकड़े तलाशते रह गए। 25 किलो भात में पनीर के मुट्ठी भर टुकड़े डाले जाने का क्या मतलब निकाला जाए समझ में नहीं आया। इससे तो अच्छा होता मटर या चना पुलाव ही बना दिया होता। या कुछ हरी सब्जियां ही डाल दी होतीं। कम से कम बच्चे खा तो लेते। किन्तु ब्रांडेड के जमाने में ब्रांडेड मध्यान्ह भोजन पकानी वाली संस्था को इससे क्या? हमारे दिमाग पर छाई यही ब्रांडेड संस्कृति है जो हमें कच्चा केला, गवार फल्ली, सहजन (मुनगा) आदि खाने से रोकती है और देश की 80 फीसदी से अधिक औरतें रक्ताल्पता का शिकार हो जाती हैं। बड़ा अच्छा लगता है जब प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत को भूखे नंगों का देश बताया जाता है, यहां के बच्चों को कुपोषण का शिकार बताया जाता है। यह स्थिति तब है जब यहां सुपाच्य, पोषक भोजन बेहद सस्ते में उपलब्ध है। क्यों हम अपनी जाने के दुश्मन बने हुए हैं। फ्रूट बोलने से क्यों हमारे दिमाग में सम्पूर्ण आहार केले की तस्वीर नहीं उभरती। फल का मतलब सेब और मोसंबी जैसे महंगे फल ही क्यों हैं। दरअसल भोजन पर हमारे शरीर की जरूरतों का कम और हमारे स्टेटस का अधिक जोर चलता है।

जान पहचान की ऐंठ

वह बड़े शहर से आया था। उसके कपड़े-लत्ते और गर्दन की ऐंठ बता रही थी कि वह बड़ा आदमी है। एक फैक्टरी के दरवाजे पर पहुंचकर उसने बेल पुश दबाया। दरवान ने दरवाजा खोला, झुककर सलाम किया और रिसेप्शन का रास्ता इशारे से बता दिया। अकड़ में घुटने सीधे रखता हुआ वह सेमीमार्च करता हुआ रिसेप्शन तक पहुंचा और रिसेप्शन पर खड़े खड़े फोन पर बात कर रहे युवक से कड़क कर पूछा, ..... कहां है। युवक ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा पर टेलीफोन पर हो रही बातचीत में व्यवधान नहीं आने दिया। आगंतुक ने आवाज को और रौबीला बनाते हुए दोबारा सवाल किया, युवक ने उन्हें विजिटर्स सोफा दिखा दिया। साफ लग रहा था कि दोनों को एक दूसरे का रवैया कतई नहीं भा रहा था। रिसेप्शन डेस्क पर बैठी युवती दिलचस्प नजरों से आगंतुक को देख रही थी। आगंतुक को उसकी आंखों में विद्रुप नजर आया। उसका खून खौल गया। पर वह चुप रहा। शायद उसने ठीक ही किया था। युवक की फोन पर बातचीत खत्म हो चुकी थी। वह आगंतुक की तरफ मुड़ा। ‘हम दिल्ली से आए हैं’ उसने कहा। ‘तो?’ युवक ने सवाल किया। ‘तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते’ आगंतुक हड़बड़ाया। इस बार युवक ने आवाज ऊंची की, उसके मुंह से एक ही लफ्ज निकला ‘गार्ड!’। तत्परता से एक गार्ड ने भीतर प्रवेश किया और बिना कुछ पूछे आगंतुक की बांह पकड़ी और उसे बाहर खींच लाया। गार्ड से हुई बातचीत में आगंतुक को पता लगा कि जिससे वह मिलने आया था वह दीवालिया हो चुका था और कंपनी एक माह पहले बिक चुकी थी। जिससे वह रिसेप्शन पर बातें कर रहा था वह कंपनी का नया मालिक था। ऐंठन में इस तरह की गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं। एक पुलिस वाले ने मनचलों को पकड़ा तो तैश में सबको गालियां दीं। उसे क्या पता था कि इनमें से एक गृहमंत्रालय के संसदीय सचिव का पुत्र था। लोगों से ऐसी गलतियां अक्सर हो जाती हैं। एक अपराधी जिसके सामने पुलिस से अपनी पहचान की डींग मार रहा था, वह जिले का नया पुलिस कप्तान निकला। जिसके आगे प्रिंसिपल मैम की बुराई कर रही थी वह उसीकी बेटी निकली। बेहतर हो कि हम ऐंठन और हेकड़ी का प्रयोग केवल परिचितों के आगे ही करें। वरना पता नहीं कब उलटे बांस बरेली को लौट आएं।

100 रुपए का पास्ता

नेहरू नगर का रेलवे लेव्हल क्रासिंग बंद था। एक माल गाड़ी दुर्ग की तरफ से आती दिख रही थी। दूसरी पावर हाउस के आसपास कहीं हो सकती थी। जब तक वह यहां पहुंचती तीसरी गाड़ी फिर दुर्ग से आ रही हो सकती थी। जब से यहां तीन पटरियां हुई हैं, मुसीबतें बढ़ गई है। इधर बारिश के कारण अंडरब्रिज भसक गए हैं। इसलिए इंतजार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। लिहाजा हमने इधर उधर नजर दौड़ाई और पिज्जा पार्लर में घुस गए। डिस्पले विंडो में काफी ताकाझांकी के बाद हमने पास्ता ट्राई करने की ठानी। 99 रुपए का पास्ता पूरे दस मिनट बाद पैक में सर्व किया गया। ठीक वैसा ही फॉयल पैक जिसमें इन दिनों ट्रेन में मील्स सर्व किए जाते हैं। क्लास वन के बच्चे के टिफिन बाक्स के आकार का पैक जिसमें एक सैंडविच और ऐप्पल के कुछ वेज (टुकड़े) ही आ पाते हैं। बहरहाल हमने फॉयल बाक्स का कार्ड का बना ढक्कन हटाया। अंदर दो मुट्ठी रंग बिरंगा सा, लिजलिजा सा सामान था। हमने उसे ट्राई किया, सॉस में लिपटी मैदे के उबले हुए पाइप जैसा लगा। सब्जी के कुछ टुकड़े थे। स्वाद के नाम पर उनमें भी केवल सॉस था। हम समझ गए कि पश्चिम को न तो खाना बनाना आता है और न भोज्य पदार्थ चुनना। वे अखाद्य, कुखाद्य भोजन को सॉस में लपेट कर निगल लेते हैं। नूडल्स से लेकर पास्ता तक सबका यही हाल है। बहरहाल हमने मित्रों से चखने को कहा। उन्हें भूख नहीं थी। फिर भी मेरे कहने पर उन्होंने एक एक चम्मच चखा और पास्ता खत्म हो गया। एक मित्र ने कहा, यार सॉस तो डब्बे में भी लगा है। क्यों न इसे भी चबा लें, कुछ पैसे और वसूल हो जाएंगे। दूसरे ने कहा, छोड़ भी यार इतना तो हमारे यहां थाली में छोड़ने का रिवाज है। अलबत्ता ऐसा कर सकते हैं कि बाक्स को धुलवा लेते हैं, बच्चे के क्राफ्ट बनाने के काम आ जाएगा। काश पापड़ी चाट और दही गुपचुप भी इस आलीशान सेटअप में बिकता। लिट्टी-चोखा और इडली-दोसा भी पार्सल में बिकता। शोबाजी में लोगों को आंसुओं के घूंट तो नहीं पीने पड़ते।

सफाई का फंडा

हम बेहद सफाई पसंद हैं। जीवन के लिए भले ही पांच लीटर पानी चाहिए हो हम सफाई के नाम पर प्रतिदिन सौ से पांच सौ लीटर पानी खर्च करते हैं। फिर भी सफाई सिफर। इसकी वजह है। हम सिर्फ पानी खर्च करने को सफाई मानते हैं। अब देखिए हम सफाई के लिए क्या-क्या करते हैं। सुबह-सुबह झाड़ू लगाकर घर का कूड़ा निकालकर सड़क पर या पड़ोसी के घर के आगे रख देते हैं। इसके बाद हम पोंछा मारकर पूरे घर को चिपचिपा कर लेते हैं। यह बैक्टीरिया के लिए परफेक्ट ब्रीडिंग ग्राउण्ड होता है। सब्जियों के डंठल, छिलके, पत्ते हम घर के बाहर या आजू-बाजू की नालियों में डाल देते हैं। यह कूड़ा वहीं सड़ता रहता है। सफाई की बात चली तो रामदेव बाबा याद आ गए। शहरों में बढ़ती भीड़ के साथ साथ उत्पन्न हुई कूड़ा निपटान की समस्या पर बाबा कहते हैं कि पहले हम घर से दूर केवल एक लोटा लेकर चले जाते थे। खेतों को देख लेते थे, दो चार सौ कदम चल भी लेते थे। शौच खुलकर होता था। पानी की बर्बादी भी कम होती थी। अब हम बिस्तर से उठते हैं। चंद कदम चलकर टायलट सीट पर बैठ जाते हैं और 15-20 मिनट गुजारने के बाद लटका हुआ मुंह लेकर बाहर चले आते हैं। अलबत्ता कई बार फ्लश कर देते हैं वरना बेडरूम में दुर्गंध जो आती है। टायलेट साफ होता है पर पेट नहीं। बारिश शुरू होते ही शहरों में निकासी की समस्या उठ खड़ी हुई है। नगर निगम सफाई में जुट गया है। सफाई के नाम पर हो क्या रहा है। नालियों के किनारे की घास खोदी जा रही है। इससे मिट्टी की पकड़ कमजोर होगी और वह नाली में बहकर उसे चोक कर देगी। यही नहीं पूरे मोहल्ले की नाली साफकर उसकी गंदगी को नाली के किनारे किसी एक स्थान पर इकट्ठा किया जा रहा है। इसे जेसीबी उठाएगा। जेसीबी कब आएगा पता नहीं। कूड़ा फिर से नाली में चला जाएगा। सफाई कर्मियों को वेतन मिल जाएगा। सफाई का काम भी होगा पर सफाई, फिर भी नहीं होगी।

एक लाचार बाप

मोहल्ले में आर्थिक रूप से हम सबसे कमजोर थे। यही नहीं हमारे घर में बच्चे भी कम थे। एक लड़का और एक लड़की। यानी की संख्या बल में भी हम पिट जाते थे। हमारी माँ हमेशा बीमार रहती थी। लिहाजा न भुजाओं से और न ही गले से हम कोई युद्ध जीतने की स्थिति में थे। जब कभी मोहल्ले में हमारा किसी बच्चे से विवाद होता, घर पर पिटाई हमारी ही होती, फिर चाहे गलती किसी की भी क्यों न रही है। हमें विवाद से बचने की सलाह दी जाती। घर से बाहर हमारी घिग्घी बंधी रहती थी इसलिए सारा उबाल घर के भीतर जाया हो जाता था। आज भी जब कभी देश के शीर्ष नेतृत्व की तरफ देखता हूँ तो मुझे अपने घर की याद आ जाती है। पाकिस्तान दुम ठोक दे तो हमारे यहां प्यालियों में तूफान आ जाता है। हम पाकिस्तान से भले ही साफ-साफ बात न कर सकें, देश के अन्दर बवंडर उठा देते हैं। अफजल गुरू की फांसी की फाइल इधर से उधर धूल खाती, रंग उड़ाती घूम रही है पर हम घर में हिन्दूवादियों की पलस्तर उधेड़ रहे हैं। हम बाहर नहीं गरज सकते, इसलिए घर में बरसते हैं। आखिर वह कौन से डर हैं, जो हमारे बाप को एक बार मरने के बजाय बार-बार किस्तों में मरने के लिए विवश किए हुए थे। महाभारत की कहानी हमने भी पढ़ी थी किन्तु उसका कोई असर हम पर नहीं हुआ था। रामायण में वनवासी राम की वानर सेना और रावण की त्रिलोकविजयी चतुरंगी सेना के बीच हुआ धर्मयुद्ध और उसकी परिणति भी हमें प्रभावित नहीं कर पाती। फिर क्या मतलब है इस तरह के धर्मग्रंथों से जनता को बहलाने का? क्या हमारी पूरी मर्दानगी समाज में अलग-थलग पड़ गए प्रेमी युगल को मौत के घाट उतारने, पाकेट मार की धज्जियां उड़ाने और भीड़ की शक्ल में सरकारी तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तक ही सीमित है? पत्रकारिता भी अब रसूख वालों की बांदी हो गई है। ऊपर महल के लोगों के इसमें शामिल होने के बाद से आलम यह है कि फाइल के चलने से पहले ही उसके पहुंचने की खबर आ जाती है। इसे खोजी पत्रकारिता कहते हैं। खबर आई कि अफजल गुरू की फाइल गृहमंत्रालय ने राष्ट्रपति को भेज दी है। फाइल में संसद हमले के मास्टरमाइंड को क्षमादान नहीं देने के सिफारिश की गई है। इसका जोरदार स्वागत हुआ। यूपीए की तारीफ में कसीदे काढ़े गए। गृहमंत्री का इकबाल बुलंद हो गया। संपादकीय तक लिख दिए गए। बाद में खबर आई कि फाइल अभी सरकी नहीं है। हाइप क्रिएशन का इससे बड़ा उदाहरण अब तक देखने में नहीं आया है। सरकार सूचना लीक करके शायद यह देख रही थी कि अफजल की फांसी बरकरार रखने का फैसला करने पर जनता की प्रतिक्रिया क्या होगी। सो उसने मिलीजुली प्रतिक्रिया देख ली। अब किस बात की देर है?

शाबास मधुसूदन

मधुसूदन दीप नाम के एक और ध्रुवतारा दुर्ग के आकाश में स्थापित हो गया। अमनदीप की तस्वीर से प्रेरणा लेकर शक्तितोलन की दिशा में आगे बढ़ने वाले मधुसूदन ने एकलव्य जैसी निष्ठा के साथ अपने कदम आगे बढ़ाए और शरीर सौष्ठव से भारोत्तोलन और फिर शक्तितोलन तक पहुंच गया। वह अभी अभी बालिग हुआ है और उसके सामने संभावनाओं का अनंत आकाश है। मधुसूदन की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है कि वह एक साधारण रिक्शाचालक के परिवार से है। जिनका बॉडी बिल्डिंग या वेट लिफ्टिंग से वास्ता रहा है, उन्हें इस बात का बाखूबी पता होगा कि यह खेल एक अकेला बालक नहीं खेलता। इसमें उसका पूरा परिवार धीरे-धीरे सुलगता है। हम सभी ने महाबली खली के बारे में पढ़ा है। जिला पुलिस के शरीर सौष्ठव के खिलाड़ी पी सोलोमन के बारे में भी पढ़ा है। हमने देखा है कि किस तरह एक परिवार के सभी सदस्य अपनी थाली से एक एक कौर निकालकर अपने एक सदस्य के लिए आवश्यक खुराक जुटाता है। किस तरह उसके शरीर में बढ़ने वाली पेशियों की सरसराहट अपने भीतर महसूस करता है। मधुसूदन के लिए तो यह और भी कष्टदायी था। एक तो नन्ही सी उम्र ऊपर से अभावों का परिवार। जब उसकी उम्र के लड़के केवल बाल संवारते, स्टाइल मारते घूमते हैं तब वह पूरी निष्ठा से अपने खेल के प्रति समर्पित हो गया। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने छोटी उम्र में ही एक होटल में नौकरी की। पढ़ाई लिखाई के साथ साथ उसने अपनी हाबी की साधना जारी रखी। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सफलता किसी खास करियर में नहीं छिपी होती। आप किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। शर्त सिर्फ यही होती है कि आपकी उसमें रुचि हो, आप उसमें स्वयं को साबित करने के लिए पूरी ताकत से जुट जाएं और किसी भी सूरत में अपना ध्यान बंटने न दें। फिर चाहे वह पहाड़ चढ़ने का शौक हो, घुड़सवारी का, शक्तिशाली बनने का शौक हो या साहब बनने का, आपकी मंजिल आपसे अधिक दूर नहीं होती। आधे अधूरे मन से की गई पढ़ाई से आप डाक्टर-इंजीनियर भी बन जाएं तो अपने लिए वह खास जगह नहीं बना सकते जिसका लोग छात्र जीवन में सपना देखा करते हैं। देश में लाखों आईपीएस हैं किन्तु किरण बेदी जैसी अफसर गिनती के। कुछ ऐसा ही आईएएस, चिकित्सा, विज्ञान या किसी भी अन्य क्षेत्र में है। लोग एक मुकाम पर आकर ठहर जाते हैं और भीड़ में खो जाते हैं किन्तु पी. सालोमन और मधुसूदन जैसे लोग निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं और उनका पद नहीं उनका नाम एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह ज्वाजल्यमान बना रहता है। ठीक ध्रुवतारे की तरह जो लाखों करोड़ों तारों के बीच अपनी नाम से पहचाने जाते हैं।

टीचर की बेंत

कुछ दिन पहले हम वैष्णोदेवी प्रवास पर थे। खा-खाकर, अलसा कर मुटाए लोग भी यहां आते हैं। कुछ बहुत छोटे बच्चे होते हैं और थोड़े बुजुर्ग भी। ऐसे लोगों के लिए पहाड़ों पर चढ़कर माता के दर्शन करना मुश्किल होता है। लिहाजा यहां डोली, घोड़ी और पिट्ठू का इंतजाम है। डोली को चार से छह इंसान मिलकर उठाते हैं जबकि पिट्ठू उस व्यक्ति को कहते हैं जो अपने कंधों पर सामान, बच्चे यहां तक कि बड़ी उम्र के लोगों को भी ढोते हैं। यहीं दिखा बेजुबान जानवर पर होता जुल्म जिसे सभ्य समाज क्रुएल्टी टुवर्ड्स एनीमल्स कहता है। एक कमजोर सी घोड़ी पर जब एक बच्ची को बिठाया गया तो वह बिदक गई और आगे जाने से इंकार करने लगी। हिनहिना कर आगे पीछे होती घोड़ी से जब बच्ची को उसके अभिभावकों ने उतरवा लिया तो घोड़ी वाला छड़Þी लेकर घोड़ी पर पिल पड़ा। बेजुबान जानवर खामोशी से मार खाता रहा। क्या पता वह थक चुकी हो, उसकी पीठ पर काठी चुभ रही हो या कोई और तकलीफ हो। कुछ कुछ ऐसा ही स्कूलों में दिया जाने वाला कार्पोरल पनिशमेन्ट है। बच्चे की ड्रेस गंदी है, जूतों में पालिश नहीं लगी, होमवर्क पूरा नहीं किया और टीचर बेंत लेकर उसपर टूट पड़ता है। बेचारा तीसरी-पांचवीं का बच्चा बोल भी नहीं पाता कि मम्मी की तबियत ठीक नहीं, इसलिए कपड़े नहीं इस्त्री हुए। परिवार किसी शादी में गया था इसलिए होमवर्क पूरा नहीं हुआ। वह बेजुबान जानवर की तरह खड़ा-खड़ा मार खाता रहता है। इन दोनों ही तरह के प्रकरणों के खिलाफ कानून हैं किन्तु उनका पालन नहीं होता। घोड़ी, घोड़ीवाले की मिल्कियत है इसलिए वह उसे पीट सकता है। बच्चे के माता-पिता ने उसे जन्म दिया है इसलिए वे उसे पीट सकते हैं, उसे पीटने के लिए शिक्षकों को उकसा सकते हैं। इसी सोच के चलते कुछ लोग बीवी को पीट लेते हैं। इस मामले में समाज भी पीछे नहीं। वह सामाजिक अनुशासन का स्वयंभू कोर्ट है। समान गोत्र या भिन्न जाति में विवाह करने पर वह दोषी को बेंत मारने, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या फिर सीधे मृत्युदण्ड देने के लिए स्वतंत्र है। यहां हम यह भूल जाते हैं कि सजा से केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं होती बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचती है। इंसान तो इंसान, जानवर भी अभिमानी होते हैं। मारपीट या सार्वजनिक प्रताड़ना वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे खामोशी से आंसू बहाते हैं। खाने की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं और कभी कभी इसी तरह अपनी जान दे देते हैं। कोलकाता के एक नामी स्कूल ला मार्तिनिए के मेधावी छात्र रोवनजीत ने भी शायद सिर्फ इसीलिए मौत को गले लगा लिया कि उसके आत्मसम्मान को ठेस लगी थी। मारपीट और अपमान सहकर केवल ढीठ ही खामोश रहते हैं, फिर चाहे आप उसे कोई भी नाम दो। जिनमें आत्मसम्मान होता है वे या तो विद्रोह कर देते हैं या फिर खुद मिट जाते हैं। फैसला आपको करना है कि आप क्या चाहते हैं।

पापा कसम, हम झूठ नहीं बोलते

माँ कसम वाले देश में अंतत: एक ऐसा टीवी धारावाहिक आ ही गया जिसका एक प्रमुख किरदार बात बात में पापा कसम कहता है। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित लापतागंज नाम के धारावाहिक में बिजी पाण्डे बात-बात पर पापा कसम कहता है। वैसे तो इस धारावाहिक को शुरू हुए काफी अरसा हो गया है किन्तु आज इसका विशेष उल्लेख इसलिए कि आज पापा-डे यानी कि फादर्स डे है। आज उसी बाप का दिन है जिसका मौजूदा परिवारों में एक ही काम रह गया है, घर चलाने के लिए पैसे कमा कर ले आना। वरना पर्दे से लेकर चादर तक, राशन से लेकर मेन्यू तक, फर्नीचर से लेकर गाड़ी तक कहीं भी उसकी मर्जी नहीं चलती। हालांकि अब महिलाएं भी पुरुषों के कंधे से कंधा रगड़ रही हैं पर घर चलाने की जिम्मेदारी आज भी पापा लोगों के ही कांधे पर है। उसकी कमाई पर आज भी पहला हक परिवार का है। विवाह की वेदी पर खाई गई कसम को वह आज भी निभाता चला जा रहा है। कम से कम इस मामले में उसकी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है। पर ऐसा नहीं है कि उसकी जिन्दगी बदली नहीं है। पहले वह न केवल परिवार के भरण पोषण का जिम्मेदार होता था बल्कि परिवार का मुखिया भी होता था। कहलाता तो वह आज भी घर का मुखिया ही है किन्तु उसकी यह भूमिका अब हाशिए पर है। माँ-बेटियां मिलकर जो भी फैसला करती हैं, वह उसके लिए बाध्यकारी होता है। हाल ही में इसका एक उदाहरण देखने को मिला। नए पुलिस कप्तान के निर्देश पर मजनू पकड़ अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल, पार्क, सिनेमा हाल और मॉल पुलिस के निशाने पर हैं। पुलिस ऐसे स्थानों से न केवल मनचले लड़कों को बल्कि फैशनपरस्त लड़कियों की भी धरपकड़ कर रही है। ऐसे ही एक मामले में पुलिस ने दो जोड़ों को पकड़ा। यह जोड़ी क्लास 10-11 की थी। जब उनके माता पिता को समझाइश देने की कोशिश की तो पापा कसम, बाप बेजुबान जानवर की तरह खड़ा रहा। जो कुछ भी कहना सुनना था माँ ने ही बोला-सुना। एक अन्य मामले में यहां के एक तकनीकी संस्थान में अध्ययनरत तीन लड़कों को पुलिस पकड़ लाई। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे सभी बारहवीं में सप्लीमेन्टरी सहित सेकण्ड डिविजन में पास थे किन्तु उनकी जिद और मम्मी की मर्जी के आगे पापा की एक नहीं चली थी और लाखों रुपए डोनेशन देकर उन्होंने उनका एडमिशन इस निजी कालेज में करवाया था। पापा खूब समझते थे कि बेटा यहां गुलछर्रे उड़ा रहा है फिर भी वह परिवार के दबाव के आगे विवश थे और प्रतिमाह बेटे को 5 से 10 हजार रुपए खर्चा भेज रहे थे। इसी खर्चे का प्रताप था कि बेटा अपनी गर्लफ्रेंड्स को महंगे गिफ्ट दे रहा था, उन्हें मॉल घुमा रहा था, आईनॉक्स में पिक्चर दिखा रहा था। शर्ट-पैंट और जूते तो दूर चड्डी बनियान तक ब्रांडेड पहन रहा था। उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘नमक का दरोगा’ वाली कहानी पढ़ा हुआ बाप रिश्वत खा रहा था। पर आज वह खुश है। बच्चों ने सुबह सुबह हैप्पी फादर्स डे कहा है। शाम की पार्टी ड्यू हो गई है। बकरे का बाप आखिर कब तक खैर मनाएगा।

पुलिस, कुत्ता और आम आदमी

आॅनर किलिंग के मामले में हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को जमकर फटकार लगाई। जस्टिस शिव नारायण धींगड़ा ने कहा कि बॉस का कुत्ता खो जाए तो फोटो लेकर आप पूरा शहर छानते हैं, मगर लोगों को सुरक्षा मुहैया नहीं करा सकते। जब आपको शर्म ही नहीं, तो मानवीयता के बारे में क्या बात की जाए। जस्टिस धींगड़ा का यह बयान दो वर्ष पूर्व 30 मार्च 2008 की उस घटना से जुड़कर आया, जिसमें दिल्ली के पुलिस कमिश्नर का कुत्ता खो गया था और पुलिसवालों ने उसकी तलाश में पूरे शहर को छान डाला था। लोगों को आॅनर किलिंग के मामले में न बचा पाने पर पुलिस की खिंचाई करते हुए जस्टिस धींगड़ा ने कहा कि पुलिस पैसे के लिए संबंधित परिवारों से मिली हुई दिखती है। अदालत ने यह बात तब कही, जब विधिक सेवा सहायता प्राधिकरण की ओर से अधिवक्ता किरण सिंह ने बताया कि अपनी मर्जी से शादी करने वाली एक गर्भवती युवती इन दिनों अपनी सौतेली माँ के हाथों प्रताड़ित हो रही है जबकि पुलिस की कृपा से उसका शौहर जेल में बंद है। मेडिकल रिपोर्ट में लड़की 18 के करीब की बताई गई है जबकि लड़की वालों के कहने पर पुलिस ने 15 साल की किशोरी का मामला दर्ज कर रखा है। पुलिस ऐसा अकसर करती है। तबादले पर आने वाला हर एसपी-आईजी एक ही बात कहता है कि पुलिस आम लोगों की हिफाजत के लिए है। पुलिस अपना व्यवहार सुधारेगी। कर्त्तव्य में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आदि-आदि। किन्तु होता यही है कि मामूली चोरी की रिपोर्ट लिखाने के लिए भी आदमी मोहल्ले के नेता या पत्रकार के संरक्षण में ही थाना पहुंचने की हिम्मत जुटा पाता है। ऐसे लोगों की मौजूदगी में ही पुलिस का व्यवहार ठीक-ठाक रहता है। वरना वह किसे अबे! कहेगी और किसे साला बनाएगी इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। कहते हैं कि काम की अधिकता और बहुत कम आराम के कारण पुलिस तनाव में रहती है, चिड़चिड़ाती है। तो क्या इस तरह से उसका तनाव कम हो सकता है। तनाव कम करने का सबसे बढ़िया नुस्खा तो यही है कि सुबह-सुबह चार काम अच्छे कर लो तो मन दिन भर तृप्त रहता है। व्यवहार अच्छा रहेगा तो अपनी शिकायत लेकर आम आदमी अकेला आएगा। थाने के कामकाज में नेता नुमा लोगों की दखलअंदाजी कम होगी। सब तरफ सुकून होगा। आप अपनी ही आफिस में बार-बार कुर्सी छोड़कर उठने और फोन पर आला अफसरों की बक-झक सुनने से बच जाएंगे। एक बार आजमा कर तो देखें.. फायदा ही फायदा नजर आएगा।

सात खून माफ

‘समरथ को नहीं दोस गुसार्इं’ यह कहावत बहुत पुरानी है। इसका आशय यह है कि जिसमें धन, बल, कला, कौशल से परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने का सामर्थ्य होता है उसके लिए कोई भी अपराध अपराध नहीं होता। उसे किसी बात का दोष नहीं लगता। संभवत: इसी फलसफे को ध्यान में रखकर देश भर में जहां कहीं भी विदेशी या बहुराष्ट्रीय कल-कारखाने लगते हैं वहां इनका विरोध किया जाता रहा है। 70 और 80 के दशक में जहां इन विरोधों को थोड़ी बहुत तरजीह दी जाती थी वहीं अब इन्हें बर्बरता पूर्वक कुचल देने की प्रवृत्ति पनपने लगी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भोपाल की गैस त्रासदी है। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के 1982 के सुरक्षा अंकेक्षण में 30 ऐसे बिंदुओं की तरफ कंपनी का ध्यान आकर्षित किया गया था जिससे जनस्वास्थ्य को खतरा हो सकता था। इन बिंदुओं पर अमरीका स्थित कंपनी के प्लांट में तत्काल कदम उठाए गए किन्तु भोपाल स्थित इकाई में इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 3 दिसम्बर 1084 को इसके परिणाम भी आ गए। दरमियानी रात रिसे मिथाइल आइसोसायानेट गैस की चपेट में भोपाल के 5,00,000 लाख लोग आ गए जिसमें से लगभग 3000 लोगों की तत्काल मौत हो गई। तीन सप्ताह में मृतकों की संख्या 8000 तक पहुंच गई। कालांतर में इतने ही और लोगों की मौत हो गई। सरकार ने क्या किया? कंपनी के सीईओ वारेन एंडरसन को सुरक्षित देश के बाहर भेज दिया जबकि वह गंभीर आपराधिक लापरवाही का दोषी था। प्लांट साइट पर तब से आज तक सैकड़ों टन विषैले पदार्ष लावारिस पड़े हैं जिससे भूजल संक्रमित होता रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोई इकलौता हादसा है। देश भर में इस तरह के हादसे होते रहे हैं और सरकारें विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की नैतिक जिम्मेदारी के तहत आम भारतीयों की जान माल का सौदा करती रही है। 24 सितम्बर 2009 को कोरबा के बालको चिमनी हादसे में 35 लोगों की मौत हो गई। चिमनी का निर्माण चीनी कंपनी शैनडांग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन द्वारा गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड के माध्यम से किया जा रहा था। हादसे के तुरन्त बाद इन फर्मों के विदेशी नागरिकों एवं तकनीशियों को सुरक्षा के वास्ते सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया जबकि जनआक्रोश को शांत करने बालको के उपाध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया। खैर यह तो हुई सुरक्षा की दृष्टि से की गई कार्रवाई। सरकारें किस हद तक गिर सकती हैं इसका उदाहरण 2 जनवरी, 2006 को उड़ीसा के कलिंगनगर में देखने को मिला। यहां टाटा के प्रोजेक्ट का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासियों पर न केवल पुलिस ने गोलियां चलार्इं बल्कि बाद में पोस्टमार्टम के बहाने मृतकों के हाथ भी काट लिए। प्राकृतिक साधनों-संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, केवल राजस्व और जीडीपी पर नजर रखकर बनाई जा रही योजनाओं की कीमत आखिर कब तक देश का आम नागरिक चुकाता रहेगा? क्या इन मामलों को जानने के बाद भी हम कहेंगे कि प्रत्येक आंदोलन केवल विकास विरोधी मानसिकता की उपज है?

एक मरीज तीन अटेंडेंट

मुन्नाभाई एमबीबीएस 99 फीसदी लोगों ने देखा है। इसलिए इस फिल्म के चरित्रों से लेकर प्रसंगों का उदाहरण यह सोचकर दिया जा सकता है कि हम रामायण या महाभारत से उद्धरण पेश कर रहे हैं। मुन्ना भाई ने अपनी पहली ही क्लास में डीन से सवाल किया था, ‘यदि कोई मरीज मर रहा है तो क्या उसके लिए फार्म भरना जरूरी है?’ सेक्टर-9 के मेन हास्पीटल में यह सवाल बार बार पूछने को जी करता है। अमूमन कोई सर्दी खांसी बुखार दिखाने के लिए इस अस्पताल में नहीं आता। वह तभी आता है जब हालत पतली होती है। थोड़ी बहुत तैयारी के साथ यहां आने वाला मरीज न केवल हक्का बक्का रह जाता है बल्कि हलाकान भी खूब होता है। जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र में प्रति प्राइवेट मरीज कम से कम तीन अटेंडेंट लगते हैं। एक मरीज के आसपास जो उसे उठा सके, बिठा सके, लिटा सके, थुका सके, व्हीलचेयर पर बैठाकर ले जा सके, स्ट्रेचर पर डाल सके। दूसरा अटेंडेंट कागजी कार्रवाई करने के लिए भागता दौड़ता रहे। कभी दवा तो कभी इंजेक्शन के लिए हास्पीटल सेक्टर मार्केट के चक्कर लगा सके। तीसरा व्यक्ति सबसे अहम होता है। उसकी ड्यूटी मरीज को कैजुअल्टी तक लाने के बाद सीधे बजरंगबली की शरण में पहुंचने की होती है। वह वहीं बैठकर तब तक हनुमानजी का स्मरण करता रहे जब तक कि मरीज सही सलामत अस्पताल से डिस्चार्ज न हो जाए। कैजुअल्टी या आपात चिकित्सा के लिए डाक्टर दिखाने की फीस 315 रुपए है। कैजुअल्टी में उपलब्ध चिकित्सक का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं फिर भी इतनी फीस। बहरहाल मामला एक बड़े अस्पताल में इलाज कराने से जुड़ा है इसलिए यह भी माना। यदि डाक्टर ने एडमिट करने के लिए लिख दिया तो तत्काल पांच हजार रुपए जमा करवाएं। रसीद प्राप्त करें तभी आगे की कार्रवाई होगी। अस्पताल पहुंचते समय यदि मरीज की तरफ से ध्यान मिनट भर के लिए भी हटा हो तो गेट के पास खड़ी एटीएम मशीन जरूर दिखी होगी। एक और एटीएम मशीन काफी हाउस के आसपास कहीं है। अच्छा होता कि एक डेबिट-क्रेडिट कार्ड रीडिंग मशीन काउंटर पर ही रख ली जाती। कम से कम भागदौड़ से तो मुक्ति मिलती। वैसे जिनके पास इतने आदमी फालतू नहीं हैं, उनके लिए भी यहां व्यवस्था है। यहां भाड़े पर अटेंडेंट मिल जाते हैं। इन अटेंडेंटों की सेवा हासिल करना अच्छा रहता है। वे अस्पताल के सभी अली-गली से परिचित हैं। यही नहीं कौन सा काम किस तरह आसानी से हो सकता है इसकी भी उन्हें जानकारी होती है। अस्पताल के कर्मचारियों से लेकर सुरक्षाकर्मियों तक से इनकी पहचान होती है जिसके कारण अटेंडेंट और फुड पास से भी मुक्ति मिल जाती है। ऐसा नहीं है कि अस्पताल को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास नहीं है। अस्पताल में क्या-क्या और कैसा-कैसा होना चाहिए इसकी जानकारी आपको यहां हर गलियारे में लगे डिस्प्ले फ्लेक्स पर मिल जाएंगे। यह बात और है कि इसका लेश मात्र भी असर यहां के कर्मचारियों पर नहीं होता।

ओहदे का गुरूर

मेंगलुरु में 22 मई को हुआ भीषण एयर इंडिया विमान हादसा टाला जा सकता था अगर विदेशी कैप्टन ने को-पायलट आहलूवालिया की सलाह मान ली होती। इस हादसे में 158 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच बातचीत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि को-पायलट एचएस आहलूवालिया ने कैप्टन ज़्लॉट्को ग्लूसिका से लैंड न करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कम से कम दो बार यह अनुरोध किया, मगर कैप्टन ने उनकी सलाह की अनदेखी की। सबसे बड़ी बात यह कि को-पायलट ने समय रहते यह सलाह दे दी थी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने लैंड न करने की सलाह तभी दे दी थी जब विमान 800 फुट की ऊंचाई पर था। आहलूवालिया मेंगलुरु के ही थे और उन्हें वहां के रनवे की पूरी जानकारी थी। वह 66 बार वहां लैंड कर चुके थे। एटीसी सूत्रों के मुताबिक, आहलूवालिया ने कम से कम दो बार अपने कमांडर से अनुरोध किया कि वह थोड़ी देर मंडराते रहें। संभवत: उन्हें एहसास हो गया था कि विमान या तो ज्यादा तेज है या ज्यादा ऊंचाई पर है-यानी एप्रोच करने लायक स्थिति में नहीं है। ऐसे में मंडराते रहना सबसे मान्य तरीका होता है ताकि दूसरी कोशिश में विमान सुरक्षित लैंड कराया जा सके। मगर, आहलूवालिया की सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया और नतीजा भीषण हादसे के रूप में सामने आया। ऐसा अकसर होता है। चलती ओहदे की ही है फिर भले ही वह गलत हो। यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब किसी ओहदेदार की ढिठाई की वजह से निरपराध लोगों की जान गई हो। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में एक बार हुक्म हुआ कि फौरन बल भेजा जाए। एक हवलदार ने सकुचाते हुए कहा, साहब इसमें खतरा है। इन सड़कों पर लैंड माइन्स हो सकती हैं। पर लताड़ पड़ी। उल्लू का पट्ठा कह दिया गया। डरपोक बताकर उसे पीछे थाने में छोड़ दिया गया और रंगरूटों को लेकर ट्रक रवाना हो गया। आगे बारूदी सुरंग तो नहीं मिली किन्तु वहां पेड़ गिराकर एम्बुश लगाया गया था। ड्राइवर के कानों में हवलदार की बातें तब भी गूंज रही थीं। उसने गाड़ी धीमी की और तेजी से यू टर्न देकर वापस दौड़ा दिया। पीछे से हमले हुए किन्तु वे उसकी जद से बाहर थे। जानते हैं उस हवलदार का क्या हुआ? उसे काली जुबान वाले की संज्ञा दे दी गई। पिछले वर्ष के पूर्वार्द्ध में कांकेर के जंगल वारफेयर कालेज जाने का सौभाग्य मिला था। वहां जंगलों की रणनीति पर चर्चा के दौरान यह बात उभर कर सामने आई थी कि जवानों को चुस्त दुरुस्त करने की जरूरत है किन्तु इनके आला अफसरों को जंगल वारफेयर सीखने की कहीं ज्यादा जरूरत है। ये जवान चाहे कितने भी तेज तर्रार और समझदार क्यों न हो जाएं वे वरिष्ठ अफसरों का हुक्म बजाने के लिए बाध्य हैं। यदि रणनीतिकारों से चूक होगी तो जवानों को बचाना मुश्किल होगा। तब से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है, बस्तर से लेकर राजनांदगांव तक काफी खून खराबा हो चुका है और अब तो केन्द्र सरकार भी किंकर्त्तव्य विमूढ़ की स्थिति में आ गई है। क्या ओहदेदार का ढीठ होना जरूरी है?

Monday, May 31, 2010

जान का दुश्मन कैमरा मोबाइल

मध्यप्रदेश के छतरपुर में पुलिस वालों ने एक जोड़े को पार्क में पकड़ा। उन्होंने छोरे का कैमरा मोबाइल छीन लिया और उसे मारपीट कर भगा दिया। छोरी को वे एक खाली दुकान में ले गए और वहां उसकी अश्लील वीडियो बनाई। इसके बाद लड़की को भी छोड़ दिया। अब जोड़े की जान कैमरा मोबाइल में अटक गई। वे उसे वापस पाने के लिए चिरौरी-विनती करने लगे। पुलिस को इसी का इंतजार था। उन्होंने दस हजार रुपए की मांग कर दी। यह एक बड़ी रकम थी। ऊपर से पैसे देने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि एमएमएस का अस्तित्व मिट जाएगा या मोबाइल वापस मिल जाएगा। हिम्मत करके उन्होंने इसकी रिपोर्ट दर्ज करा दी। बस फिर क्या था। पुलिस ने संगठित गिरोह की तरह उन्हें डराना धमकाना शुरू कर दिया। किशोरी और उसकी 14 वर्ष की छोटी बहन इतना डर गई कि अपने टीचर पिता का सामना करने के बजाय उन्होंने आत्महत्या कर ली। पुलिस वाले सस्पेंड हो गए। उनसे कैमरा मोबाइल बरामद हो गया किन्तु एमएमएस डिलीट हो चुका था। एक अन्य घटना में पांच साल पहले वडोदरा शिक्षा महाविद्यालय में एक महिला प्रशिक्षार्थी ने अपनी सहेली का बाथरूम में एमएमएस बना लिया। इसे उसने अपने मित्र को भेज दिया। मित्र ने एमएमएस कुछ और लोगों को भेज दिया। मामला पकड़ में आया पर कुछ खास कार्रवाई नहीं हुई। पहला मामला वसूली का था जबकि दूसरा मामला मजा लेने का। चित्रकारी और मूर्तिकला आरंभ से ही मनुष्य की फितरत में शामिल है। जब कैमरा नहीं था लोग पोट्रेट बनवाया करते थे। फिर स्टिल कैमरा आया। फोटोग्राफी तब भी आसान नहीं थी। आम लोगों के लिए उतनी प्राइवेट भी नहीं थी। वे फोटो तो खींचते थे किन्तु फिल्म धुलवाने और प्रिंट बनवाने के लिए वे स्टूडियो या कलर लैब पर निर्भर थे। मूवी कैमरा आम आदमी के लिए नहीं था। लोगों ने मजबूरी में अपनी आदिम इच्छाओं को दबाए रखा था। इस बीच डिजिटल फोटोग्राफी का दौर शुरू हो गया। फोटोग्राफी न केवल सस्ती हो गई बल्कि प्राइवेसी की गारंटी हो गई। स्टूडियो या प्रोसेसिंग लैब का झंझट खत्म हो गया। जब चाहो खींचो, चुटकियों में नेट पर डालो, साथियों को भेजो। पकड़े जाओ तो चुटकियों में डिलीट कर दो। अकेला कैमरा संदिग्ध उपकरण था। इसकी भी राह निकल आई। कैमरा मोबाइल में इनबिल्ट हो गया। अब कोई नहीं बता सकता कि आप फोन पर बात कर रहे हैं या किसी की वीडियो रिकार्डिंग कर रहे हैं। लोग इसका खूब लाभ उठा रहे हैं। अब कोई भी इससे सुरक्षित नहीं। कब कौन किसकी एमएमएस बना लेगा कहना मुश्किल है। अब तो बस एक ही चारा रह गया है कि लोग जेम्स बाण्ड की फिल्में देखें। हर किसी पर शक करना सीखें। बेडरूम-बाथरूम का खास ध्यान रखें। खिड़की, वेन्टीलेटर की नियमित चेकिंग करें, दरवाजे, दराज के हैण्डल, नॉब, की होल्स, गुलदस्ता सबकुछ चेक करने के बाद ही अपनी प्राइवेसी के प्रति सुनिश्चित हों। ऐसा करते समय इस बात का भी ख्याल रखें कि चीनी स्पाई कैमरा, कैमरा पेन, कैमरा बटन का आकार एक-डेढ़ सेन्टीमीटर तक छोटा हो सकता है। हाईटेक जिन्दगी मुबारक हो।

Friday, May 28, 2010

बैल की सवारी

टीवी पर राखी के स्वयंवर रचाने से बहुत पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गांव की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर रच कर अपने लिए दूल्हे का चयन किया था। अपने विवाह को खास बनाने के लिए इनोवेटिव होना प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है। पैसे वाले लोग आसमान में, अंतरिक्ष में, समुद्र की गहराईयों में विवाह करते हैं। गांव-खेड़े का आदमी इतना इनोवेटिव नहीं है, न ही उसके पास इतने साधन हैं। वे तो पुराणों में प्रेरणा की तलाश करते हैं। इसलिए अन्नपूर्णा ने सीता से प्रेरणा लेकर अपने लिये वर चुना तो बालोद के कृषक पुत्र पोषण साहू ने शिव पार्वती विवाह से प्रेरणा लेकर बैल पर बारात निकाली। उन्होंने दल्लीराजहरा की प्रेरणा के साथ बैल पर बैठकर ही फेरे लिए। यही नहीं दुल्हन के साथ घर पहुंचने के बाद टिकावन की रस्म भी उन्होंने बैल पर बैठकर ही अदा की और मंडप के फेरे लिए। कृषक पुत्र के जीवन में बैल का महत्व सर्वोपरि है। यदि उसने अपने विवाह के साथ भी इसका संबंध जोड़े रखा तो विवाह संस्था के प्रति उसके समर्पण और निष्ठा को ही रेखांकित करता है किन्तु यह बात सामाजिक बैलों की समझ में आए तब न। समाज के नाम पर कुछ बैलों ने इसपर आपत्ति दर्ज करा दी है। उनका कहना है कि यह भगवान शिव की सवारी है और पोषण ने उनकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई है। यह वही समाज है जो सब्जी मण्डी में घुस आए बैल तो क्या सांड को भी लाठी से पीटता है। जो विघ्नहर्ता गणेश के वाहन को चूहा मार दवाई खिलाकर मारता है। जो माता दुर्गा के वाहन का शिकार कर उसपर पांव धर कर फोटो खिंचवाता है। जो यमराज के वाहन भैंस की बलि देता है। शीतला माता के वाहन गधे पर भार ढोता है और उसे गधा होने का उलाहना देता है। अपनी नस्ल के बेवकूफों को भी गधे की संज्ञा देता है। जिस बैल की चिंता में वे दुबले हो रहे हैं उसी बैल को वह हल में, गाड़ा में, कोल्हू में जोतता है। क्या बेहूदगी है? विरोध करने को दुनिया में और कुछ नहीं मिला। क्या बैल की सवारी करने मात्र से पोषण ने खुद को शिव और अपनी पत्नी प्रेरणा को पार्वती के रूप में पेश कर दिया। यदि यह सही है तो क्या गांव-गांव में बारिश के दिनों में भैंसों की सवारी करने वाले बच्चे यमराज के क्लोन होते हैं। दरअसल यह कुढ़न और जलन से प्रेरित विरोध है जिसका लाभ तो कुछ नहीं होता, अपितु नुकसान ही अधिक होता है। आप सोच भी नहीं पाए, और किसी ने कर के दिखा दिया। इसका लाभ किसको मिला। आपने विरोध किया और पोषण-प्रेरणा विवाह समाचार बन गया। जिन्हें कानों कान खबर नहीं होनी थी उन्हें भी पूरे तफसील के साथ घटना की खबर हो गई। इतिहास गवाह है कि विवादित फिल्म और विवादित पुस्तकें हिट भले न हुई हों उन्हें चर्चित होने का लाभ अवश्य मिला है। इस विरोध के पीछे भी कहीं यही मंशा तो नहीं...

Tuesday, May 25, 2010

एथिकल ट्रीटमेन्ट आफ एनिमल्स

क्या घोड़े को तांगे में जोता जाना क्रूरता है? क्या कुत्ते के गले में पट्टा डालना क्रूरता है, क्या बैलों को हल में, गाड़ा में या कोल्हू में जोतना उनके प्रति अपराध है? विकास के क्रम में इंसानों ने सबसे पहले मवेशियों को साधा। उनके साथ सहअस्तित्व का समीकरण तैयार किया और दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए। पशु अपनी क्षमता के अनुसार इंसान का काम करता है और इंसान अपने सामर्थ्य के अनुरूप उसकी देखभाल करता है। इंसान का यह व्यवहार केवल पशुओं के प्रति नहीं है बल्कि प्रत्येक उस इंसान के प्रति भी है जिससे वह काम लेता है। खेतों में खटने वाला खेतिहर मजदूर, चिलचिलाती धूप में, मूसलाधार बारिश में लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाता रिक्शा वाला, ट्रकों से माल उतारता-चढ़ाता हमाल सभी अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पंथी नृत्य में कोई शीर्ष पर चढ़कर जोहार करता है तो कोई नीचे कईयों का बोझ लिए मांदल की थाप पर थिरक रहा होता है। इस व्यवस्था के खिलाफ बोल-बोल कर असंतोष तो फैलाया जा सकता है किन्तु इसे बदला नहीं जा सकता। आदिम सभ्यता ने अगर मवेशियों का उपयोग किया तो अपने समाज में उन्हें यथेष्ट सम्मान भी दिया। पशु पक्षियों को समर्पित तीज त्यौहारों की एक पूरी शृंखला ऐसे समाज में मिलती है। भारतीय समाज ने इस दिशा में कई निर्णायक पहल किये। जिन मंदिरों की शुचिता का वह पूरा ध्यान रखता था वहां उसने मवेशियों के सींग से बने सींगा, खाल से बने नगाड़ों को जगह दिलाई। चांवर में मोर पंख का उपयोग किया। गाय-बैल को तो उसने इतना सम्मान दिया कि एक को माता और दूसरे को पूज्य माना। कभी इन्हें पांव भी लग गया तो प्रायश्चित्त करता आया है। इनकी खाल के जूते पहनना तो बहुत दूर की बात है। अब जाकर पाश्चात्य संस्कृति में रंगे हुए लोग चमड़े के जूते, चमड़े की बेल्ट, चमड़े के जैकेट-दस्ताने, हैण्ड बैग, वालेट, कारों और ड्राइंग रूम में लेदर अपॉल्स्ट्री का उपयोग करता है और एथिकल ट्रीटमेन्ट आॅफ एनिमल्स की बातें करते हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि खालों को निकालने की प्रक्रिया क्या होती है। भारतीय संस्कृति में खाल मरे हुए मवेशियों की उधेड़ी जाती थी। जितना, जैसा निकला उसीसे काम चला लिया। पर नई पीढ़ी पेटेन्ट लेदर, साफ्ट लेदर, वनपीस स्प्रेड की भाषा बोलती है। इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खाल उतारने की पद्धति अलग होती है। जीवित मवेशियों की पूंछ काटी जाती है, सींग तोड़ दिए जाते हैं और उन्हें जीवित ही उलटा टांग कर उनके गले में छोटा सा छेद कर दिया जाता है। ऐसे मवेशियों की मौत खून के रिसने से होती है। पूरा शरीर खिंच कर लंबा हो जाता है। इस तरह से प्राप्त किए गए चमड़े का उपयोग करने वाले यदि शुद्ध-शाकाहारी भी हैं तो क्या। इनसे तो वे लोग सहस्त्र गुणा बेहतर हैं जो मांस, मछली का सेवन उदरपोषण के लिए करते हैं। कम से कम आहारचक्र का संतुलन तो बना रहता है।

ठीकरा फोड़ना जरूरी क्यों?

हमारे अपने पुत्र को छोड़कर मोहल्ले के सभी लड़के आवारा टाइप के हैं। हमारा बेटा इसलिए मन लगाकर पढ़ाई नहीं करता क्योंकि आवारा लड़के उसे खेलने के लिए ले जाते हैं। आवारा लड़कों के साथ रहकर वह मारामारी सीख रहा है वरना हमारा लड़का तो ऐसा कर ही नहीं सकता। यह एक माँ की सोच हो सकती है किन्तु जब यही सोच संस्थागत हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। नए दौर में देशी सबकुछ खराब है और विदेशी सबकुछ अच्छा। खान-पान, रहन-सहन, सोच, गीत-संगीत, परिधान सबकुछ विदेश का अच्छा है। पूरा बाजार इसी सोच पर काम कर रहा है। ऐसे में एक विमान दुर्घटना हो जाए और उसका ठीकरा एक विदेशी पायलट के सिर फोड़ने की कोशिश की जाए तो गुस्सा आ ही जाता है। देशी ‘चिंतामणियों’ के बयान पढ़ रहा हूं कि देश के साढ़े पांच हजार पायलटों मेें से 10 फीसदी यानी कि लगभग साढ़े पांच सौ पायलट विदेशी हैं। क्यों हैं? क्या एयर इंडिया इनकी शक्ल का इस्तेमाल अपने विज्ञापन में करता है? नहीं! ऐसा नहीं है। दरअसल देश के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा चाहिए। देशी पायलटों को मोटी तनख्वाह चाहिए। सुख सुविधाएं चाहिए। इसके बाद भी जब उनकी इच्छा होगी वे हड़ताल पर चले जाएंगे। विदेशी पायलटों के साथ ये दिक्कतें नहीं हैं। वे कांट्रेक्ट पर काम करते हैं। पुसाया तो किया, नहीं पुसाया नहीं किया। पर एक बार एग्रीमेन्ट कर लिया तो उसकी शर्तों का वे पूरा सम्मान करते हैं। खरबूजा दिखाकर अपना रंग बदलवाने की कतार में नहीं खड़े हो जाते। मैंगलोर दुर्घटना में जिस पायलट की मृत्यु हो गई वह सर्बिया मूल के थे। 55 वर्षीय ज्लातको ग्लूसिया दस हजार घंटों की उड़ान पूरी कर चुके थे। कहा जा रहा है कि विदेशी पायलट हमारे देश की भौगोलिक विविधता से परिचित नहीं हैं। उनका उच्चारण ठीक नहीं है इसलिए उड़ान नियंत्रण कक्ष के साथ उनका तालमेल सही नहीं बैठ पाता। ऐसी बेहूदा बातें कोई सिरफिरा ही कर सकता है। ऐसे में तो भारत आने वाली प्रत्येक उड़Þान में एक भारतीय को बैठाना पडेÞगा। दरअसल अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़ने की कोशिश करना हमारी फितरत में शामिल हो गया है। हादसे कभी भी, कहीं भी हो सकते हैं। हाईवे पर होने वाली ज्यादातर दुर्घटनाओं में अनुभवी ड्राइवर शामिल होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें गाड़ी चलानी नहीं आती या ट्रैफिक सिग्नल समझ में नहीं आता। कोई भी अपनी गाड़ी की चाभी किसी अनाड़ी के हाथ में नहीं देता फिर भी दुर्घटनाएं तो हो ही रही हैं। इसीलिए तो उसे दुर्घटना कहते हैं, हादसा कहते हैं, एक्सीडेन्ट कहते हैं। इसके लिए किसी को दोषी ठहराना ठीक उसी तरह है जैसे गांव में हैजा फैलने पर किसी विधवा को टोनही साबित करने की कोशिश करना। कम से कम बुद्धिजीवी तो इससे बाज आएं।

Friday, May 21, 2010

गृहिणी का गैस सिलिण्डर

महिलाओं के सशक्तिकरण की बातें सुन-सुन कर कान पक गए हैं। समझ में नहीं आता कि वे कमजोर कब थीं। अपने फायदे के लिए उन्हें नेता जब चाहे कमजोर बना लेते हैं, जब चाहे अबला घोषित कर देते हैं और जब चाहे रणचण्डी की संज्ञा दे देते हैं। अब जब पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की बारी आई तो इसमें भी गृहिणी की फर्जी चिंता को साथ में जोड़ दिया गया। हमारा मोहल्ला मध्यमवर्गीय परिवारों का है। कुछ उच्च मध्यमवर्ग के हैं तो कुछ निम्न मध्यमवर्ग के परिवार भी यहां रहते हैं। सभी के घर स्कूल कालेज में पढ़ने वाले बच्चे हैं। माहवारी दस से पंद्रह हजार रुपए की आमदनी में गृहिणी को ढेरों काम निपटाने पड़ते हैं। इसमें पति से लेकर बच्चों तक को पेट्रोल के लिए पैसे देना, महीने का राशन लाना, किराया देना, गैस-बिजली का बिल चुकाना, साग-सब्जी खरीदना, कुछ पैसे भविष्य के लिए जोड़ना तथा थोड़ा पैसा आपातकालीन जरूरतों के लिए रखना होता है। दूध तो कब का लिस्ट से बाहर हो गया है। हालात ऐसे हो रहे हैं कि कभी कोई मेहमान आ जाए तो उसका स्वागत करने से पहले ही उसके जाने की तिथि जान लेने की इच्छा होती है। सभी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। अब पेट्रोल के फिर से पांच-छह रुपये तक महंगा होने की बात हो रही है। उसकी सांस अटकने लगी है। उसका आत्महत्या करने को जी चाहता है। बल्कि देश भर में कुछ लोग सामूहिक रूप से आत्महत्या कर चुके हैं। पर सरकार की बेहयाई देखिए। वह कह रही है कि रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे ताकि गृहिणी को राहत मिले। यह कैसी सोच है जिसमें महिला को केवल रसोई गैस के सिलिण्डर से जोड़ कर देखा जाता है? यह तो हुई उन परिवारों की बात जिनकी कमाई पांच अंकों में है। देश की अस्सी फीसदी आबादी के लिए आज भी चार अंकों का वेतन सपना है। क्या उन्हें इंसानों में गिना जा सकता है? सरकार के लिए वे सिर्फ वोटर हैं। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का सच जानना हो तो लोग अपने साधनों से पता लगाएं कि डीजल और पेट्रोल पर सरकार कितना पैसा टैक्स और ड्यूटी वसूलती है। झूठ और सच का पता खुद-ब-खुद लग जाएगा। पढ़े लिखे मूर्खों को अंतरराष्ट्रीय तेल के भाव दिखाने वाली सरकार की पोल पट्टी खुल जाएगी।

जड़ी बूटी और खनिज सम्पदा

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह समेत कुछ बुद्धिजीवियों ने एक अच्छा सवाल उठाया है। पहली बार कोई मुद्दे की बात उठी है। डॉ रमन सिंह कहते हैं कि देशभर में नक्सलियों का कब्जा उन्हीं जंगलों एवं पहाड़ों पर है जहां खनिज हैं। खनिज संपदा पर कुंडली मारकर नक्सली विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं। हो सकता है वे सही हों। पर नक्सली पहाड़ों में खदान नहीं चला रहे। उत्खनन का कोई मामला आज तक पकड़ में नहीं आया है। अब सवाल यह उठता है कि नक्सली यहां क्यों बैठे हैं? उनका खर्चा कैसे चल रहा है? यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर देने के लिए जान की बाजी लगानी पड़े। डॉ. रमन सिंह स्वयं भेषज चिकित्सक यानी कि आयुर्वेद के डाक्टर हैं। उन्हें खूब पता है कि जिन पहाड़ों के नीचे खनिज दफ्न होते हैं, वहीं तरह-तरह की जड़ी बूटियां उगती हैं। ये बेशकीमती जड़ीबूटियां दुनिया भर में दवा बनाने के काम आती हैं। यही नहीं इन्हीं पहाड़ियों पर गांजे की जबरदस्त खेती होती है। कोई चालीस साल पहले इन वनाच्छादित पहाड़ी इलाकों में कुछ खोजी प्रवृत्ति के लोग व्यापार करने पहुंचे। उनका उद्देश्य ऐसी जगहों पर लंगोटी छाप आदिवासियों को सौदा बेचना नहीं था। उनकी दुकानें जरूर होती थीं किन्तु पीछे धंधा कुछ और होता था। वे आदिवासियों से वनोपज संग्राहक का काम लेते थे। वे इन बेशकीमती जड़ी बूटियों समेत अन्य वनोपज उनसे मिट्टी के मोल हड़प लेते थे और उसे सही बाजार तक पहुंचाकर हजारों रुपए कमाते थे। कालांतर में यह राशि लाखों, करोड़ों तक जा पहुंची है। यह नेटवर्क आज भी जिन्दा है। 20-25 साल पहले इस धंधे पर उगाहू लोगों की नजर पड़ी। वे न तो संग्राहक थे और न ही व्यापार में पूंजी लगाने का उनका कोई इरादा था। वे इन व्यापारियों को धमकाकर उनसे वसूली करने लगे। फिर शुरू हुआ आदिवासी अंचलों में विकास के नाम पर पैसे बहाने का दौर। अब तक माफिया बन चुके इन हफ्ता वसूली करने वालों को नए मुर्गे सरकार ने खुद तैयार कर के दिए। इन्हें ठेकेदारों और कमीशन खोर अफसरों से भी हफ्ता-महीना मिलने लगा। आज यह नेटवर्क बेहद शक्तिशाली है। इन लोगों की पहुंच हर उस जगह है जहां तक सरकार पहुंच सकती है। अब सवाल यह उठता है कि जब वनों को सुरक्षित रखते हुए अरबों रुपए कमाए जा सकते हैं तो खदान खोलने की जरूरत ही क्या है? विकास के लिए कारखाना लगाना ही क्यों जरूरी है? सरकार यदि करोड़ों रुपये मूल्य की जड़ीबूटियों का महत्व नहीं समझती तो यह उसकी गलती है। वनोपज और जड़ीबूटियों से आदिवासियों को उन्हीं के वातावरण में बेहतर जीवन दिया जा सकता है किन्तु यह प्रक्रिया धीमी है। इससे नया उपभोक्ता बाजार भी नहीं खुलता। इससे एकमुश्त मलाई नहीं खाई जा सकती। अपने डिग्रीधारी भाई भतीजों को डायरेक्टर नहीं बनाया जा सकता। मजेदार बात यह है कि इस मामले में सरकार झूठ नहीं बोल रही। फिलहाल वह आधे सच से काम चला रही है। सरकार कह रही है कि उसने किसी निजी या बहुराष्ट्रीय कंपनी को खदानों का पट्टा नहीं दिया। वह इसमें ‘अब तक’ शब्द नहीं जोड़ रही। खदान तो खदान है, फिर चाहे सेल की हो, एनएमडीसी की हो या किसी और की।

Thursday, May 20, 2010

आतंक का भयावह होता चेहरा

आतंक को आतंक से कुचलने का मिशन फेल हो चुका है। भारत ने ही कभी यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि हिंसा से हिंसा खत्म नहीं की जा सकती किन्तु हमने इन सिद्धांतों को कब का भुला दिया है। यदि शक्ति की बात करें तो संप्रति विश्व की सबसे बड़ी ताकत है अमरीका। अमरीका अपना मतलब निकालने के लिए सदैव ताकत का इस्तेमाल करता आया है। अपने दुश्मनों को निपटाने की उसकी कोशिशें कहां तक कामयाब हुई हैं, यह किसी को बताए जाने की जरूरत नहीं। बावजूद इसके ताकत में हमारी न तो आस्था कम हुई है और न विश्वास। हमने कांटे से कांटा निकालने और लोहे से लोहा काटने की उक्तियों को तो खूब याद रखा है किन्तु उससे कहीं अधिक सहूलियत के साथ उस कहावत को भुला दिया है कि विनम्रता सबसे बड़ा हथियार है। नक्सलियों के खिलाफ हमारे प्रयास भी कुछ ऐसे ही हैं। हम न केवल यह लड़ाई आधे मन से लड़ रहे हैं बल्कि बातचीत की पेशकश भी आधे-अधूरे मन से ही कर रहे हैं। आजाद भारत के इतिहास में थोड़ा पीछे लौट कर देखें तो हम पाएंगे कि जिस चम्बल के बीहड़ों में जाने का रास्ता नहीं मिलता था, वहां के बागियों को आगे लाने में गांधीवाद ही सफल रहा था। चीन ने अपनी ताकत दादागिरी से नहीं बढ़ाई। परमाणु हमले का शिकार हुआ जापान राख के ढेर में से उठ खड़ा हुआ। पर हमें यह सब दिखाई नहीं देता। हमें उपभोक्तावादी पश्चिम दिखाई देता है जहां मुंहासे और बरहट का इलाज भी शल्यक्रिया या प्लास्टिक सर्जरी है। अमरीका ने हिंसा को बढ़ावा दिया और आज खुद बारूद के ढेर पर बैठा चेतावनियां जारी कर रहा है। पाकिस्तान ने भारत को परेशान करने के लिए युद्ध, आतंक और हथियारों की होड़ शुरू की जिसमें अमरीका का ही लाभ हुआ। ये डरे हुए पहलवान अब केवल चेतावनियां जारी कर रहे हैं। नई चेतावनी भारत के लिए हैं। आतंकी अब स्कूलों को निशाना बना सकते हैं। यदि एक भी ऐसा हमला हुआ तो क्या होगा इसका खाका खींचने की जरूरत नहीं है। असहाय सरकार ने स्कूलों की सुरक्षा बढ़ाए जाने के निर्देश जारी कर दिए। यह निर्देश कितना नपुंसक है, कहने की भी आवश्यकता नहीं। आप आतंकियों को ठेलते जाइए, वे आपके मर्म स्थलों पर वार करेंगे। क्या अब भी यह कहने की जरूरत है कि आतंक के खिलाफ रणनीति बनाना रक्षा विशेषज्ञों का काम नहीं है।

Tuesday, May 18, 2010

आने को है बूंदों की बारात

दक्षिण-पश्चिम मानसून का चार महीने तक चलने वाला मानसून मेला बस शुरू ही होने वाला है। मौसम विभाग के अनुसार अंडमान के समुद्र में मानसून की मौसम प्रणाली को सक्रिय करने वाली अनुकूल परिस्थितियां बननी शुरू हो गई हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी बीते साल सूखे की मार झेल चुके देश के साढ़े 23 करोड़ किसानों के लिए बड़ी राहत देने वाली है। देश की खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी हुई है और खेती की तमाम गतिविधियों का आधार चार महीने का यह मानसून सत्र होता है। अच्छी मानसूनी बारिश से धान, गन्ना, सोयाबीन और मक्का की बुआई समय पर हो सकेगी और फसल भी अच्छा होने का अनुमान है। सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ छपी यह खबर वैचारिक प्रदूषण की पराकाष्ठा है। क्या बारिश के साथ केवल किसानों की खुशियां जुड़ी हुई हैं। कदापि नहीं। बारिश हर उस प्राणी के लिए राहत और खुशियों की सौगात लेकर आती है जो जीवित है। पेड़ पौधे, जानवर, कीट पतंगे, इंसान सभी के लिए। फिर यह वर्गीकरण क्यों कि मौसम विभाग की घोषणा से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं? तो क्या शहरों में रहने वालों की चेहरे इस खबर से मुरझा गए हैं? लोग पीने के पानी के लिए तड़प रहे हैं। क्या बारिश उनके लिए खुशखबरी नहीं लेकर आ रही? क्या वर्षा का संबंध केवल कृषि से है। दरअसर आंकड़ों की बात करते-करते, संवेदनाशून्य शब्दों से खेलते खेलते हम कब वैचारिक शून्यता के कगार पर पहुंच गए हैं, हमें पता ही नहीं लगा। इसके अलावा इसकी और क्या वजह हो सकती है कि मानसून को केवल किसानों और फसलों से जोड़ कर देखा जाए। अफसोस इस बात का है कि ऐसा हुआ, अकसर होता है और हमें यह अखरता तक नहीं है। वैचारिक प्रदूषण का यह जाल एक दिन में नहीं फैला है। उपभोक्तावादी सोच दिमाग का किस हद तक कचरा कर सकती है, यह इसा जीता जागता उदाहरण है। बहू की बात करते समय हम भूल जाते हैं कि वह बेटी भी है और सास भी होगी। बेटों की बात करते समय भूल जाते हैं कि वह भी कभी दामाद और बाप होगा। उपभोक्तावादी सोच समाज को आयुवर्ग, आय वर्ग, आदि में बांटती है। हर इकाई को अलग-अलग मानकर चलती है। यहां हमें किसानों की याद केवल इसलिए आई कि उनके लिए बारिश का मतलब उनकी कारोबारी सक्रियता से है जिसके साथ एक बड़ा बाजार जुड़ा हुआ है। उनके पीछे मार्केटिंग का क्रिएटिव नेटवर्क जुड़ा हुआ है। वह बारिश को बूंदों की बारात कहने का ‘पंच लाइन’ तो गढ़ सकता है किन्तु बारिश और प्रेम का संबंध नहीं जोड़ पाता। उसे इस बात के पैसे जो नहीं मिले हैं।

रणनीति या बर्बर बलप्रयोग

नक्सलियों ने एक और बड़ा हमला कर दिया। इस बार उन्होंने एक यात्री बस को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उसने एसपीओ और पुलिस वालों को बैठाया था। इससे पहले भी नक्सलियों ने यात्री बसों और टैक्सियों को निशाना बनाया है किन्तु यात्रियों समेत बस को विस्फोट से उड़ाने की यह पहली घटना है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कंवर और केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम कम से कम इस मायने में सच बोल रहे हैं कि नक्सली दबाव में हैं। निश्चित तौर पर वे दबाव में हैं और चूंकि उनपर आम आदमी या खास आदमी किसी की भी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए जब बात मरने-मारने की होगी तो निश्चित तौर पर वे बेहतर स्थिति में होंगे। दरअसल हमने नक्सलियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाने की बजाय उनपर बर्बर बलप्रयोग को तरजीह दी है। आंदोलनरत श्रमिकों, छात्र-छात्राओं या किसानों के खिलाफ बल प्रयोग करना एक बात है और हथियार बंद छिपे हुए दुर्दांत लड़ाकों से निपटना कुछ और। हम बलप्रयोग सिर्फ जंगलों में कर सकते हैं जबकि वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने के लिए स्वतंत्र हैं। अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है तो इसके लिए हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए। साफ है कि हमने कभी भी कथित नक्सलियों/माओवादियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाई ही नहीं। हम नक्सलियों की रणनीति का मुंहतोड़ जवाब देने की कोशिश मात्र कर रहे हैं और हर बार मुंह की खा रहे हैं। हमारी बौखलाहट इससे साफ जाहिर होती है कि 16 मई को जब नक्सलियों ने कुछ ग्रामीणों की हत्या कर दी तो आईजी को यह कहना पड़ा कि मारे गए लोग आम आदमी नहीं, पुराने नक्सली थे। दूसरे ही दिन 17 मई को जब नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर यात्री बस को उड़ा दिया तो तत्काल केन्द्रीय गृह मंत्रालय स्पष्टीकरण देता है कि मारे गए लोगों में सीआरपीएफ के जवान नहीं थे। ये दोनों ही टिप्पणियां गैरजरूरी थीं। पहली टिप्पणी जहां यह संकेत देती है कि नक्सलियों का साथ छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले आदिवासियों की सुरक्षा को लेकर हम कुछ खास चिंतित नहीं हैं वहीं दूसरी टिप्पणी सीआरपीएफ को दिलासा देने के लिए की गई लगती है। न चाहते हुए भी शासन ने साफ कर दिया है कि आदिवासी चाहे नक्सलियों की तरफ से लड़ें, चाहे हमारे लिए मुखबिरी करें या फिर एसपीओ के रूप में हथियार लेकर सुरक्षा बलों की अगुवाई करें, हमें उनकी हिफाजत की परवाह नहीं है। शायद हम आदिवासियों को किसी गिनती में ही नहीं लाते। यही वह रणनीतिक चूक है जो नक्सलियों को मजबूत कर रही है। मानवाधिकारवादियों को चिंतित कर रही है। सेनापतियों की टिप्पणी में हताशा के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। इससे पहले कि बात और बिगड़े, हमें नक्सलियों के खिलाफ रणनीति पर दोबारा विचार करना ही होगा।

रेलवे पर दर्ज हो कत्ल का जुर्म

हादसे कभी भी कहीं भी हो सकते हैं। हादसों की समीक्षा कर उसके कारकों को रोकना ही व्यवस्था का काम है। किन्तु यह क्या बात हुई कि रेलवे आज भी उन कारणों को दूर नहीं कर पाया है जिसकी वजह से न केवल स्टेशनों पर भगदड़ मचती है बल्कि लोगों की जानें जाती रहती हैं। पहली बार हादसा सिर्फ हादसा होता है। दूसरी बार यदि वही हादसा फिर हो तो वह लापरवाही होती है। और यदि वही हादसा बार-बार होता रहे तो मामला आपराधिक लापरवाही का बन जाता है। यदि इस लापरवाही से लोगों की जान जाती है तो कारकों की तरफ से उदासीन प्रशासन पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रविवार को अंतिम क्षणों में बिहार संपर्क क्रांति एवं विक्रमशिला एक्सप्रेस का प्लेटफार्म बदल दिया गया। जनरल बोगी के लिए नियत स्थान के पास अपने बाल बच्चों के साथ घंटों पहले से इंतजार कर रहे लोगों में भगदड़ मच गई। पागलों की तरह अपना मोटरा लेकर भागते लोगों के पैरों तले कुचल कर एक महिला और एक बच्चे की मौत हो गई। दर्जनों लोग घायल हो गए। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। तीन साल पहले 3 अक्टूबर 2007 को देश के सबसे बड़े जंक्शन मुगलसराय में भी इसी तरह की एक भगदड़ मची थी जिसमें 15 महिलाओं की मौत हो गई थी। तब भी रेलवे ने अंतिम समय पर ट्रेनों का प्लेटफार्म बदल दिया था। जैसा कि रेल दुर्घटनाओं के मामलों में होता है, मुआवजे और जांच की तत्काल घोषणा कर दी गई। न तो इस जांच से किसी का कुछ बिगड़ना है और न ही मुआवजे की रकम जिम्मेदार अधिकारियों की तनख्वाह में से काटी जानी है। फिर उन्हें किस बात की चिंता। वैसे भी रेलवे आज तक औपनिवेशिक मानसिकता से उबर नहीं पाया है। रेलवे के उच्चाधिकारी शाही सलून में यात्रा करते हैं। सरकारी अफसर और कर्मचारी एयरकंडीशन्ड क्लास में सफर करते हैं। देश की 80 फीसदी से अधिक जनता के लिए किसी भी ट्रेन में एक दो बोगी से अधिक की जगह नहीं होती। यहां फट्टे की सीट पर बैठने के लिए हजारों लोगों के बीच धक्कामुक्की होती है। ये डब्बे ट्रेन के आगे लगेंगे या पीछे यह तक किसी को पता नहीं होता। ट्रेन आने के बाद ही इस क्लास के यात्री डब्बों के साथ-साथ भागना शुरू करते हैं। सी-आॅफ/रिसीव करने वाले, लगेज, रेलवे की ट्राली, पत्रिका-पुस्तकों के ठेले, स्नैक्स कार्ट आदि इनका रास्ता रोकते हैं। पांव तले का चिकना फर्श उन्हें तेज गति नहीं करने देता। पिछले और अगले डब्बों के बीच 20-22 डब्बों की पूरी ट्रेन होती है। रेलवे को ऐसे लोगों की कोई फिक्र नहीं। रेलवे प्लेटफार्मों की हालत आज भी सर्कस के पार्किंग जैसी है, जहां गाड़ियों के पहुंचने के बाद ही उसके लिए जगह तय की जाती है। क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि करोड़ों रुपए खर्च कर विकसित किया जा रहा रूट रिले और सिग्नलिंग सिस्टम किस काम का है?

Sunday, May 16, 2010

पॉलीथीन के सहारे जिन्दगी

ग्रीष्म की एक दोपहरी। मजबूरी के मारे हम अपनी स्कूटर पर राजधानी की तरफ चले जा रहे थे। लू के थपेड़े हेलमेट को चीरकर सिर के आरपार निकल जाना चाहते थे। जहां-जहां शरीर कपड़ों से बाहर था, वहां की त्वचा झुलस रही थी। हमारी प्यासी आंखें किसी प्याऊ की तलाश में थी, पर नजर जहां तक जाती थी वहां तक केवल धूल भरे मैदान, सूखी झाड़ियां और उनके आसपास हवा में उड़ते पालीथीन के सिवा कुछ नहीं था। सड़क के किनारे, दुकानों के इर्द गिर्द, खाली प्लाटों में, हर जगह केवल पालीथीन के रंग-बिरंगे टुकड़े उड़ रहे थे। पालीथीन के खिलाफ चलाया गया हमारा अभियान इतना रंग जरूर लाया था कि जिस पानी का नाम लेकर लोगों को डराया जाता था वह पानी भी अब पालीथीन के पाऊच में बिकने लगा था। तभी नजर पालीथीन के कैरीबैग में कुछ शीशियां लेकर सड़क पार करने की कोशिश करती एक अधेड़ महिला पर पड़ी। फोरलेन कैरिज-वे ने यहां के रहवासियों का जीवन दूभर कर दिया था। अशक्त और वृद्धजनों के लिए सड़क पार करना किसी युद्ध से कम नहीं था। वह किसी तरह अपनी तरफ का सड़क पार कर डिवाइडर तक पहुंच चुकी थी। जैसे ही उसने डिवाइडर पर से दूसरी तरफ सड़क पर पैर रखना चाहा तेज हार्न की आवाज ने उसे डरा दिया। एक झटके से उसने अपने पांव वापस खींच लिए। झन्नाटे से एक मिनी बस उसके सामने से गुजर गई। एक पल की भी देर होती तो हादसा हो जाता। बहरहाल महिला तो बच गई किन्तु उसके हाथ का पालीथीन सड़क पर था। झटका लगने के कारण पालीथीन फट गया था और उसमें रखी दवाइयां और सिरप की शीशियां सड़क पर गिर कर फूट चुकी थीं। गोलियां बिखर गई थीं। इसी तरह कुछ दिन पहले पावर हाउस में एक वृद्धा को काली पालीथीन का नीचे से फटा हुआ पैकेट पकड़ कर ठगा सा खड़ा पाया था। पैकेट फाड़कर पके आम सड़क पर बिखर गए थे और उसकी आंखों के सामने मिनीडोर के पहियों ने उन्हें कुचलकर रख दिया था। पुराने पैंटों को सीलकर बनाये गये थैले न जाने कहां चले गये थे। अक्लमंद आदमी ने पालीथीन ईजाद कर ली। अब वह हर चीज इसी में खरीदता है। घर से बाजार के लिए निकलता है पर थैली नहीं रखता। पन्नी में आलू, पन्नी में ही प्याज, पन्नियों में भाजी, धनिया, मिर्च, फल सबकुछ खरीद लेता है। किराने की दुकान पर भी वह थैला लेकर नहीं जाता। दर्जन दो दर्जन पन्नियों के थैले समेट कर गाड़ी में आगे पीछे दाएं-बाएं लटका लेता है। कभी चीनी चींटी को चढ़ जाती है तो कभी गेहूं-चावल सड़क पर बिखर जाता है। जिस रफ्तार से पालीथीन का क्रेज बढ़ रहा है, किसी दिन मैटरनिटी होम से लोग अपने बच्चे भी पालीथीन के कैरीबैग में ही लेकर निकलेंगे।

यातायात का दबाव

राजधानी रायपुर में बस स्टैण्ड का विकेन्द्रीकरण हो रहा है। बहाना यह है कि इससे शहर पर बढ़ रहा यातायात का दबाव कम हो जाएगा। इससे लोगों को कुछ दिक्कतें भी होंगी किन्तु शासन का कहना है कि दिक्कतों को दूर कर लिया जाएगा। बिलासपुर की तरफ से आने वाली बसें अब रावांभाठा में रुक जाया करेंगी। धमतरी जाने की बसें डूमरतराई से मिलेंगी। महासमुंद और उड़ीसा जाने वाली बसें एग्रीकल्चर कालेज के पास ठहरेंगी। अलबत्ता भिलाई-दुर्ग, नागपुर से आने वाली बसें कहां रुकेंगी यह अभी स्पष्ट नहीं है। संभवत: ये बसें टाटीबंद में कहीं रुकेंगी। कहा गया है कि इन सभी बस स्टैण्डों के बीच सिटी बस की कनेक्टिविटी होगी तथा यात्रियों को परेशान होने नहीं दिया जाएगा। केन्द्रीयकृत बस स्टैण्ड में एक बस से उतर कर दूसरा पकड़ने के बीच 5 से 10 मिनट का फासला होता है। यह फासला बढ़कर आधे से एक घंटा हो जाएगा। क्या फर्क पड़ता है। हमारे देश में वक्त की वैसे भी कहां कोई कीमत है। अब आते हैं लाभ पर। राज्य को सिटी बस सर्विस के तहत सौ बसें और मिलने वाली हैं। फिलहाल सिटी बस घाटे में है। सिटी बस का लाभ बढ़ाया जाना जरूरी है। इसलिए उसके लिए काम निकाला गया है। बड़े लोग अपने बच्चों को एस्टाब्लिश करने के लिए अकसर ऐसा करते हैं। कभी यह कोटा और ठेका होता था अब बड़े बड़े व्यवसाय इसमें जुड़ गए हैं। दूसरा लाभ यह गिनाया गया है कि यातायात का दबाव कम होगा। छह पेग लगाने के बाद भी शराबी की कल्पना शक्ति इतनी ऊंची छलांग नहीं लगा पाती। शहर की सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। सड़कों के किनारे खड़े वाहनो की वजह से सड़कें संकरी हो गई हैं। गाड़ियों की चौड़ाई बेवजह बढ़ रही है। कारों का हुजूम सड़कों पर उतर आया है। बाइकों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। इसमें से सभी लोग शौक से ऐसा कर रहे हों, जरूरी नहीं है। कुछ लोग मजबूरी में दस हजार की नौकरी में तीन हजार रुपए का पेट्रोल फंूक रहे हैं। रेलवे की रहमदिली ने हर दूसरी ट्रेन को सुपरफास्ट बना दिया है। मिनी बसों के रूट का कोई ठिकाना नहीं है। कभी वह पचपेड़ी नाका से होकर जाती है तो कभी संतोषी नगर से। मूड बना तो भाठागांव से घुसकर भी पुलिस लाइन पर निकल आती है। सिटी बसों का कोई टाइमटेबल नहीं है। उसे टिकट चेक करने वाला जहां चाहे 10-15 मिनट के लिए रोक सकता है। आटो वाला अपनी मर्जी का मालिक है। लिहाजा जिसे वक्त पर ड्यूटी पहुंचना होता है, वह मजबूरी में अपने वाहन का इस्तेमाल करता है। इसलिए बढ़ता जाता है यातायात पर दबाव। जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट हाशिए पर हो तो लोग मजबूरी में भी गाड़ियां खरीदते हैं। और जब कुछ समय तक वे अपनी गाड़ी का उपयोग कर चुके होते हैं तो उन्हें मिनी बस, सिटी बस कष्ट देने लगती लगती हैं। जिसकी ड्यूटी रात 8 बजे या उसके बाद खत्म होती हो, यदि उसे लौटने का सार्वजनिक साधन न मिले तो दिन में काम पर आने के लिए भी वह निजी साधनों का उपयोग करने के लिए मजबूर हो जाता है। आप उसकी मजबूरी खत्म कर दीजिए, यातायात का दबाव अपने आप कम हो जाएगा।

जो दिखता है वह बिकता नहीं

यह जमाने का दस्तूर है कि आप जिस वस्तु का पसरा लगाओगे, दाम उसी का लगेगा। अमूमन ग्राहक उसी वस्तु को खरीदने के लिए दुकान पर आता है जिसे डिस्प्ले किया गया होता है। और फिर आप माल न बेचो तो पंगा तो होगा ही। अब किसी को क्या पता कि आपने डिस्प्ले विन्डो में ली-कूपर, लेविस, प्यूमा, रीबाक, कूटान्स के जीन्स टांग रखे हैं और भीतर हरेक माल 100 रुपए वाली जूतों की दुकान है। लड़की की शिकायत पर पुलिस मजनूं को उठा लाई। मजनूं फट पड़ा। रोते-गाते चीखते-चिल्लाते उसने अपनी करूण गाथा सुनाई। उसने बताया कि किस तरह पिछले तीन चार सालों से वह अपनी जेबखर्च का एक-एक पाई उसपर लुटाता आ रहा है। बर्थडे पर आई-पॉड, वैलेन्टाइन्स डे पर मोबाइल। हर महीने मोबाइल के रिचार्ज पर सैकड़ों रुपए। हफ्ते में दो-तीन दिन पिज्जा, बर्गर, आईसक्रीम पार्टी। आज वह उस दिन को कोस रहा है जब पहली बार नजरें चार हुई थीं। तब से अब तक अच्छा कुछ भी नहीं हुआ है। पाकेट मनी जोड़-जोड़ कर जो रकम इकट्ठी की थी कब की खत्म हो चुकी। दोस्तों का कर्जा चढ़ गया है। बाप की पाकेट मारी है। माँ के जेवर चुराए हैं। पहले दसवीं के नतीजे बिगड़े, ग्यारहवीं किसी तरह पास कर लिया पर बारहवीं में गाड़ी अटक गई। कोचिंग ज्वाइन करने के लिए घर से मोटी रकम मिली। वह भी लुटा दिए। जो कुछ डिस्प्ले पर था वह बिकाऊ नहीं था। अब प्यार का भूत उतर चुका है। सब चीजों से ध्यान हटाकर वह पढ़ना चाहता है किन्तु रात-बेरात फोन आ जाता है। हाट-टाक्स उसके कान गर्म कर देते हैं। शरीर में लहू दोगुनी रफ्तार से दौड़ने लगता है। वह बेचैन हो जाता है और पागलों जैसी हरकतें करने लगता है। एक दिन वह घर आई। पहले कम्प्यूटर को फारमेट मार दिया और फिर मोबाइल का मेमोरी कार्ड निकालकर अपने साथ ले गई। अब न वह मिलती है, न बोलती है। वह ठगा रह गया है। वह अपने बीते चार वर्षों का हिसाब चाहता है। अगर यह गुनाह है तो बेशक उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाए। इस जिन्दगी में वैसे भी रखा क्या है? उसकी गिनती बेहतरीन स्टूडेंन्ट्स में होती थी। वह अच्छा स्पोर्ट्समैन था। माँ-बाप से लेकर टीचर्स तक सब गर्व से उसका नाम लेते थे। आज सब कुछ खत्म हो गया है। थानेदार को माजरा समझते देर नहीं लगी। उसे लड़के से पूरी सहानुभूति थी। ऋषि विश्वामित्र नहीं बच पाए थे, यह तो आदमजात था। उन्होंने लड़के की पीठ थपथपाई, पानी पिलाया और बोले, ‘भाई! कुछ चीजें फुटपाथ से भी खरीदा करो, दुनियादारी सीख जाओगे। ऊंचे शोरूम की हर चीज अपनी पहुंच में नहीं होती।’

Friday, May 14, 2010

इज्जत की खातिर

शराब से भी बुरी है थोथी इज्जत की लत, मरते तक पीछा नहीं छोड़ती। नेक काम के बदले इज्जत, मान सम्मान मिले तो इसमें कोई हर्ज नहीं है किन्तु यदि इज्जतदार बने रहने के लिए झूठ बोलना पड़े, चोरी करनी पड़े, औरों की मान मर्यादा को कुचलना पड़े, उधार लेनी पड़े, हत्या करनी पड़े तो ऐसी इज्जत दो टके की नहीं होती। बावजूद इसके ऐसे लोगों की संख्या ही समाज में अधिक है जो अपनी झूठी आन-बान और शान के फेर में अपना कल बिगाड़ चुके हैं, आज से खेल रहे हैं और भविष्य को पलीता लगा रहे हैं। नोएडा के आरुषि हत्याकाण्ड से एक शब्द उभरा आॅनर किलिंग। इसकी गोल-मोल परिभाषा है, परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए बेटी, बहन की हत्या करना। इनका दोष अकसर इतना ही होता है कि उन्होंने प्यार करते समय स्टेटस का ख्याल नहीं रखा। पहले परिवार शर्म से डूब मरता है और फिर आरोपी बिना सुनवाई के कत्ल कर दिया जाता है। आश्चर्य, ऐसे मामलों में बेटों या भाइयों की हत्या नहीं की जाती। वे छुट्टा सांड की तरह होते हैं। उनके तो कुकर्मों पर भी शर्म नहीं आती, बल्कि उन्हें बचाने की कोशिश की जाती है। बहरहाल इन दिनों मीडिया आॅनर किलिंग के एलपी ट्रैक पर चल पड़ा है। चारों तरफ से आॅनर किलिंग की खबरें आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक होने लगा है। होता तो यह शुरू से रहा है किन्तु मीडिया को इसके न्यूज वैल्यू का पता अब जाकर लगा है। इसी शृंखला की एक कड़ी है अतिथि सत्कार। पेट काटकर माँ पिछले कई महीनों से राजू के क्रिकेट किट के लिए पैसे जोड़ रही थी कि एकाएक बुआ लोग आ गए। पूरे पैसे अतिथि सत्कार पर खर्च हो गए। कम पड़ गया तो पड़ोसियों के यहां से उधार भी मांग लिया। कहां बचत के लिए हफ्ते में एक बार दाल बनती थी और यहां रोज चिकन चिल्ली, पनीर बटर मसाला की फरमाइश हो रही थी। कपड़े वाले के यहां भी दो-ढाई हजार की उधारी कर आए। इज्जत बचाने की खातिर इतना तो करना ही पड़ता है। वैसे इज्जत कमाना इन दिनों एक खेल की तरह हो गया है। कुछ लोगों ने पैसा इफरात कमा लिया है किन्तु लोग उन्हें नहीं जानते। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें भी जानें। इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। वे अपना शाल, श्रीफल लेकर जाते हैं, मांगी गई राशि का चेक देते हैं और बदले में अपनी ही शॉल ओढ़कर, अपना ही नारियल पकड़कर मुख्यअतिथि के साथ फोटू खिंचवाते हैं। एक खूब रंगीन सा सम्मान पत्र पाते हैं। सर्टिफिकेट की कई कापियां निकाली जाती हैं और उन्हें घर की बैठक से लेकर दफ्तर की दीवारों पर चस्पा कर दिया जाता है। एक पैसे वाला इज्जत खरीद लाता है और दूसरा कंगला सम्मान समारोह का आयोजन कर अपनी दाल रोटी का इंतजाम कर लेता है।

Thursday, May 13, 2010

हम कौन जात के

बस में बैठे एक बुजुर्ग किसान ने एकाएक पूछा, भईया अपन कौन जात के? मैने सोचा कि शायद वह मेरी जाति पूछ रहा है। मैने कहा, हिन्दू! वह झल्लाया और दोबारा पूछा, हम कौन जात के? अब हम सिर खुजाने लगे। देख कर वह हंसा, फिर बोला। भईया जब हम लोग छोटे थे, तब हमारी जाति हिन्दू या मुसलमान होती थी। बाद में पता चला कि धत्, ये तो धर्म है। फिर स्कूल कालेज में जब जानवरों के बारे में पढ़ाया जाता था तो जाति, प्रजाति और उपजाति की एक अलग ही परिभाषा पढ़ी। इस लिहाज से यदि इंसान की जाति देखी जाए तो सभी एक जात के हैं। किन्तु आज सुबह का अखबार देखा तो फिर से कन्फ्यूज हो गए। मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने कहा है कि उनके घर में जाति प्रथा नहीं चलती। उनकी माँ तेजी बच्चन सिख थीं, उनकी पत्नी बंगाली हैं, उनके भाई की पत्नी सिंधी हैं, उनके दामाद पंजाबी हैं और बहू ऐश्वर्या मंगलौरी। लगा राज्य बदलने के साथ ही अब जाति बदल जाती है। सन् 2000 में तीन नए राज्य बने तो तीन नई जातियां भी बन गर्इं। अब समझ में आ रहा है कि जब बिहारी-बंगाली से शादी करता है तो उसे इंटरकास्ट क्यों कहते हैं? किसी भी संस्थान में काम के आधार पर डेज़ीनेशन होता है। वेल्डर, फिटर, टेक्नीशियन, मैसन आदि। इसी तरह भारतीय समाज में मिट्टी का काम करने वाला कुम्हार, बाल काटने वाला नाऊ, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई, पीतल ताम्बे का काम करने वाला ताम्रकार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार, चमड़े का काम करने वाला चर्मकार, पूजा पाठ शिक्षादान करने वाला ब्राह्मण, युद्ध करने वाला क्षत्रिय होता था। उपनाम बताते ही स्पष्ट हो जाता था कि व्यक्ति किस कार्य का विशेषज्ञ है। ज्यादा पूछताछ की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक शानदार सामाजिक व्यवस्था थी जो दुश्प्रचार का शिकार हो गई। तब से लेकर आज तक हम हर किसी से पूछ रहे हैं, ‘कौन जाति के हो।’ पूछने वाले का भी कोई खास उद्देश्य नहीं होता। बताने वाला भी आदमी देखकर बात करता है। सरकार पूछे तो अनुसूचित जाति, अनजान पूछे तो ठाकुर। जाति को लेकर यह कन्फ्यूज़न शादी विवाह तक जारी रहता है। बंगाली कायस्थ और बिहारी कायस्थ के बीच शादी होती है और कहलाते वे इंटरकास्ट हैं। यहां बंगाली और बिहारी दो जातियां हो गर्इं। सामने ठाकरे की ठकुराई हो तो महाराष्ट्र में बैठा गंगा किनारे का छोरा खुद को मराठी बताता है। बैठे ठाले जाति बदल जाती है। कुछ लोग शादी के समय गोत्र बदल लेते हैं। यदि न बदलें तो अच्छा लड़का या लड़की के हाथ से निकल जाने का खतरा होता है। अब तो समझ में आ गई होगी जाति? अब भी नहीं आई तो आपका कुछ नहीं हो सकता? अब जो जनगणना वाले तय कर देंगे वही आपकी जाति होगी।

Wednesday, May 12, 2010

स्टोरी बाज पुलिस

घटना स्थल का मुआयना और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर गढ़ी गई कहानियों से ही अकसर आपराधिक मामलों की गुत्थी सुलझाई जाती है। इसी कहानी के आधार पर सुराग तलाशे जाते हैं और जांच की दिशा तय की जाती है। कम से कम जासूसी उपन्यास पढ़ने का अपना टोटल एक्सपीरियन्स तो यही कहता है, फिर चाहे वह उपन्यास अंग्रेजी का हो या हिन्दी का। जासूस लिफाफा देखकर मजमून भांप लेते हैं, उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं। वे बला की नजर रखते हैं। फर्श और बिस्तर पर पड़ी ऐसी अनगिनत चीजें उन्हें दिख जाते हैं जिन्हें पुलिस नजर अंदाज करके जा चुकी होती है। कहते हैं क्राइम का ताना-बाना दिमाग में होता है। ऐसे लोगों को क्रिमिनल माइंडेड कहते हैं। ऐसे लोग ऊमदा जासूस हो सकते हैं। अच्छे क्राइम रिपोर्टर बन सकते हैं। जब वे इन दोनों में से कुछ भी नहीं बनते तो क्रिमिनल बन जाते हैं। इनके और पुलिस बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है। पर पुलिस को और भी काम होते हैं। उनका बस चले तो वे इस खेल से ही किनारा कर लें। पर मजबूरी है। उन्हें तनख्वाह इसी बात की मिलती है। इसलिए अकसर वे उन्हीं मामलों की तफ्तीश करते हैं जिनके लिए दबाव होता है। दबाव अकसर बड़े लोगों का होता है जो पुलिस को यह भी बता देते हैं कि फंसाना किसको है। और फिर पुलिस चुटकियों में केस हल कर देती है। शानदार कहानी गढ़ लाती है। आरोपी को गिरफ्तार भी कर लेती है। आरोपी जुर्म कबूल भी कर लेता है और फिर अगर वकील तगड़ा मिल गया तो बाकी जिन्दगी विचाराधीन कैदी बना रहता है। नोएडा के आरुषि हत्याकांड का उसने ऐसा पुलंदा बांधा कि सीबीआई भी नहीं खोल पा रही। नोएडा के ही पंधेर कोठी मामले में भी कुछ ऐसी ही हुआ। झारखंड के कोडरमा में एक पत्रकार की लाश की कुछ ऐसी पड़ताल हुई कि मामला दाखिल दफ्तर होने के कगार पर है। मुजफ्फरपुर में तो हद ही हो गई। कथित आॅनर किलिंग के मामले में यहां लाश की शिनाख्त हो गई, हत्यारा पकड़ा गया, उसके बयान दर्ज हो गए और फिर लाश अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़कर जीवित लौट आया। वैसे मीडिया भी कुछ कम नहीं। छत्तीसगढ़ के नक्सलप्रभावित कांकेर जिले से खबर आई कि नक्सलियों ने कोयलीबेड़ा के एक गांव के दर्जनों लोगों को मार कर जला दिया है। प्राय: सभी अखबारों में यह खबर सुर्खियां बनीं किन्तु बाद में पता लगा कि वहां कुछ हुआ ही नहीं है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि क्राइम डिटेक्शन की हमारी पूरी ट्रेनिंग सत्यकथा, मनोहर कहानियां, कर्नल रंजीत, सुरेन्द्र मोहन पाठक के स्कूलों में होती है। फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजधानी पुलिस एक अजीब मामले को लेकर फंसी है। एक अज्ञात 18-20 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। युवती की मौत हो जाती है। आरोपी पकड़े जाते हैं, जुर्म कबूल करते हैं। पुलिस मामले को पुख्ता करने डीएनए टेस्ट की बात करती है और ऐन वक्त पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ जाता है कि किसी का जबरिया डीएनए टेस्ट नहीं कराया जा सकता। लिहाजा ‘खा गीता की कसम, फिर चाहे जो मुंह में आए बोल’ वाली कहावत चरितार्थ होने दे।

सीमाओं पर किन्नर

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और भीष्मपितामह आमने सामने थे। भीष्मपितामह अजेय थे। महापराक्रमी थे। अर्जुन के लिए बिना छल, बल, कौशल के उनसे जीतना असंभव था। ऐसे समय में श्रीकृष्ण को शिखण्डी की याद आई। शिखण्डी पूर्व जन्म में अम्बा थी। अम्बा वही राजकुमारी थी जिसके प्रणय निवेदन को भीष्म ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि वे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने को विवश हैं। अम्बा ने तपस्या कर अपने प्राण त्याग दिए थे तथा दूसरे जन्म में उसने राजा द्रुपद के घर जन्म लिया। उसे किन्नर का तन मिला था किन्तु उसे पुरुषों की तरह पाला गया। वह विकट योद्धा बना। श्रीकृष्ण को पता था कि भीष्म शिखण्डी को अम्बा के रूप में पहचान जाएंगे तथा अपने हथियार नीचे कर लेंगे, क्योंकि एक ब्रह्मचारी स्त्री पर हमला नहीं करेगा। युद्ध में ऐसा ही हुआ और अर्जुन ने शिखण्डी की आड़ लेकर भीष्म पर तीरों की वर्षा कर दी। संभवत: इसी से प्रेरित होकर अरुणाचलप्रदेश के गृहमंत्री टाको डाबी ने देश की सीमाओं की रखवाली के लिए किन्नरों की रेजीमेंट बनाने का सुझाव दिया है। डाबी ने कहा कि मेरे ख्याल से अगर किन्नरों को पुलिस या अर्धसैनिक बलों में नियुक्त किया जाए तो वे राष्ट्र की बेहतर सेवा करेंगे। डाबी इस बारे में पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को पत्र भेज चुके हैं। उन्होंने लिखा है कि यह समुदाय अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अपना कर्तव्य प्रभावी तरीके से निभा पाएगा। देश में करीब 10 लाख किन्नर हैं। किन्तु समझ में यह नहीं आया कि वे दुश्मनों से भीष्म की तरह के आचरण की अपेक्षा किस बिना पर कर रहे हैं। हमारे दुश्मनों में ऐसा कौन है जो स्त्री या पूर्व प्रेमिका को देखकर शस्त्र झुका लेगा? या शायद वे यह सोच रहे हैं कि किन्नरों के चूंकि बाल बच्चे नहीं होते, रिश्तेदारों से सम्पर्क टूट चुका होता है, इसलिए उनमें धन संपत्ति के प्रति आग्रह कम होगा। ऐसे लोगों को खरीदना आसान नहीं होगा। न तो उन्हें रुपयों का लालच दिया जा सकेगा और न ही उन्हें प्रेम जाल में फांसा जा सकेगा। आइडिया बुरा नहीं है। ट्राइ करने में हर्ज भी क्या है? वैसे केवल सेना ही क्यों यदि सांसद और विधायक बनने के लिए भी किन्नर होना अनिवार्य कर दिया जाए तो क्या बुरा है? और फिर अगर आईएएस और आईपीएस भी किन्नर ही हों तो देश का वास्तव में भला हो जाएगा। वैसे किन्नर इस चूहा बिल्ली के खेल में शामिल होने की हामी भरेंगे इसमें पर्याप्त संदेह है।

Monday, May 10, 2010

फ्रस्ट्रेशन डॉट कॉम

हाईस्कूल में पेंढारकर सर हमें फिजिक्स पढ़ाया करते थे। भौतिकी की कक्षा में हम भूतप्रेतों की चर्चा नहीं करते थे किन्तु हाँ! समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ चर्चाएं अकसर हो जाया करती थीं। वे जो कुछ कहते, हम उसपर पूरी श्रद्धा के साथ यकीन करते थे। उन दिनों सीनियर सेकण्डरी स्कूल में नया-नया आॅडिटेरियम बना था। बड़ी-बड़ी शीशे लगी खिड़कियां थीं। शैतान बच्चे इन शीशों पर निशाना साधते थे और प्रत्येक सुबह कांच के कुछ टुकड़े हॉल की भीतर बाहर बिखरे मिलते थे। कुछ बच्चे क्लासरूम में तोड़फोड़ मचाते थे। ब्रूसली स्टाइल में किक मारकर स्विचबोर्ड तोड़ना, पंखे के ब्लेड्स को मोड़ देना ऐसे छात्रों का खास शौक होता था। इसी पर टिप्पणी करते हुए एक दिन पेंढारकर सर ने कहा था कि अमरीका में टेंशन रिलीविंग सेन्टर होते हैं। वहां एक बड़े से कमरे में कांच के सामान रखे होते हैं। कुछ डॉलर देकर आप एक डंडा लेकर वहां जा सकते हैं। अपने अंदर का सारा गुस्सा, सारी फ्रस्ट्रेशन कांच के बर्तनों पर उतार सकते हैं। यहां से निकलने के बाद आप एकदम तरोताजा महसूस करते हैं। हमें नहीं पता कि अमरीका में ऐसा कोई सेंटर है या नहीं किन्तु हम इतना जरूर जानते हैं कि आक्रोश, हताशा और अव्यक्त शरारतों को यदि सिस्टम से बाहर नहीं निकाला गया तो यह घातक हो सकते हैं। मुम्बई में आधी रात को फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाड़ी चढ़ा देना, नई दिल्ली-नोएडा रोड पर युवाओं का अंधाधुंध रफ्तार से बाइक दौड़ाना, भिलाई-दुर्ग के नामचीन स्कूलों के छात्रों द्वारा अलसुबह उठकर गाड़ियों के शीशे फोड़ना। यह भी एक तरह का फ्रस्ट्रेशन आउटब्रेक है। एक काम्पीटिशन है कि कौन कितने शीशे तोड़ता है। समय के साथ काम्पीटिशन बदले हैं। कभी केटी-गुलेल का जमाना था। तालाब के पानी पर मटके के टुकड़ों को भी उछाला जाता था। पत्थर मारकर आम तोड़े जाते थे। सू-सू करने का भी काम्पीटिशन होता था। रेपुटेड स्कूल के बच्चों के पास अब खेलने को वक्त नहीं रहा। सुबह से रात तक वे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग, क्लास में बिजी होते हैं। खेलकूद की भी क्लास लगती है। वहां मजा नहीं है। परफारमेन्स का टेंशन है। ऐसे में यह भी फ्रस्ट्रेशन देता है जो कभी भी, कहीं भी निकल सकता है। वक्त की डिमाण्ड है कि एक पल को हम प्रतिस्पर्धा से बाहर आकर खड़े हों और जीवन को, अपनी उम्र को भरपूर जिएं। पुलिस, डण्डा और कानून से कभी दुनिया नहीं बदल सकती। बदलाव तो समाज को खुद ही लाना होता है।